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Farrukhabad News: अपने कंधों से श्रद्धालु खींचते थे भगवान का रथ, जयकारों से बढ़ाया जाता था उत्साह
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कमालगंज। 180 साल का अद्भुत इतिहास समेटे कमालगंज की रामलीला अनूठी परंपराओं के लिए जानी जाती है। अब भले ही भगवान का रथ घोड़े खींचते हैं। पर, काफी वर्षों तक श्रद्धालुओं ने ही अपने कंधों से भगवान का रथ खींचा है।
कन्नौज में विशुनगढ़ राजा ने 180 साल पहले रामलीला का सामान कमालगंज में रामलीला कराने के लिए दिया था। रामलीला के सामान के साथ ही अभिनय करने वाले पात्रों के सिर पर सजने के लिए सोने के मुकुट भी राजा ने दिए थे।
रामलीला कमेटी के संरक्षक केशव गुप्ता बताते हैं कि तत्कालीन विशुनगढ़ नरेश अत्यधिक धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वह प्रभु श्रीराम के परम भक्त थे। उस समय कमालगंज में रामलीला नहीं होती थी। यहां रामलीला कराने के लिए उन्होंने भगवान के वस्त्र, मुकुट, तलवार, रामादल व राक्षसी सेना की पोशाकें आदि दी थीं। उनके पूर्वज उन्हें बताते थे कि मुकुट सोने के तारों व टिकुलियों से सजे थे। काफी साल चलने के बाद धीरे-धीरे सोने के मुकुट क्षतिग्रस्त हो गए।
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रामलीला कमेटी के पुराने कार्यकर्ताओं में शुमार मेवाराम गुप्ता कहते हैं कि कमालगंज की रामलीला मेल-मिलाप की रामलीला है। यहां सभी समुदाय मिलजुल कर प्रभु लीला के काज के पुण्य को भागीदार बनते हैं। यहां की रामलीला में पहले भगवान का सिंहासन (रथ) को श्रीराम के सेवक बनकर श्रद्धालुजन ही अपने कंधों से खींचते थे। लोग जयकारे लगाकर रथ खींचने वाले श्रद्धालुओं का उत्साह बढ़ाते थे।
बाद में बग्घी से निकलने लगी श्रीराम की सवारी
- आगे चलकर श्रद्धालुओं के कंधों के बजाय भगवान के रथ (सिंहासन) को दो बैलों की जोड़ी खींचने लगी। श्रीरामलीला कमेटी का सिंहासन जब क्षतिग्रस्त होकर खराब हो गया, वह मरम्मत के लायक भी नहीं रहा तो किराये की बग्घी से श्रीराम की शाही सवारी निकलने लगी। (संवाद)
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कन्नौज में विशुनगढ़ राजा ने 180 साल पहले रामलीला का सामान कमालगंज में रामलीला कराने के लिए दिया था। रामलीला के सामान के साथ ही अभिनय करने वाले पात्रों के सिर पर सजने के लिए सोने के मुकुट भी राजा ने दिए थे।
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रामलीला कमेटी के संरक्षक केशव गुप्ता बताते हैं कि तत्कालीन विशुनगढ़ नरेश अत्यधिक धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वह प्रभु श्रीराम के परम भक्त थे। उस समय कमालगंज में रामलीला नहीं होती थी। यहां रामलीला कराने के लिए उन्होंने भगवान के वस्त्र, मुकुट, तलवार, रामादल व राक्षसी सेना की पोशाकें आदि दी थीं। उनके पूर्वज उन्हें बताते थे कि मुकुट सोने के तारों व टिकुलियों से सजे थे। काफी साल चलने के बाद धीरे-धीरे सोने के मुकुट क्षतिग्रस्त हो गए।
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रामलीला कमेटी के पुराने कार्यकर्ताओं में शुमार मेवाराम गुप्ता कहते हैं कि कमालगंज की रामलीला मेल-मिलाप की रामलीला है। यहां सभी समुदाय मिलजुल कर प्रभु लीला के काज के पुण्य को भागीदार बनते हैं। यहां की रामलीला में पहले भगवान का सिंहासन (रथ) को श्रीराम के सेवक बनकर श्रद्धालुजन ही अपने कंधों से खींचते थे। लोग जयकारे लगाकर रथ खींचने वाले श्रद्धालुओं का उत्साह बढ़ाते थे।
बाद में बग्घी से निकलने लगी श्रीराम की सवारी
- आगे चलकर श्रद्धालुओं के कंधों के बजाय भगवान के रथ (सिंहासन) को दो बैलों की जोड़ी खींचने लगी। श्रीरामलीला कमेटी का सिंहासन जब क्षतिग्रस्त होकर खराब हो गया, वह मरम्मत के लायक भी नहीं रहा तो किराये की बग्घी से श्रीराम की शाही सवारी निकलने लगी। (संवाद)