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Basti News: गैस की किल्लत...सख्ती तो बढ़ी तो बढ़ गया इंतजार
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श्रीराम गैस एजेंसी रौतापार पर उपभोक्ताओं की लगी लंबी लाइन। संवाद
- फोटो : संस्थान
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बस्ती। ऑयल कंपनियों ने रसोई गैस की आपूर्ति का नियम बदल दिया है। कालाबाजारी रोकने के लिए कंपनियां अब 95 प्रतिशत ओटीपी के आधार पर ही सिलिंडर आवंटित कर रही हैं।
इससे उपभोक्ताओं का इंतजार बढ़ गया है वहीं एजेंसी संचालकों का कहना है कि ओटीपी प्रक्रिया पूरी करने में समय लग रहा है। इसीलिए एजेंसियों पर उपभोक्ताओं की भीड़ कम नहीं हो रही है। कुछ एजेंसी संचालक कंपनियों के इस नियम पर नाराजगी जताए हैं। मगर प्रशासन इसमें हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया है।
जानकारों के अनुसार पहले एजेंसियों पर रसोई गैस सिलिंडर की आपूर्ति 30 प्रतिशत ओटीपी के आधार पर होती रही। इसका आशय यह हैं कि एक गाड़ी में यदि 350 सिलिंडर आते हैं तो उसका तीस प्रतिशत डिलीवरी ओटीपी ऑनलाइन कंपनी में शो होना चाहिए। 70 प्रतिशत सिलिंडर बिना ओटीपी के आते रहे। इसे एजेंसी संचालक की ओर से वितरण किया जाता था।
अब यह व्यवस्था बदल दी गई है। कंपनी से एक गाड़ी सिलिंडर तभी भेजा जा रहा है जब 95 प्रतिशत उपभोक्ताओं की डिलेवरी ओटीपी ऑनलाइन शो कर रही है। केवल पांच प्रतिशत सिलिंडर ही एजेंसियों पर बिना ओटीपी के आ रहे हैं।
कंपनी का मानना है कि ऑनलाइन ओटीपी के आधार पर सिलिंडर भेजने से जमाखोरी या कालाबाजारी की गुंजाइश नहीं रह जाएगी। इधर एजेंसी संचालकों की दलील हैं उनके ऊपर तमाम नौकरी पेशा, प्रभावशाली, सामाजिक कार्यकर्ता का भी सिलिंडर लेने के लिए दबाव रहता है। इस वजह से एजेंसियों पर विवाद होने की स्थिति उत्पन्न हो जा रही है।
एजेंसियों पर रसोई गैस के लिए पहुंच रही भीड़ नियंत्रित नहीं हो पा रही है। एक उपभोक्ता के बुकिंग और डिलीवरी की प्रक्रिया पूरी होने 15 से 20 मिनट लग रहा है। तब तक लाइन और लंबी हो जा रही है। इसी वजह से सुबह नौ बजे से दिन में तीन बजे तक दो सौ से ढाई सौ लोगों को ही सिलिंडर मिल पा रहा है। सिलिंडर के लिए पूर्ति कार्यालय पहुंच रहे लोग : सिलिंडर के लिए एजेंसियों पर लाइन देखकर लोग पूर्ति कार्यालय पहुंच रहे हैं। यहां डीएसओ लोगों से मिलने से मना कर रहे हैं। यदि कोई उनके चैंबर में पहुंच रहा है तो लिपिक नवीन कुमार से मिलने की बात कहकर लौटा दे रहे हैं।
मंगलवार को पहुंचे मोनू शुक्ल ने बताया कि एजेंसी से बुकिंग के बाद भी सिलिंडर की डिलीवरी नहीं की गई है। डीएसओ से मिलने आए तो उन्होंने बाबू के पास भेज दिया। बाबू ने एजेंसी पर जाकर समस्या बताने की बात कहीं। इस तरह उपभोक्ताओं को कहीं भी राहत नहीं मिल रही है।
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इससे उपभोक्ताओं का इंतजार बढ़ गया है वहीं एजेंसी संचालकों का कहना है कि ओटीपी प्रक्रिया पूरी करने में समय लग रहा है। इसीलिए एजेंसियों पर उपभोक्ताओं की भीड़ कम नहीं हो रही है। कुछ एजेंसी संचालक कंपनियों के इस नियम पर नाराजगी जताए हैं। मगर प्रशासन इसमें हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया है।
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जानकारों के अनुसार पहले एजेंसियों पर रसोई गैस सिलिंडर की आपूर्ति 30 प्रतिशत ओटीपी के आधार पर होती रही। इसका आशय यह हैं कि एक गाड़ी में यदि 350 सिलिंडर आते हैं तो उसका तीस प्रतिशत डिलीवरी ओटीपी ऑनलाइन कंपनी में शो होना चाहिए। 70 प्रतिशत सिलिंडर बिना ओटीपी के आते रहे। इसे एजेंसी संचालक की ओर से वितरण किया जाता था।
अब यह व्यवस्था बदल दी गई है। कंपनी से एक गाड़ी सिलिंडर तभी भेजा जा रहा है जब 95 प्रतिशत उपभोक्ताओं की डिलेवरी ओटीपी ऑनलाइन शो कर रही है। केवल पांच प्रतिशत सिलिंडर ही एजेंसियों पर बिना ओटीपी के आ रहे हैं।
कंपनी का मानना है कि ऑनलाइन ओटीपी के आधार पर सिलिंडर भेजने से जमाखोरी या कालाबाजारी की गुंजाइश नहीं रह जाएगी। इधर एजेंसी संचालकों की दलील हैं उनके ऊपर तमाम नौकरी पेशा, प्रभावशाली, सामाजिक कार्यकर्ता का भी सिलिंडर लेने के लिए दबाव रहता है। इस वजह से एजेंसियों पर विवाद होने की स्थिति उत्पन्न हो जा रही है।
एजेंसियों पर रसोई गैस के लिए पहुंच रही भीड़ नियंत्रित नहीं हो पा रही है। एक उपभोक्ता के बुकिंग और डिलीवरी की प्रक्रिया पूरी होने 15 से 20 मिनट लग रहा है। तब तक लाइन और लंबी हो जा रही है। इसी वजह से सुबह नौ बजे से दिन में तीन बजे तक दो सौ से ढाई सौ लोगों को ही सिलिंडर मिल पा रहा है। सिलिंडर के लिए पूर्ति कार्यालय पहुंच रहे लोग : सिलिंडर के लिए एजेंसियों पर लाइन देखकर लोग पूर्ति कार्यालय पहुंच रहे हैं। यहां डीएसओ लोगों से मिलने से मना कर रहे हैं। यदि कोई उनके चैंबर में पहुंच रहा है तो लिपिक नवीन कुमार से मिलने की बात कहकर लौटा दे रहे हैं।
मंगलवार को पहुंचे मोनू शुक्ल ने बताया कि एजेंसी से बुकिंग के बाद भी सिलिंडर की डिलीवरी नहीं की गई है। डीएसओ से मिलने आए तो उन्होंने बाबू के पास भेज दिया। बाबू ने एजेंसी पर जाकर समस्या बताने की बात कहीं। इस तरह उपभोक्ताओं को कहीं भी राहत नहीं मिल रही है।