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Basti News: खोल लिया अल्ट्रासाउंड सेंटर, बैठने की जगह न छांव...बाहर तप रहे मरीज
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जिला अस्पताल के पास एक सेंटर पर जांच के लिए पहुंचे मरीज संवाद
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बस्ती। शहर में बगैर रेडियोलॉजिस्ट के प्राइवेट अल्ट्रासाउंड केंद्र धड़ल्ले से फल-फूल रहे हैं। संचालकों की ओर से संचालन की गाइड लाइन की अवहेलना किए जाने के मामले में कार्रवाई होती नहीं दिख रही है। ऐसे तमाम सेंटर हैं जहां उचित व्यवस्था नहीं किए हैं। यहां बैठका और छाजन न होने से बाहर मरीज तप रहे हैं।
अल्ट्रासाउंड केंद्रों के संचालक के पास रेडियोलॉजिस्ट की डिग्री होने के साथ एक प्रशिक्षित महिला की उपस्थिति अनिवार्य होती है। लेकिन जिले में इसका पालन नाममात्र केंद्रों पर होता दिख रहा है। स्वास्थ्य विभाग की कृपा से बेरोकटोक चल रहे इस धंधे से अयोग्य संचालक मालामाल हो रहे हैं तो जांच रिपोर्ट सही न होने से जनता के जीवन को खतरा पैदा कर रहे हैं। एक ओर सरकार जनता के स्वास्थ्य और बीमारियों से सुरक्षा के लिए गंभीर है तो दूसरी ओर से स्वास्थ्य विभाग के अनदेखी से लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ किए जाने पर लगाम नहीं लग पा रहा है।
ऐसे सेंटर के रेट भी अलग-अलग हैं। मगर, विभागीय जिम्मेदारों की मौन प्रणाली ने इस धंधे को और बल दे दिया है। इससे मरीज माफिया और धंधेबाज डर नहीं, बल्कि सह पाकर मरीजों के साथ छल करके मालामाल हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से मिली जानकारी के अनुसार जिले में कुल 118 अल्ट्रासाउंड केंद्र संचालित हो रहे हैं, इसमें तीन सरकारी हैं। मेडिकल कॉलेज, जिला और महिला अस्पताल शामिल हैं।
नामी सेंटर पर भी अव्यवस्था : नामी अल्ट्रासाउंड जांच केंद्र पर अव्यवस्था और है। बाहर न पंजीकरण नंबर, न बोर्ड, रेडियोलॉजिस्ट कौन है यह भी नहीं होता, बावजूद इसके ये सेंटर धड़ल्ले से चल रहे हैं। मरीज को बुला तो लेते हैं, मगर न बैठने की व्यवस्था, न पानी, न छाजन न ही वेटिंग एरिया है।
बताते हैं कि डॉक्टर का नाम तक नहीं प्रदर्शित है, न ही स्पष्ट हस्ताक्षर है। डॉक्टर कौन है, यह भी नहीं पता चलता। सूत्रों के अनुसार, सेंटर का पंजीकरण किसी और नाम डॉक्टर के नाम पर है, जबकि जांच एक सरकारी डॉक्टर कर रहे हैं। फिर भी नौ सौ रुपये जमा करके रिपोर्ट दी जा रही है।
इसी प्रकार कैली रोड पर स्थित एक सेंटर नाले पर ही खुल गया है। यहां भी मरीज सेटिंग से पहुंच रहे, लेकिन सुविधा न के बराबर है। यहां से नौ सौ रुपये लेकर रिपोर्ट दी जाती है। ये दो सेंटर महज बानगी भर है, शहर में गली-मोहल्ले में एक कमरे में चल रहे सेंटरों की जांच हो तो हकीकत बाहर आएगी।
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अल्ट्रासाउंड केंद्रों के संचालक के पास रेडियोलॉजिस्ट की डिग्री होने के साथ एक प्रशिक्षित महिला की उपस्थिति अनिवार्य होती है। लेकिन जिले में इसका पालन नाममात्र केंद्रों पर होता दिख रहा है। स्वास्थ्य विभाग की कृपा से बेरोकटोक चल रहे इस धंधे से अयोग्य संचालक मालामाल हो रहे हैं तो जांच रिपोर्ट सही न होने से जनता के जीवन को खतरा पैदा कर रहे हैं। एक ओर सरकार जनता के स्वास्थ्य और बीमारियों से सुरक्षा के लिए गंभीर है तो दूसरी ओर से स्वास्थ्य विभाग के अनदेखी से लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ किए जाने पर लगाम नहीं लग पा रहा है।
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ऐसे सेंटर के रेट भी अलग-अलग हैं। मगर, विभागीय जिम्मेदारों की मौन प्रणाली ने इस धंधे को और बल दे दिया है। इससे मरीज माफिया और धंधेबाज डर नहीं, बल्कि सह पाकर मरीजों के साथ छल करके मालामाल हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से मिली जानकारी के अनुसार जिले में कुल 118 अल्ट्रासाउंड केंद्र संचालित हो रहे हैं, इसमें तीन सरकारी हैं। मेडिकल कॉलेज, जिला और महिला अस्पताल शामिल हैं।
नामी सेंटर पर भी अव्यवस्था : नामी अल्ट्रासाउंड जांच केंद्र पर अव्यवस्था और है। बाहर न पंजीकरण नंबर, न बोर्ड, रेडियोलॉजिस्ट कौन है यह भी नहीं होता, बावजूद इसके ये सेंटर धड़ल्ले से चल रहे हैं। मरीज को बुला तो लेते हैं, मगर न बैठने की व्यवस्था, न पानी, न छाजन न ही वेटिंग एरिया है।
बताते हैं कि डॉक्टर का नाम तक नहीं प्रदर्शित है, न ही स्पष्ट हस्ताक्षर है। डॉक्टर कौन है, यह भी नहीं पता चलता। सूत्रों के अनुसार, सेंटर का पंजीकरण किसी और नाम डॉक्टर के नाम पर है, जबकि जांच एक सरकारी डॉक्टर कर रहे हैं। फिर भी नौ सौ रुपये जमा करके रिपोर्ट दी जा रही है।
इसी प्रकार कैली रोड पर स्थित एक सेंटर नाले पर ही खुल गया है। यहां भी मरीज सेटिंग से पहुंच रहे, लेकिन सुविधा न के बराबर है। यहां से नौ सौ रुपये लेकर रिपोर्ट दी जाती है। ये दो सेंटर महज बानगी भर है, शहर में गली-मोहल्ले में एक कमरे में चल रहे सेंटरों की जांच हो तो हकीकत बाहर आएगी।