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Bulandshahar News: बिटिया चारू का शव मिलते ही दौड़ पड़ा शहर, हर आंख हुई नम...दिल हुआ भारी
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काली नदी से छात्रा चारु को निकलने वाले गोताखोरों को सम्मानित करते समाजसेवी। संवाद
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बुलंदशहर। पांच दिन तक उम्मीद थी...शायद चारू सकुशल मिल जाएगी। 93 घंटे बाद जब खबर आई कि वह काली नदी में मिल गई है तो पूरा शहर दौड़ पड़ा लेकिन जिंदा न मिलने पर लोग मायूस हो गए। काली नदी से लेकर पोस्टमार्टम हाउस और श्मशान घाट तक सिर्फ सिसकियां थीं।
बच्चे रो रहे थे, बुजुर्ग बिलख रहे थे। हर आंख नम...हर दिल भारी था। क्योंकि 11 साल की चारू खुले नाले और एक लापरवाही की भेंट चढ़ गई थी।
शनिवार सुबह तक माता-पिता और परिवार के साथ जिले की 45 लाख आबादी की हर आंख को बस एक ही तलाश थी कि चारू कहां मिलेगी। घर के अंदर बैठी चारू की मां ज्ञानवती भी दरवाजे पर रखीं चारू की चप्पलों को निहारतीं और उसके कपड़ों की तरफ देखकर उसको बार-बार आवाज देतीं बेटा तू कब आएगी, लेकिन सुबह करीब 10 बजे आए फोन ने उनकी दुनिया ही उजाड़ दी।
फोन से धीमी आवाज आई...अब चारू हमारे बीच में नहीं रही। मां ने दहाड़ मारकर रोना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे चारू के शव मिलने की खबर फैलती गई, वैसे-वैसे लोग काली नदी की ओर दौड़ पड़े। वहां पहुंचकर पता चला कि शव को पोस्टमार्टम हाउस ले गए हैं, तो लोगों ने उधर की ओर दौड़ लगा दी।
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कोई ऑटो तो कोई ई-रिक्शा तो कोई बाइक से वहां पहुंचा। कुछ लोग तो बिना चप्पल पहने ही भागने लगे। देखते ही देखते पोस्टमार्टम हाउस पर हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ बिटिया के शव की एक झलक पाने के लिए एकत्रित हो गई।
काफी संख्या में महिलाएं भी पहुंच गईं। सभी की आंखों में आंसू थे और वह चारू को याद करके बार-बार बस एक ही बात कह रहे थे कि इस मासूम बिटिया का दम कैसे निकला होगा, उस वक्त उसके ऊपर क्या बीती होगी? भगवान उसकी आत्मा को शांति दे।
इसी दौरान कुछ महिलाओं ने आसमान की ओर हाथ जोड़े और बोली भगवान अब किसी की बेटी के साथ ऐसा मत करना जो वह इस कष्ट को सहन न कर पाए। इसी दौरान परिवार रिश्तेदारी की और महिलाएं आ गईं। एक वक्त पोस्टमार्टम हाउस से लेकर श्मशान घाट तक सिसकियों की आवाज थी। जिसने कभी चारू को देखा भी नहीं वह भी उसकी अंतिम यात्रा में आंसू बहा रहा था।
रास्ते की दुकानें कर दी बंद...हाथ जोड़कर खड़े हो गए लोग
पोस्टमार्टम हाउस से चारू के शव को वैसे तो एंबुलेंस के माध्यम से श्मशान घाट तक ले जाया गया। एंबुलेंस के आगे पीछे गाड़ियों के काफिले चल रहे थे, जैसे-जैसे लोगों को पता चला कि चारू का शव एंबुलेंस में जा रहा है तो लोग दुकान और घरों के बाहर हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
चारू की आत्मा शांति के लिए प्रार्थना करने लगे। कुछ लोग एंबुलेंस के पीछे की भागने लगे जबकि कुछ लोग अपनी दुकानें बंद कर श्मशान घाट पर ही पर श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंच गए।
सोशल मीडिया पर बिटिया को श्रद्धांजलि
लोगों को जैसे-जैसे पता चला कि चारू बिटिया अब हमारे बीच नहीं रही तो उसके फोटो के साथ हजारों की संख्या में लोगों ने पोस्ट कर श्रद्धांजलि दी। श्रद्धांजलि के दौरान किसी ने नगर पालिका, तो किसी ने प्रशासन तो किसी ने स्कूल को उसकी मौत का जिम्मेदार ठहराया।
योगेश कुमार, सोनू, मोहित ने पूरे सरकारी तंत्र पर भी सवाल उठाए...लिखा हादसों के बाद भी चेत जाते तो बिटिया बच जाती। खुले नालों में गिरकर पहले भी बच्चों की मौत हुई है, लेकिन समाधान कुछ नहीं। ऐसे ही हादसे होते रहेंगे...और हम श्रद्धांजलि देते रहेंगे।
शनिवार को काली नदी पर दिखा सुनसान माहौल
बुलंदशहर। चारू की काली नदी में तलाश किए जाने के दौरान उसके किसी भी समय मिलने की आस में परिवार के लोगों के अलावा, मोहल्ले व क्षेत्र के लोगों का हर समय काली नदी पर जमावड़ा लगा रहता था। लोगों की भीड़ को काली नदी पर देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि दुख की इस घड़ी में पूरा शहर पीड़ित परिवार के दुख में शामिल हैं।
तलाशी के दौरान दिनभर काली नदी पर रहने वाले चहल-पहल शनिवार को गायब हो गई। शनिवार को काली नदी पर सुनसान माहौल था। काली नदी के श्मशान घाट पर ही चारू का अंतिम संस्कार किया गया। राष्ट्रीय चेतना मिशन ने चारू के अंतिम संस्कार में सहयोग किया। इस अवसर पर मिशन के जिलाध्यक्ष हेमंत सिंह, जिला उपासना प्रमुख आचार्य कृष्ण गिरी, सेवा प्रमुख अनिल कुमार गिरी और सदस्य मौजूद रहे। संवाद
मगरमच्छ दिखने के बाद भी डटे रहे गोताखोर, जान जोखिम में डालकर चलाया सर्च अभियान
काली नदी में लापता छात्रा चारू की तलाश का अभियान साहस, धैर्य और मानवता की मिसाल बन गया। करीब 23 घंटे तक चले कठिन अभियान के बाद बागपत के गोताखोरों ने नदी से चारू का शव बरामद कर लिया। तलाशी के दौरान नदी में मगरमच्छ भी दिखाई दिया था लेकिन गोताखोरों के हौसले नहीं डगमगाए और अपनी जान जोखिम में डालकर तलाश जारी रखी।
शुक्रवार को एनडीआरएफ की टीम के अभियान खत्म करने के बाद बागपत से आए गोताखोरों ने मोर्चा संभाला। करीब 26 साल का अनुभव रखने वाले बागपत के गोताखोर इरफान के नेतृत्व में टीम ने नदी के उस हिस्से में दोबारा सर्च शुरू किया, जहां तेज बहाव, गाद और कूड़े के कारण अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण था।
इरफान के अनुसार, तलाश के दौरान टीम को नदी में मगरमच्छ भी दिखाई दिया। कुछ देर के लिए सतर्कता बढ़ाई गई लेकिन किसी ने पीछे हटने का फैसला नहीं किया। सुरक्षा का ध्यान रखते हुए पूरी टीम ने अभियान जारी रखा और आखिरकार चारू का शव खोज निकाला।
इरफान बोले, कठिन समय में ही दिखती है सफलता
बागपत से आए गोताखोर टीम के प्रमुख सदस्य करीब 52 वर्षीय इरफान ने कहा कि कठिन समय में ही सफलता के लिए प्रयास किया जाए तो वह दिखती है। कहा कि अखबारों व मीडिया के माध्यम से उन्हें बच्ची के लापता होने की जानकारी मिली थी।
जिसके चलते उन्होंने खुद बेटी को खोजने के लिए इच्छा जाहिर की थी। जिसके बाद जिला प्रशासन ने सहमति दी थी। बताया कि टीम में उनके साथ फारुख, इस्लाम, नईम, मुस्तफा, शरीफ, राकिब और नौशाद समेत अन्य सदस्यों ने बेटी को बरामद करने में अहम भूमिका निभाई।
कूड़े पर पेट के बल लेटकर की तलाश
काली नदी के करीब 12 फीट गहरे पानी में गोताखोरों को कूड़े और जलकुंभी के बीच पेट के बल लेटकर धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ा। काली नदी में पानी के ऊपर जमे कूड़े पर चलना संभव नहीं था तो टीम ने पेट के बल लेटकर चारू की तलाश की। विषम परिस्थितियों के बावजूद टीम ने धैर्य और अनुभव का परिचय दिया।
अनूपशहर, नरौरा के गोताखोरों ने कर दिया था इन्कार
काली नदी की गहराई, गंदे पानी, गाद और मगरमच्छ की मौजूदगी की आशंका को देखते हुए अनूपशहर और नरौरा से बुलाए गए गोताखोरों ने नदी में उतरने से इन्कार कर दिया था। ऐसे कठिन हालात में इरफान और उनकी टीम ने जिम्मेदारी उठाई। जोखिम भरे अभियान को पूरा कर उन्होंने न केवल चारू के परिजनों को बेटी का अंतिम दर्शन कराया बल्कि साहस और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल भी पेश की।
चारू का शव बरामद करने वाले गोताखोर सम्मानित
काली नदी से 11 वर्षीय चारू कश्यप का शव बरामद करने वाले बागपत के गोताखोरों को श्री सप्त भवानी अखाड़ा (रजि.) की ओर से सम्मानित किया गया। टीम के सदस्यों ने गोताखोरों को माला पहनाकर और शील्ड भेंट कर उनके साहस व सेवा भावना की सराहना की।
वक्ताओं ने कहा कि गोताखोरों ने पीएसी और एसडीआरएफ के साथ मिलकर चार दिन तक चले अभियान के बाद करीब 93 घंटे में चारू का शव बरामद कर परिजनों को सौंपा। इस दौरान दिवंगत चारू को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की गई।
पूरी रात नहीं आई नींद... मन बार-बार कह रहा था, आज मिल जाएगी मेरी चारू
पिता रिंकू बोले, सुबह 10 बजे साले सुनील का फोन आया तो एक पल में बिखर गई सारी दुनिया
पांच दिनों से बेटी की एक झलक पाने की उम्मीद में जी रहे चारू के पिता रिंकू की आंखें आखिरकार उस दर्द से भर गईं, जिसकी कल्पना कोई पिता नहीं करता है। चारू का शव मिलने के बाद रुंधे गले से उन्होंने कहा, हर रात थोड़ी-बहुत नींद आ जाती थी लेकिन शुक्रवार पूरी रात एक पल भी आंख नहीं लगी। पता नहीं क्यों... बार-बार मन कह रहा था कि आज मेरी चारू मिल जाएगी।
रिंकू ने बताया कि रातभर वह कभी घर के बाहर टहलते रहे तो कभी बेटी की तस्वीर देखते रहे। हर आहट पर लगता था कि शायद कोई अच्छी खबर लेकर आया है। मन में एक अनजाना एहसास था कि इंतजार आज खत्म होगा लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह इंतजार उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दुख बन जाएगा।
शनिवार सुबह करीब 10 बजे उनके साले सुनील का फोन आया। फोन उठाते ही उधर से सिर्फ इतना सुनाई दिया कि चारू मिल गई...। यह सुनते ही रिंकू की सांसें जैसे थम सी गईं। अगले ही पल पता चला कि चारू अब इस दुनिया में नहीं रही। यह सुनते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस बेटी को सीने से लगाने का सपना पांच दिनों से आंखों में संजोए थे, वह अब हमेशा के लिए उनसे दूर जा चुकी थी।
बोले, अंतिम बार गले भी नहीं लगा पाया
रिंकू की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। वह बार-बार बस एक ही बात दोहराते रहे कि मेरी चारू तो मिल गई लेकिन मुझे छोड़कर हमेशा के लिए चली गई। कहा कि वह चारू को अंतिम बार गले लगाना चाहते थे लेकिन वह अधिकार भी ईश्वर ने उनसे छीन लिया। उनकी यह बातें सुनकर वहां मौजूद लोगों की भी आंखें नम हो गईं। एक पिता की टूटती उम्मीद और बिखरते सपनों का यह दर्द हर किसी के दिल को चीर गया।
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शनिवार सुबह तक माता-पिता और परिवार के साथ जिले की 45 लाख आबादी की हर आंख को बस एक ही तलाश थी कि चारू कहां मिलेगी। घर के अंदर बैठी चारू की मां ज्ञानवती भी दरवाजे पर रखीं चारू की चप्पलों को निहारतीं और उसके कपड़ों की तरफ देखकर उसको बार-बार आवाज देतीं बेटा तू कब आएगी, लेकिन सुबह करीब 10 बजे आए फोन ने उनकी दुनिया ही उजाड़ दी।
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काफी संख्या में महिलाएं भी पहुंच गईं। सभी की आंखों में आंसू थे और वह चारू को याद करके बार-बार बस एक ही बात कह रहे थे कि इस मासूम बिटिया का दम कैसे निकला होगा, उस वक्त उसके ऊपर क्या बीती होगी? भगवान उसकी आत्मा को शांति दे।
इसी दौरान कुछ महिलाओं ने आसमान की ओर हाथ जोड़े और बोली भगवान अब किसी की बेटी के साथ ऐसा मत करना जो वह इस कष्ट को सहन न कर पाए। इसी दौरान परिवार रिश्तेदारी की और महिलाएं आ गईं। एक वक्त पोस्टमार्टम हाउस से लेकर श्मशान घाट तक सिसकियों की आवाज थी। जिसने कभी चारू को देखा भी नहीं वह भी उसकी अंतिम यात्रा में आंसू बहा रहा था।
रास्ते की दुकानें कर दी बंद...हाथ जोड़कर खड़े हो गए लोग
पोस्टमार्टम हाउस से चारू के शव को वैसे तो एंबुलेंस के माध्यम से श्मशान घाट तक ले जाया गया। एंबुलेंस के आगे पीछे गाड़ियों के काफिले चल रहे थे, जैसे-जैसे लोगों को पता चला कि चारू का शव एंबुलेंस में जा रहा है तो लोग दुकान और घरों के बाहर हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
चारू की आत्मा शांति के लिए प्रार्थना करने लगे। कुछ लोग एंबुलेंस के पीछे की भागने लगे जबकि कुछ लोग अपनी दुकानें बंद कर श्मशान घाट पर ही पर श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंच गए।
सोशल मीडिया पर बिटिया को श्रद्धांजलि
लोगों को जैसे-जैसे पता चला कि चारू बिटिया अब हमारे बीच नहीं रही तो उसके फोटो के साथ हजारों की संख्या में लोगों ने पोस्ट कर श्रद्धांजलि दी। श्रद्धांजलि के दौरान किसी ने नगर पालिका, तो किसी ने प्रशासन तो किसी ने स्कूल को उसकी मौत का जिम्मेदार ठहराया।
योगेश कुमार, सोनू, मोहित ने पूरे सरकारी तंत्र पर भी सवाल उठाए...लिखा हादसों के बाद भी चेत जाते तो बिटिया बच जाती। खुले नालों में गिरकर पहले भी बच्चों की मौत हुई है, लेकिन समाधान कुछ नहीं। ऐसे ही हादसे होते रहेंगे...और हम श्रद्धांजलि देते रहेंगे।
शनिवार को काली नदी पर दिखा सुनसान माहौल
बुलंदशहर। चारू की काली नदी में तलाश किए जाने के दौरान उसके किसी भी समय मिलने की आस में परिवार के लोगों के अलावा, मोहल्ले व क्षेत्र के लोगों का हर समय काली नदी पर जमावड़ा लगा रहता था। लोगों की भीड़ को काली नदी पर देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि दुख की इस घड़ी में पूरा शहर पीड़ित परिवार के दुख में शामिल हैं।
तलाशी के दौरान दिनभर काली नदी पर रहने वाले चहल-पहल शनिवार को गायब हो गई। शनिवार को काली नदी पर सुनसान माहौल था। काली नदी के श्मशान घाट पर ही चारू का अंतिम संस्कार किया गया। राष्ट्रीय चेतना मिशन ने चारू के अंतिम संस्कार में सहयोग किया। इस अवसर पर मिशन के जिलाध्यक्ष हेमंत सिंह, जिला उपासना प्रमुख आचार्य कृष्ण गिरी, सेवा प्रमुख अनिल कुमार गिरी और सदस्य मौजूद रहे। संवाद
मगरमच्छ दिखने के बाद भी डटे रहे गोताखोर, जान जोखिम में डालकर चलाया सर्च अभियान
काली नदी में लापता छात्रा चारू की तलाश का अभियान साहस, धैर्य और मानवता की मिसाल बन गया। करीब 23 घंटे तक चले कठिन अभियान के बाद बागपत के गोताखोरों ने नदी से चारू का शव बरामद कर लिया। तलाशी के दौरान नदी में मगरमच्छ भी दिखाई दिया था लेकिन गोताखोरों के हौसले नहीं डगमगाए और अपनी जान जोखिम में डालकर तलाश जारी रखी।
शुक्रवार को एनडीआरएफ की टीम के अभियान खत्म करने के बाद बागपत से आए गोताखोरों ने मोर्चा संभाला। करीब 26 साल का अनुभव रखने वाले बागपत के गोताखोर इरफान के नेतृत्व में टीम ने नदी के उस हिस्से में दोबारा सर्च शुरू किया, जहां तेज बहाव, गाद और कूड़े के कारण अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण था।
इरफान के अनुसार, तलाश के दौरान टीम को नदी में मगरमच्छ भी दिखाई दिया। कुछ देर के लिए सतर्कता बढ़ाई गई लेकिन किसी ने पीछे हटने का फैसला नहीं किया। सुरक्षा का ध्यान रखते हुए पूरी टीम ने अभियान जारी रखा और आखिरकार चारू का शव खोज निकाला।
इरफान बोले, कठिन समय में ही दिखती है सफलता
बागपत से आए गोताखोर टीम के प्रमुख सदस्य करीब 52 वर्षीय इरफान ने कहा कि कठिन समय में ही सफलता के लिए प्रयास किया जाए तो वह दिखती है। कहा कि अखबारों व मीडिया के माध्यम से उन्हें बच्ची के लापता होने की जानकारी मिली थी।
जिसके चलते उन्होंने खुद बेटी को खोजने के लिए इच्छा जाहिर की थी। जिसके बाद जिला प्रशासन ने सहमति दी थी। बताया कि टीम में उनके साथ फारुख, इस्लाम, नईम, मुस्तफा, शरीफ, राकिब और नौशाद समेत अन्य सदस्यों ने बेटी को बरामद करने में अहम भूमिका निभाई।
कूड़े पर पेट के बल लेटकर की तलाश
काली नदी के करीब 12 फीट गहरे पानी में गोताखोरों को कूड़े और जलकुंभी के बीच पेट के बल लेटकर धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ा। काली नदी में पानी के ऊपर जमे कूड़े पर चलना संभव नहीं था तो टीम ने पेट के बल लेटकर चारू की तलाश की। विषम परिस्थितियों के बावजूद टीम ने धैर्य और अनुभव का परिचय दिया।
अनूपशहर, नरौरा के गोताखोरों ने कर दिया था इन्कार
काली नदी की गहराई, गंदे पानी, गाद और मगरमच्छ की मौजूदगी की आशंका को देखते हुए अनूपशहर और नरौरा से बुलाए गए गोताखोरों ने नदी में उतरने से इन्कार कर दिया था। ऐसे कठिन हालात में इरफान और उनकी टीम ने जिम्मेदारी उठाई। जोखिम भरे अभियान को पूरा कर उन्होंने न केवल चारू के परिजनों को बेटी का अंतिम दर्शन कराया बल्कि साहस और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल भी पेश की।
चारू का शव बरामद करने वाले गोताखोर सम्मानित
काली नदी से 11 वर्षीय चारू कश्यप का शव बरामद करने वाले बागपत के गोताखोरों को श्री सप्त भवानी अखाड़ा (रजि.) की ओर से सम्मानित किया गया। टीम के सदस्यों ने गोताखोरों को माला पहनाकर और शील्ड भेंट कर उनके साहस व सेवा भावना की सराहना की।
वक्ताओं ने कहा कि गोताखोरों ने पीएसी और एसडीआरएफ के साथ मिलकर चार दिन तक चले अभियान के बाद करीब 93 घंटे में चारू का शव बरामद कर परिजनों को सौंपा। इस दौरान दिवंगत चारू को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की गई।
पूरी रात नहीं आई नींद... मन बार-बार कह रहा था, आज मिल जाएगी मेरी चारू
पिता रिंकू बोले, सुबह 10 बजे साले सुनील का फोन आया तो एक पल में बिखर गई सारी दुनिया
पांच दिनों से बेटी की एक झलक पाने की उम्मीद में जी रहे चारू के पिता रिंकू की आंखें आखिरकार उस दर्द से भर गईं, जिसकी कल्पना कोई पिता नहीं करता है। चारू का शव मिलने के बाद रुंधे गले से उन्होंने कहा, हर रात थोड़ी-बहुत नींद आ जाती थी लेकिन शुक्रवार पूरी रात एक पल भी आंख नहीं लगी। पता नहीं क्यों... बार-बार मन कह रहा था कि आज मेरी चारू मिल जाएगी।
रिंकू ने बताया कि रातभर वह कभी घर के बाहर टहलते रहे तो कभी बेटी की तस्वीर देखते रहे। हर आहट पर लगता था कि शायद कोई अच्छी खबर लेकर आया है। मन में एक अनजाना एहसास था कि इंतजार आज खत्म होगा लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह इंतजार उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दुख बन जाएगा।
शनिवार सुबह करीब 10 बजे उनके साले सुनील का फोन आया। फोन उठाते ही उधर से सिर्फ इतना सुनाई दिया कि चारू मिल गई...। यह सुनते ही रिंकू की सांसें जैसे थम सी गईं। अगले ही पल पता चला कि चारू अब इस दुनिया में नहीं रही। यह सुनते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस बेटी को सीने से लगाने का सपना पांच दिनों से आंखों में संजोए थे, वह अब हमेशा के लिए उनसे दूर जा चुकी थी।
बोले, अंतिम बार गले भी नहीं लगा पाया
रिंकू की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। वह बार-बार बस एक ही बात दोहराते रहे कि मेरी चारू तो मिल गई लेकिन मुझे छोड़कर हमेशा के लिए चली गई। कहा कि वह चारू को अंतिम बार गले लगाना चाहते थे लेकिन वह अधिकार भी ईश्वर ने उनसे छीन लिया। उनकी यह बातें सुनकर वहां मौजूद लोगों की भी आंखें नम हो गईं। एक पिता की टूटती उम्मीद और बिखरते सपनों का यह दर्द हर किसी के दिल को चीर गया।

काली नदी से छात्रा चारु को निकलने वाले गोताखोरों को सम्मानित करते समाजसेवी। संवाद

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