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Bahraich News: बाघ और तेंदुओं की गुर्राहट से छह गांवों में दहशत
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चरदा। अब्दुल्लागंज जंगल में वन विभाग द्वारा पहले एक बाघ और दो दिन पूर्व दो तेंदुओं को छोड़े जाने के बाद जंगल से सटे छह गांवों में दहशत का माहौल है। चार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस जंगल में बाघ और तेंदुओं की मौजूदगी से ग्रामीणों में भय व्याप्त है। ग्रामीणों का कहना है कि रात में बाघ और तेंदुओं की दहाड़ व गुर्राहट से उनकी नींद उड़ जाती है। खेतों में जाने से भी लोग डर रहे हैं।
आबादी के समीप अलग-अलग स्थानों से पकड़े गए बाघ और दो तेंदुओं को दोबारा इसी वन क्षेत्र में छोड़े जाने से ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है। जंगल से सटे दर्जी गांव, बरवलिया, दर्जीपुरवा, महाराजनगर, निरहूगांव और कालियापुरवा के ग्रामीणों का कहना है कि अब्दुल्लागंज वन क्षेत्र चारों ओर से घनी आबादी से घिरा है। गांव और जंगल के बीच की दूरी महज 100 से 300 मीटर है। ग्रामीणों का आरोप है कि मार्च में पकड़े गए एक बाघ को इसी जंगल में छोड़ा गया था। इसके बाद 21 और 22 मई को पकड़े गए दो तेंदुओं को भी यहीं छोड़ दिया गया।
ग्रामीणों ने बताया कि करीब छह माह पूर्व नेपाल से भटककर आए एक बाघ ने कई गांवों में पालतू पशुओं पर हमला किया था और कुछ लोगों को घायल भी किया था। तब से लोग दहशत में हैं। अब दोबारा बाघ छोड़े जाने के बाद किसान सुबह-शाम खेतों में जाने से कतरा रहे हैं। शाम ढलते ही गांवों में सन्नाटा पसर जाता है।
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रात में सुनाई पड़ती है बाघ की दहाड़
लखैया गांव निवासी पूर्व प्रधान बेचन लाल वर्मा ने बताया कि पिछले तीन दिनों से रात में रह-रहकर बाघ की दहाड़ सुनाई पड़ रही है। उन्होंने कहा कि चार किलोमीटर के छोटे से जंगल में पहले कभी बाघ-तेंदुओं का स्थायी बसेरा नहीं रहा। जंगल से होकर लोग खेतों तक आते-जाते हैं, लेकिन बदले हालात के बाद परिजनों की सुरक्षा को लेकर भय बना हुआ है।
कतर्नियाघाट के जंगल में छोड़े जाएं वन्यजीव
ग्राम वन समिति के अध्यक्ष रामगोपाल वर्मा, जगतराम वर्मा, गोविंद, राजेश कुमार, छोटू, राजाराम, खखराज कश्यप और विपिन समेत 150 से अधिक ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री को भेजे प्रार्थना पत्र में मांग की है कि किसी बड़े हादसे से पहले बाघों और तेंदुओं को पकड़कर कतर्नियाघाट के सुरक्षित जंगलों में भेजा जाए।
अफसरों के निर्देश पर छोड़े जाते हैं बाघ और तेंदुए
डीएफओ सुंदरेशा ने कहा कि बाघ और तेंदुओं को किस जंगल में छोड़ना है, इसका निर्णय उच्चाधिकारी करते हैं। उच्चाधिकारियों के निर्देशानुसार ही उन्हें संबंधित वन क्षेत्र में छोड़ा जाता है।
आबादी के समीप अलग-अलग स्थानों से पकड़े गए बाघ और दो तेंदुओं को दोबारा इसी वन क्षेत्र में छोड़े जाने से ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है। जंगल से सटे दर्जी गांव, बरवलिया, दर्जीपुरवा, महाराजनगर, निरहूगांव और कालियापुरवा के ग्रामीणों का कहना है कि अब्दुल्लागंज वन क्षेत्र चारों ओर से घनी आबादी से घिरा है। गांव और जंगल के बीच की दूरी महज 100 से 300 मीटर है। ग्रामीणों का आरोप है कि मार्च में पकड़े गए एक बाघ को इसी जंगल में छोड़ा गया था। इसके बाद 21 और 22 मई को पकड़े गए दो तेंदुओं को भी यहीं छोड़ दिया गया।
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ग्रामीणों ने बताया कि करीब छह माह पूर्व नेपाल से भटककर आए एक बाघ ने कई गांवों में पालतू पशुओं पर हमला किया था और कुछ लोगों को घायल भी किया था। तब से लोग दहशत में हैं। अब दोबारा बाघ छोड़े जाने के बाद किसान सुबह-शाम खेतों में जाने से कतरा रहे हैं। शाम ढलते ही गांवों में सन्नाटा पसर जाता है।
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लखैया गांव निवासी पूर्व प्रधान बेचन लाल वर्मा ने बताया कि पिछले तीन दिनों से रात में रह-रहकर बाघ की दहाड़ सुनाई पड़ रही है। उन्होंने कहा कि चार किलोमीटर के छोटे से जंगल में पहले कभी बाघ-तेंदुओं का स्थायी बसेरा नहीं रहा। जंगल से होकर लोग खेतों तक आते-जाते हैं, लेकिन बदले हालात के बाद परिजनों की सुरक्षा को लेकर भय बना हुआ है।
कतर्नियाघाट के जंगल में छोड़े जाएं वन्यजीव
ग्राम वन समिति के अध्यक्ष रामगोपाल वर्मा, जगतराम वर्मा, गोविंद, राजेश कुमार, छोटू, राजाराम, खखराज कश्यप और विपिन समेत 150 से अधिक ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री को भेजे प्रार्थना पत्र में मांग की है कि किसी बड़े हादसे से पहले बाघों और तेंदुओं को पकड़कर कतर्नियाघाट के सुरक्षित जंगलों में भेजा जाए।
अफसरों के निर्देश पर छोड़े जाते हैं बाघ और तेंदुए
डीएफओ सुंदरेशा ने कहा कि बाघ और तेंदुओं को किस जंगल में छोड़ना है, इसका निर्णय उच्चाधिकारी करते हैं। उच्चाधिकारियों के निर्देशानुसार ही उन्हें संबंधित वन क्षेत्र में छोड़ा जाता है।