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Banda Ground Report: पर्यटन-विरासत से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक? इस रिपोर्ट में जानिए क्या है जमीनी हकीकत

अमर उजाला नेटवर्क, बांदा Published by: Akash Dubey Updated Wed, 29 Apr 2026 11:15 PM IST
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सार

अमर उजाला टीम ने बांदा में विरासत संरक्षण, शजर पत्थर कारीगरों और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की पड़ताल की। यहां टीम ने भूरागढ़ किला पहुंचकर वहां की व्यवस्थाओं को परखा। शजर पत्थर के हस्तशिल्पियों से मिले। मेडिकल व्यवस्थाओं की भी पड़ताल की गई।

Banda Ground Report From tourism-heritage to health services know what has changed in this report
बांदा ग्राउंड रिपोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमर उजाला की टीम उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों का दौरा कर राज्य की क्षमताओं और जमीनी स्तर पर हो रहे परिवर्तनों को गहराई से समझ रही। इसी क्रम में हमारी टीम बांदा पहुंचा। जहां की पड़ताल में, विशेष रूप से विरासत को संजोने के लिए किए गए कार्यों, शजर पत्थर और उसके कारीगरों की उपलब्धियों, तथा स्वास्थ्य सेवाओं में आए सुधार जैसे महत्वपूर्ण स्थानीय मुद्दों को गहनता से परखा गया। टीम ने इन बदलावों से आम नागरिकों के जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तनों का जायजा लिया और यह जानने का प्रयास किया कि ये कार्य जनता को वाकई लाभ पहुंचा रहे हैं? आइए इस रिपोर्ट से समझते हैं।

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विरासत को संजोने के लिए क्या हुआ काम?
इस सवाल का जवाब तलाशते हुए हम बांदा के भूरागढ़ किला पहुंचे। ये कई इतिहास संजोए हुए हैं। ये बुंदेलों का संघर्ष संजोए हुए हैं। 1857 की क्रांति संजोए हुए हैं। इस विरासत को संजोने के लिए सरकार किले का जीर्णोद्धार करवा रही है। इसके प्रोजेक्ट इंचार्ज आशीष यादव ने बताया कि 2024 में प्रोजेक्ट स्टार्ट हुआ था, लगभग 90% से 95% काम कंप्लीट हो गया है। फिनिशिंग में मुश्किल से 15 दिन और लगेगा। इसे आकर्षण का केंद्र बनाया जा रहा है। स्थानीय निवासी जुगुल किशोर मिश्रा ने बताया कि पुरानी धरोहर को सुरक्षित किया जा रहा है। यह बहुत अच्छा काम है। 
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यहां सुनें पूरी बातचीत-


शजर पत्थर और उसके कारीगरों को क्या हुआ हासिल?
बांदा का शजर पत्थर ओडीओपी में शामिल है। कैसे यह शजर उद्योग बढ़ा और कैसे यह डिजाइन प्राकृतिक तरीके से इस शजर पर रह जाती है। इस सवाल के जवाब के लिए हम शजर पत्थर के हस्तशिल्पी द्वारिका प्रसाद सोनी से मिले। जब प्रचार प्रसार हुआ, तब इसकी काफी ज्यादा मांग बढ़ी और काम भी बढ़ा। हमारी आमदनी पहले जो 10 रुपये थी वो 30 रुपये हो गई। इसके बाद हमारा हौसला और बढ़ा और नए-नए प्रयास किए। शजर से बने हुए मैंने कफलिंक और ब्रोच बनाए तो हमारे प्रधानमंत्री शिखर सम्मेलन में 2023 या 24 में जर्मनी गए तो वहां सातों देशों के जो राष्ट्रध्यक्ष आए हुए थे तो उनको गिफ्ट दिया। बांदा जनपद में लगभग लगभग ढाई 300 जो कारीगर हैं जो इस काम से जुड़े हुए हैं। हाल ही में शजर पत्थर को जीआई टैग भी प्राप्त हुआ है। इससे काम में इजाफा हुआ है।  

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स्वास्थ्य सेवाओं में कितना आया सुधार?
इस सवाल के जवाब के लिए टीम बांदा की रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज के पास पहुंची। मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. एसके कौशल ने बताया कि मेडिकल साइंस की बात करें तो बहुत ही बड़ा परिवर्तन आप महसूस कर पाएंगे। एक वो भी दौर था जब हम लोगों ने एमबीबीएस किया, राज्य की बात करें तो करीब 750 सीटें हुआ करती थी और वहीं छह-सात मेडिकल कॉलेज हुआ करते थे। लेकिन आज की अगर बात करेंगे तो सिर्फ मैं गवर्नमेंट सेक्टर की बात करूंगा तो लगभग कुछ जिलों को छोड़ दें तो हर जिले में मेडिकल कॉलेज हैं। साथ ही इंस्टीट्यूट अलग से हैं। इंटर्न डॉक्टर मनीषा यादव ने बताया कि 2020 मैं यहां आई थी। तब से अब तक ओपीडी सबसे पहले बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं। आईपीडीस बढ़ गई हैं। इससे क्या होता है कि हमें एक्सपोजर ज्यादा मिलता है। इसके अलावा पीजी की सीट्स बढ़ गई हैं। 

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