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Barabanki News: हर 16 घंटे में टूट रही सांसों की डोर
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Fri, 17 Apr 2026 02:16 AM IST
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बाराबंकी। जिले में प्रशासनिक सक्रियता और सड़कों पर पुलिसिया पहरे के दावों के बीच एक खौफनाक हकीकत सामने आई है। जिले की करीब पांच हजार किलोमीटर लंबी सड़कों और पांच नेशनल हाईवे पर मौतें सिर्फ सड़क की रफ्तार से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की सुस्त रफ्तार और बदहाल ट्रॉमा सिस्टम की वजह से हो रही हैं।
प्रशासन ने हादसों पर लगाम कसने के लिए आठ थानों में 10 क्रिटिकल कॉरिडोर बनाकर टीमें तो तैनात कर दी हैं, लेकिन अस्पतालों की नब्ज अब भी ठंडी पड़ी है। आंकड़ों पर गौर करें तो रूह कांप जाती है। पिछले पांच वर्षों में बाराबंकी की सड़कों ने 2000 से अधिक जिंदगियां लील ली हैं।
औसत निकाला जाए तो हर 16 घंटे में एक व्यक्ति सड़क हादसे का शिकार होकर दम तोड़ रहा है। रोजाना छोटे-बड़े औसतन तीन से चार हादसे होते हैं, लेकिन मौतों का यह आंकड़ा हादसों की भयावहता से ज्यादा इलाज में होने वाली देरी की गवाही देता है।
सिस्टम की भेंट चढ़ता गोल्डन ऑवर
चिकित्सा विज्ञान कहता है कि हादसे के बाद का शुरुआती एक घंटा गोल्डन ऑवर होता है, जिसमें सही इलाज मिले तो जान बचने की संभावना 90 फीसदी तक होती है, लेकिन बाराबंकी में यह गोल्डेन ऑवर एंबुलेंस के इंतजार, डॉक्टरों की अनुपलब्धता और जटिल रेफरल प्रक्रिया की भेंट चढ़ जाता है।
लखनऊ-अयोध्या हाईवे जैसे व्यस्त मार्ग पर हादसे के बाद मरीज को अस्पताल पहुंचाने में ही 45 मिनट लग जाते हैं। जिला अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर पहुंचने पर असली संघर्ष शुरू होता है।
जिला अस्पताल में ट्रॉमा सेंटर का बोर्ड तो लगा है, लेकिन सुविधाएं नगण्य हैं। गंभीर मरीजों के लिए न तो वहां कोई न्यूरोसर्जन (सिर की चोट का डॉक्टर) है और न ही हृदय रोग विशेषज्ञ। अगर रात में कोई गंभीर मामला आता है, तो सर्जन को ऑन कॉल बुलाया जाता है। सिर में गंभीर चोट लगने पर अस्पताल प्रबंधन हाथ खड़े कर देता है और मरीज को लखनऊ रेफर कर दिया जाता है।
रेफर होने के बाद एंबुलेंस आने में आधा घंटा और फिर ट्रैफिक और जाम में फंसते हुए डेढ़ से दो घंटे का समय लग जाता है। नतीजा यह होता है कि हर महीने 15 से 16 घायल बाराबंकी से लखनऊ के रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
एक दिन भी नहीं चला वैकल्पिक सिस्टम
सबसे बड़ा सवाल सिस्टम की संवेदनशीलता पर उठता है। दो साल पहले यह तय किया गया था कि शहर से महज छह किमी दूर सफेदाबाद स्थित हिंद मेडिकल कॉलेज में गंभीर घायलों को तत्काल इलाज दिया जाएगा। इस वैकल्पिक व्यवस्था का मकसद लखनऊ तक जाने वाले कीमती समय को बचाना था।
विडंबना देखिए कि यह आदेश आज तक धरातल पर नहीं उतरा। आज भी हर गंभीर मरीज को लखनऊ की ओर दौड़ाया जाता है, जो कई बार उनके लिए अंतिम यात्रा साबित होती है।
राज्यमंत्री सतीश चंद्र शर्मा ने बताया कि हादसों के मामले में जिले के हालात संवेदनशील हैं। हाईवे किनारे ट्राॅमा सेंटर की स्थापना को लेकर पैरवी की जा रही है। ताकि घायल को तत्काल अच्छा इलाज मिल सके।
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औसत निकाला जाए तो हर 16 घंटे में एक व्यक्ति सड़क हादसे का शिकार होकर दम तोड़ रहा है। रोजाना छोटे-बड़े औसतन तीन से चार हादसे होते हैं, लेकिन मौतों का यह आंकड़ा हादसों की भयावहता से ज्यादा इलाज में होने वाली देरी की गवाही देता है।
सिस्टम की भेंट चढ़ता गोल्डन ऑवर
चिकित्सा विज्ञान कहता है कि हादसे के बाद का शुरुआती एक घंटा गोल्डन ऑवर होता है, जिसमें सही इलाज मिले तो जान बचने की संभावना 90 फीसदी तक होती है, लेकिन बाराबंकी में यह गोल्डेन ऑवर एंबुलेंस के इंतजार, डॉक्टरों की अनुपलब्धता और जटिल रेफरल प्रक्रिया की भेंट चढ़ जाता है।
लखनऊ-अयोध्या हाईवे जैसे व्यस्त मार्ग पर हादसे के बाद मरीज को अस्पताल पहुंचाने में ही 45 मिनट लग जाते हैं। जिला अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर पहुंचने पर असली संघर्ष शुरू होता है।
जिला अस्पताल में ट्रॉमा सेंटर का बोर्ड तो लगा है, लेकिन सुविधाएं नगण्य हैं। गंभीर मरीजों के लिए न तो वहां कोई न्यूरोसर्जन (सिर की चोट का डॉक्टर) है और न ही हृदय रोग विशेषज्ञ। अगर रात में कोई गंभीर मामला आता है, तो सर्जन को ऑन कॉल बुलाया जाता है। सिर में गंभीर चोट लगने पर अस्पताल प्रबंधन हाथ खड़े कर देता है और मरीज को लखनऊ रेफर कर दिया जाता है।
रेफर होने के बाद एंबुलेंस आने में आधा घंटा और फिर ट्रैफिक और जाम में फंसते हुए डेढ़ से दो घंटे का समय लग जाता है। नतीजा यह होता है कि हर महीने 15 से 16 घायल बाराबंकी से लखनऊ के रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
एक दिन भी नहीं चला वैकल्पिक सिस्टम
सबसे बड़ा सवाल सिस्टम की संवेदनशीलता पर उठता है। दो साल पहले यह तय किया गया था कि शहर से महज छह किमी दूर सफेदाबाद स्थित हिंद मेडिकल कॉलेज में गंभीर घायलों को तत्काल इलाज दिया जाएगा। इस वैकल्पिक व्यवस्था का मकसद लखनऊ तक जाने वाले कीमती समय को बचाना था।
विडंबना देखिए कि यह आदेश आज तक धरातल पर नहीं उतरा। आज भी हर गंभीर मरीज को लखनऊ की ओर दौड़ाया जाता है, जो कई बार उनके लिए अंतिम यात्रा साबित होती है।
राज्यमंत्री सतीश चंद्र शर्मा ने बताया कि हादसों के मामले में जिले के हालात संवेदनशील हैं। हाईवे किनारे ट्राॅमा सेंटर की स्थापना को लेकर पैरवी की जा रही है। ताकि घायल को तत्काल अच्छा इलाज मिल सके।

लाडवा। मकान के अंदर फायरिंग से पहले फेंकी गई पर्ची। सीसीटीवी- फोटो : जिला चिकित्सालय परिसर में बिलखते परिजन।

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