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Ambedkar Nagar News: 19 वर्ष बाद प्रमाणपत्र दाखिल करने पर निगरानी खारिज
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अंबेडकरनगर। जलालपुर में बैनामे के समय खुद को नाबालिग साबित करने के लिए करीब 19 साल बाद जन्मतिथि प्रमाणपत्र दाखिल करने के मामले में अपर जिला जज (त्वरित प्रथम) परविन्द कुमार की अदालत ने सिविल निगरानी खारिज कर दी। अदालत ने द्वितीय अपर सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के एक अक्तूबर 2021 के आदेश को बरकरार रखा है।
मामला जलालपुर तहसील क्षेत्र के भिस्वा चितौना गांव निवासी शेरबहादुर से जुड़ा है। उसने मूल वाद में दस्तावेज निरस्तीकरण के लिए मुकदमा दायर किया था। सुनवाई के दौरान सात सितंबर 2021 को प्रार्थनापत्र देकर प्राथमिक विद्यालय भिस्वा चितौना के प्रधानाध्यापक से चार सितंबर 2021 को प्राप्त जन्मतिथि प्रमाणपत्र को अभिलेख में शामिल करने की मांग की थी।
निचली अदालत ने प्रमाणपत्र देर से दाखिल करने समेत अन्य तथ्यों के आधार पर प्रार्थनापत्र खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ शेरबहादुर ने सिविल निगरानी दाखिल की थी।
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सुनवाई के दौरान अपर जिला जज ने पाया कि प्रमाणपत्र में यह स्पष्ट नहीं था कि शेरबहादुर किस कक्षा में और किस वर्ष विद्यालय में पढ़ा था। मूल वाद में उसने अपनी जन्मतिथि एक अप्रैल 1983 बताई थी, जबकि बाद में दाखिल प्रमाणपत्र में एक फरवरी 1987 दर्ज थी। जन्मतिथि में अंतर और प्रमाणपत्र दाखिल करने में देरी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने निगरानी खारिज कर दी।
अदालत ने दोनों पक्षों को विचारण न्यायालय में 12 नवंबर 2026 को उपस्थित होने का निर्देश दिया है। विपक्षी पक्ष में रामसहाय उर्फ सहाई निवासी आजनपारा समेत पांच अन्य लोग शामिल हैं।
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मामला जलालपुर तहसील क्षेत्र के भिस्वा चितौना गांव निवासी शेरबहादुर से जुड़ा है। उसने मूल वाद में दस्तावेज निरस्तीकरण के लिए मुकदमा दायर किया था। सुनवाई के दौरान सात सितंबर 2021 को प्रार्थनापत्र देकर प्राथमिक विद्यालय भिस्वा चितौना के प्रधानाध्यापक से चार सितंबर 2021 को प्राप्त जन्मतिथि प्रमाणपत्र को अभिलेख में शामिल करने की मांग की थी।
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निचली अदालत ने प्रमाणपत्र देर से दाखिल करने समेत अन्य तथ्यों के आधार पर प्रार्थनापत्र खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ शेरबहादुर ने सिविल निगरानी दाखिल की थी।
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सुनवाई के दौरान अपर जिला जज ने पाया कि प्रमाणपत्र में यह स्पष्ट नहीं था कि शेरबहादुर किस कक्षा में और किस वर्ष विद्यालय में पढ़ा था। मूल वाद में उसने अपनी जन्मतिथि एक अप्रैल 1983 बताई थी, जबकि बाद में दाखिल प्रमाणपत्र में एक फरवरी 1987 दर्ज थी। जन्मतिथि में अंतर और प्रमाणपत्र दाखिल करने में देरी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने निगरानी खारिज कर दी।
अदालत ने दोनों पक्षों को विचारण न्यायालय में 12 नवंबर 2026 को उपस्थित होने का निर्देश दिया है। विपक्षी पक्ष में रामसहाय उर्फ सहाई निवासी आजनपारा समेत पांच अन्य लोग शामिल हैं।