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Basti News: एमएसएमई को बढ़ावा...छोटे उद्यमियों को बड़ी राहत
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औद्योगिक आस्थान प्लॉस्टिक कांपलेक्स। संवाद
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बस्ती। 90 के दशक से लगातार झटका लगने के कारण जिले का औद्योगिक क्षेत्र पनप नहीं पाया। बजट में एमएसएमई को बढ़ावा दिए जाने की घोषणा के बाद छोटे और मध्यम उद्योगों को संजीवनी मिलने की उम्मीद है।
औद्योगिक स्थान प्लॉस्टिक कांप्लेक्स में तीन दशक पहले ही प्लॉस्टिक उद्योग खत्म हो गए। अब यहां विभिन्न तरह की फूड प्राेसेसिंग इकाइयां संचालित हो रही हैं। कागज में 80 इकाइयां हैं लेकिन, असलियत में 55 से 60 उद्योग इकाई ही सक्रिय हैं। समूचे जिले की बात करें तो बड़े उद्योग इकाई केवल गिनती मात्र के हैं। रुधौली में एक निजी कंपनी की चीनी मिल और दूसरी मुंडेरवा में सरकारी चीनी मिल संचालित है। इसके अलावा न तो कोई इस्पात उद्योग है और न ही मैन्यूफ्रेक्चरिंग से जुड़ी अन्य कोई बड़ी इकाई है। एक जनपद-एक उत्पाद के तहत सिरका और फर्नीचर उद्योग को पनपाने की जद्दोजहद शुरू हुई थी लेकिन, वह भी जिले के हर्रैया तहसील क्षेत्र तक ही सिमट कर रह गई। फर्नीचर उद्योग के क्षेत्र में कप्तानगंज क्षेत्र के गड़हा गौतम की एक इकाई पहचान बना पाई है।
उद्यमियों का कहना है कि सरकार तो औद्योगिक क्षेत्र को पनपाने के लिए कोशिश लगातार कर रही है। इसके लिए नियमों में सरलीकरण का दावा भी किया जा रहा है। मगर उद्योगों की स्थापना में स्थानीय स्तर पर कठिनाई बढ़ जाती है। उद्यमियों के अनुसार केवल एनओसी की ही बात करें तो इसे हथियाने में नाको चना चबाने वाली स्थिति है।
अग्निशमन, श्रम विभाग, नगर पालिका, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी संस्थाओं से आसानी से एनओसी नहीं मिलता है। इसके अलावा सुगम रास्ता, विद्युत कनेक्शन, जल निकासी में कठिनाई आती है। इसीलिए इस अंचल में बड़े उद्योग इकाई नहीं पनप पा रहे हैं।
तीन गुना कम हुई राइस मिलें : वर्ष 2015 के पहले जिले में राइस मिल उद्योग की बहार रही। औद्योगिक स्थान से लेकर ग्रामीण अंचल में 70 से अधिक राइस मिल संचालित हो रही थी। यहां का सांभा मंसूरी और लाल मोटा चावल देश के विभिन्न प्रांतों में खूब पसंद किया जाता रहा। खाद्य एवं रसद विभाग के अधीन इन राइस मिलों को बड़े पैमाने पर कस्टम चावल भी तैयार करने की जिम्मेदारी मिलती रही।
लेकिन, इधर एक दशक में इनकी संख्या भी घटकर 27 पर आकर सिमट गई है। राइस मिल उद्योग से जुड़े गुड्डू श्रीवास्तव बताते हैं कि पहले कस्टम चावल के कुटाई का भुगतान नियमित होता रहा। बाद में उद्यमियों के करोड़ों रुपये बकाया रहने लगे। इस वजह से कई उद्यमी दिवाला बोल गए।
पनप रही एथनॉल फैक्टरी, चालू होने के बाद बढ़ेगी हलचल : ग्लोबल सबमिट के बयार में जिले के हाथ कुछ खास लगा है। यहां एथनॉल उत्पादन की दो बड़ी यूनिट स्थापित हो रही है। रुधौली क्षेत्र के दसिया में 400 करोड़ लागत की यूनिट बनकर लगभग तैयार हो चुकी है। यह 250 केएल क्षमता की एथनॉल यूनिट होगी। दूसरी यूनिट कुदरहा क्षेत्र के बानपुर में स्थापित हो रही है।
सौ करोड़ लागत के इस यूनिट की क्षमता 50 केएल होगी। खास बात यह है कि एथनॉल तैयार करने के लिए कच्चा मॉल इसी जनपद के किसानों से लिया जाएगा। इन फैक्टरियों में चावल और मक्के से एथनॉल तैयार किया जाएगा।
माइक्रो उद्योग ने बचाई है लाज : जिले में माइक्रो उद्योग ने औद्योगिक क्षेत्र की लॉज बचाई है। बस्ती-बांसी मार्ग स्थित मुस्तफाबाद, बस्ती-महुली मार्ग स्थित भोगीपुर, ओड़वारा और कुर्थियां में मिनी गन्ना उद्योग की दो दर्जन से अधिक इकाइयां संचालित हो रही है। यहां विभिन्न किस्म के गुण तैयार कर बस्ती समेत आसपास के जनपदों में आपूर्ति की जा रही है।
इन उद्यमियों को इससे अच्छा खासा मुनाफा भी हो रहा है। लेकिन अधिकांश उद्यमी बिना सरकारी सहायता के अपनी इकाई संचालित कर रहे हैं। इसी तरह सरसों तेल, आटा चक्की, वुड क्रॉफ्ट, लोहे एवं स्टील के सामग्री निर्माण की इकाइयां मिलाकर 3650 हैं।
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औद्योगिक स्थान प्लॉस्टिक कांप्लेक्स में तीन दशक पहले ही प्लॉस्टिक उद्योग खत्म हो गए। अब यहां विभिन्न तरह की फूड प्राेसेसिंग इकाइयां संचालित हो रही हैं। कागज में 80 इकाइयां हैं लेकिन, असलियत में 55 से 60 उद्योग इकाई ही सक्रिय हैं। समूचे जिले की बात करें तो बड़े उद्योग इकाई केवल गिनती मात्र के हैं। रुधौली में एक निजी कंपनी की चीनी मिल और दूसरी मुंडेरवा में सरकारी चीनी मिल संचालित है। इसके अलावा न तो कोई इस्पात उद्योग है और न ही मैन्यूफ्रेक्चरिंग से जुड़ी अन्य कोई बड़ी इकाई है। एक जनपद-एक उत्पाद के तहत सिरका और फर्नीचर उद्योग को पनपाने की जद्दोजहद शुरू हुई थी लेकिन, वह भी जिले के हर्रैया तहसील क्षेत्र तक ही सिमट कर रह गई। फर्नीचर उद्योग के क्षेत्र में कप्तानगंज क्षेत्र के गड़हा गौतम की एक इकाई पहचान बना पाई है।
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उद्यमियों का कहना है कि सरकार तो औद्योगिक क्षेत्र को पनपाने के लिए कोशिश लगातार कर रही है। इसके लिए नियमों में सरलीकरण का दावा भी किया जा रहा है। मगर उद्योगों की स्थापना में स्थानीय स्तर पर कठिनाई बढ़ जाती है। उद्यमियों के अनुसार केवल एनओसी की ही बात करें तो इसे हथियाने में नाको चना चबाने वाली स्थिति है।
अग्निशमन, श्रम विभाग, नगर पालिका, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी संस्थाओं से आसानी से एनओसी नहीं मिलता है। इसके अलावा सुगम रास्ता, विद्युत कनेक्शन, जल निकासी में कठिनाई आती है। इसीलिए इस अंचल में बड़े उद्योग इकाई नहीं पनप पा रहे हैं।
तीन गुना कम हुई राइस मिलें : वर्ष 2015 के पहले जिले में राइस मिल उद्योग की बहार रही। औद्योगिक स्थान से लेकर ग्रामीण अंचल में 70 से अधिक राइस मिल संचालित हो रही थी। यहां का सांभा मंसूरी और लाल मोटा चावल देश के विभिन्न प्रांतों में खूब पसंद किया जाता रहा। खाद्य एवं रसद विभाग के अधीन इन राइस मिलों को बड़े पैमाने पर कस्टम चावल भी तैयार करने की जिम्मेदारी मिलती रही।
लेकिन, इधर एक दशक में इनकी संख्या भी घटकर 27 पर आकर सिमट गई है। राइस मिल उद्योग से जुड़े गुड्डू श्रीवास्तव बताते हैं कि पहले कस्टम चावल के कुटाई का भुगतान नियमित होता रहा। बाद में उद्यमियों के करोड़ों रुपये बकाया रहने लगे। इस वजह से कई उद्यमी दिवाला बोल गए।
पनप रही एथनॉल फैक्टरी, चालू होने के बाद बढ़ेगी हलचल : ग्लोबल सबमिट के बयार में जिले के हाथ कुछ खास लगा है। यहां एथनॉल उत्पादन की दो बड़ी यूनिट स्थापित हो रही है। रुधौली क्षेत्र के दसिया में 400 करोड़ लागत की यूनिट बनकर लगभग तैयार हो चुकी है। यह 250 केएल क्षमता की एथनॉल यूनिट होगी। दूसरी यूनिट कुदरहा क्षेत्र के बानपुर में स्थापित हो रही है।
सौ करोड़ लागत के इस यूनिट की क्षमता 50 केएल होगी। खास बात यह है कि एथनॉल तैयार करने के लिए कच्चा मॉल इसी जनपद के किसानों से लिया जाएगा। इन फैक्टरियों में चावल और मक्के से एथनॉल तैयार किया जाएगा।
माइक्रो उद्योग ने बचाई है लाज : जिले में माइक्रो उद्योग ने औद्योगिक क्षेत्र की लॉज बचाई है। बस्ती-बांसी मार्ग स्थित मुस्तफाबाद, बस्ती-महुली मार्ग स्थित भोगीपुर, ओड़वारा और कुर्थियां में मिनी गन्ना उद्योग की दो दर्जन से अधिक इकाइयां संचालित हो रही है। यहां विभिन्न किस्म के गुण तैयार कर बस्ती समेत आसपास के जनपदों में आपूर्ति की जा रही है।
इन उद्यमियों को इससे अच्छा खासा मुनाफा भी हो रहा है। लेकिन अधिकांश उद्यमी बिना सरकारी सहायता के अपनी इकाई संचालित कर रहे हैं। इसी तरह सरसों तेल, आटा चक्की, वुड क्रॉफ्ट, लोहे एवं स्टील के सामग्री निर्माण की इकाइयां मिलाकर 3650 हैं।
