आजमगढ़। जुलूसे चेहल्लुम रविवार को नगर में परंपरागत तरीके से निकाला गया। इसमें काफी संख्या में महिला, पुरुष व बच्चों ने भाग लिया। जुलूस सीताराम मुहल्ले से निकलकर पुरानी कोतवाली, चौक, सब्जीमंडी, कटरा होते हुए कर्बला के मैदान पहुंचा जहां पर पूरा माहौल शोकाकुल रहा। लोग सीनाजनी कर कर्बला में नवास-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन व उनके 71 साथियों की दर्दनाक शहादत सुनकर रो रहे थे। अपनी संवेदना नम आंखों से जाहिर कर रहे थे।
मौलाना ने कहा कि करबला में जैसी बर्बरता दरिंदगी और हैवानियत का रूप देखने को मिला, इंसानी तारीख में ऐसी मिसाल और कहीं नहीं मिलती। हिंसा बनाम अहिंसा की जंग के बारे में अगर किसी को जानना है तो उसे करबला के वाकयात को जरूर समझना चाहिए जहां सिर्फ घर के बूढ़े और बच्चों को शहीद ही नहीं किया गया बल्कि घर जलाकर हजरत इमामे हुसैन के घर की औरतों, बच्चों को कष्ट पहुंचाया गया। औरत के सम्मान, इंसानियत और शराफत के लिए एक महिला ही खड़ी हुई जो हजरत इमामे हुसैन की बहन हजरत अली की बेटी जनाबे जैनब थीं जिन्होंने दुनिया के एक चौथाई हिस्से पर हुकूमत करने वाले यजीदी साम्राज्य को पलक झपकते हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया और मजलूम के दिल से जालिम का डर निकाल दिया। अपना हक, जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करना, इंसानियत और बहन बेटी और मां के जो अधिकार और सम्मान हैं उन्हें जालिम से कैसे हासिल करना है और वो भी अहिंसात्मक तरीके से, ये इमाम हुसैन की बहन जनाबे जैनब ने सिखाया है। करबला में जनाबे मुस्लिम और उनके दोनों बेटों के ताबूत, अंगारे का मातम देख लोगों ने खिराजे अकीदत पेश की।