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असहिष्णुता के दाैर में कर्बला का संदेश प्रासंगिक : मौलाना जाफर अली रिजवी
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दुलहीपुर मिल्कियाना सादात बस्ती में आयोजित कदमी मजलिस में उपस्थित मुस्लिम समाज के लोग। स्रोत:
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मुहर्रम की पहली तारीख पर नगर के वार्ड नंबर-14 स्थित अजाखाना-ए-रजा में बुधवार को मजलिसों का सिलसिला शुरू हो गया। दिल्ली से आए धर्मगुरु मौलाना जाफर अली रिजवी ने कहा कि इमाम हुसैन किसी एक धर्म या समुदाय के नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के रहनुमा थे।
उन्होंने कहा कि उनका जीवन सत्य, न्याय, त्याग और मानवता की रक्षा के लिए संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जब दुनिया नफरत, हिंसा और असहिष्णुता जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब कर्बला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
मौलाना जाफर अली रिजवी ने अपनी तकरीर में कहा कि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब को अपने नवासे इमाम हुसैन से विशेष मोहब्बत थी। उन्हें मालूम था कि एक दिन इमाम हुसैन इस्लाम और इंसानियत की हिफाजत के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देंगे।
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उन्होंने कहा कि कर्बला केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय के बीच की निर्णायक लड़ाई थी।
इमाम हुसैन चाहते तो सत्ता और ताकत के सामने समझौता कर सकते थे, लेकिन उन्होंने जुल्म के सामने झुकने के बजाय अपने परिवार और 72 साथियों के साथ शहादत का रास्ता चुना।डॉ. बबुआ के अजाखाना-ए-रजा में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी दस दिनों तक विशेष मजलिसों का आयोजन किया जा रहा है।
पहली मजलिस में चंदौली के अलावा वाराणसी, जौनपुर, मिर्जापुर, गाजीपुर समेत आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में अज़ादार शामिल हुए। मजलिस का आगाज मशहूर सोजख्वां मायल चंदौलवी ने अपने पुरअसर सोज से किया। पेशख्वानी शहंशाह मिर्जापुरी और शाहिद बनारसी ने की।
मजलिस के बाद अंजुमन गुलजार-ए-पंजतनी (ऐंलही) ने दर्दभरी नौहाख्वानी और मातम पेश कर इमाम हुसैन को खिराज -ए- अकीदत अर्पित किया। वहीं वाराणसी से आई अंजुमन हुसैनिया के सदस्यों ने नौहा पढ़कर करबला के शहीदों को याद किया, जिससे पूरा माहौल गम और श्रद्धा से सराबोर हो गया। सैम हॉस्पिटल के संचालक डॉ. एसजी इमाम ने बताया कि अजाखाना-ए-रजा में मजलिसों का कार्यक्रम लगातार दस दिनों तक चलेगा। पांच मुहर्रम को ताबूत और अलम का जुलूस निकाला जाएगा, जबकि आठ मुहर्रम को दुलदुल बरामद होगा। इस अवसर पर सैयद अली इमाम, सरवर भाई, रियाज अहमद, ताबिश, इंसाफ, बुद्धू आदि अज़ादार मौजूद रहे।
उन्होंने कहा कि उनका जीवन सत्य, न्याय, त्याग और मानवता की रक्षा के लिए संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जब दुनिया नफरत, हिंसा और असहिष्णुता जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब कर्बला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
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मौलाना जाफर अली रिजवी ने अपनी तकरीर में कहा कि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब को अपने नवासे इमाम हुसैन से विशेष मोहब्बत थी। उन्हें मालूम था कि एक दिन इमाम हुसैन इस्लाम और इंसानियत की हिफाजत के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देंगे।
उन्होंने कहा कि कर्बला केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय के बीच की निर्णायक लड़ाई थी।
इमाम हुसैन चाहते तो सत्ता और ताकत के सामने समझौता कर सकते थे, लेकिन उन्होंने जुल्म के सामने झुकने के बजाय अपने परिवार और 72 साथियों के साथ शहादत का रास्ता चुना।डॉ. बबुआ के अजाखाना-ए-रजा में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी दस दिनों तक विशेष मजलिसों का आयोजन किया जा रहा है।
पहली मजलिस में चंदौली के अलावा वाराणसी, जौनपुर, मिर्जापुर, गाजीपुर समेत आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में अज़ादार शामिल हुए। मजलिस का आगाज मशहूर सोजख्वां मायल चंदौलवी ने अपने पुरअसर सोज से किया। पेशख्वानी शहंशाह मिर्जापुरी और शाहिद बनारसी ने की।
मजलिस के बाद अंजुमन गुलजार-ए-पंजतनी (ऐंलही) ने दर्दभरी नौहाख्वानी और मातम पेश कर इमाम हुसैन को खिराज -ए- अकीदत अर्पित किया। वहीं वाराणसी से आई अंजुमन हुसैनिया के सदस्यों ने नौहा पढ़कर करबला के शहीदों को याद किया, जिससे पूरा माहौल गम और श्रद्धा से सराबोर हो गया। सैम हॉस्पिटल के संचालक डॉ. एसजी इमाम ने बताया कि अजाखाना-ए-रजा में मजलिसों का कार्यक्रम लगातार दस दिनों तक चलेगा। पांच मुहर्रम को ताबूत और अलम का जुलूस निकाला जाएगा, जबकि आठ मुहर्रम को दुलदुल बरामद होगा। इस अवसर पर सैयद अली इमाम, सरवर भाई, रियाज अहमद, ताबिश, इंसाफ, बुद्धू आदि अज़ादार मौजूद रहे।