Exclusive: ईरान से डिग्री हासिल करने के बाद ही उलेमा को मिलती है पगड़ी की इजाजत, आलिमों का ईरान से गहरा नाता
Varanasi News: वाराणसी के मजहबी इदारों और मस्जिदों में इमामत करने वाले आलिमों का ईरान से गहरा नाता है। वाराणसी और आसपास के इलाकों से हर साल कई छात्र इरान के कई शहरों के हौजा-ए-इल्मिया में ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन के साथ ही पीएचडी करने के लिए जाते हैं।
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काशी की सरजमीं का ईरान के साथ मजहबी और तालीमी रिश्ता बेहद मजबूत है। यहां के मजहबी इदारों और मस्जिदों में इमामत करने वाले आलिमों का ईरान से गहरा नाता है। दरअसल, ईरान से दीनी तालीम पूरी करके लौटने के बाद ही उन्हें पगड़ी (अमामा) पहनने की इजाजत होती है और यही अमामा उनके मुश्तहिद होने की पहचान है। ईरान के शहर कुम, मशहद और इस्फहान शिया इस्लामी तालीम के बड़े केंद्र हैं।
वाराणसी और आसपास के इलाकों से हर साल कई छात्र इन शहरों के हौजा-ए-इल्मिया में ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन के साथ ही पीएचडी करने के लिए जाते हैं। यहां फिक्ह, तफ्सीर, हदीस, अरबी व फारसी साहित्य के साथ-साथ इस्लामी दर्शन जैसे विषयों की वर्षों तक पढ़ाई करने के बाद वे डिग्री हासिल करते हैं। वतन लौटने पर उन्हें 'आलिम' के तौर पर पूर्ण मान्यता दी जाती है। मौजूदा समय में काशी में करीब 50 से ज्यादा शिया आलिम हैं, जिनमें से 90 फीसदी ने ईरान से ही की डिग्री हासिल की है।
अमामा यानी जिम्मेदारी का एहसास
अरबिया कॉलेज दोषीपुरा के प्रिंसिपल मौलाना अरशी ने भी ईरान से करीब 15 साल तक मजहबी तालीम हासिल की है। उनका कहना है कि पगड़ी यानी अमामा सिर्फ एक रवायत नहीं बल्कि जिम्मेदारी का एहसास है। इसे पहनने के बाद एक आलिम की जिम्मेदारी अपने मजहब और कौम के लिए कई गुना बढ़ जाती है। मुश्तहिद का दर्जा इमानिया अरबिया कॉलेज के मौलाना अमीन बताते हैं कि वरिष्ठ उलेमा यानी मुश्तहिद की मान्यता ईरान से ही मिलती है।
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मुश्तहिद वह आलिम होता है जो इस्लामी कानूनों की तशरीह यानी व्याख्या करने और नए मसलों पर शरीयत की रोशनी में अपना नजरिया रखने की काबिलियत रखता है। मौलाना अमीन ने 2002 से 2012 तक ईरान में रहकर पर्शियन लैंग्वेज में एमए और इस्लामिक थियोलॉजी (धर्ममीमांसा) में पीएचडी की है।