Gyanvapi: एएसआई ने सर्वे में कौन-कौन से वैज्ञानिक परीक्षण किए, क्या हैं वो विधियां? जिसके बाद तैयार की रिपोर्ट
अंजुमन कमेटी ने एएसआई की सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर आपत्ति जताई थी, जबकि चार महिला वादियों के अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन ने कहा था कि यह सार्वजनिक होनी चाहिए। आइए जानते हैं ज्ञानवापी के सर्वे में एएसआई ने किन-किन तकनीक या वैज्ञानिक विधियों का इस्तेमाल किया गया।
विस्तार
ज्ञानवापी परिसर की सीलबंद एएसआई सर्वे रिपोर्ट को लेकर जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत ने बुधवार को फैसला सुनाया था। जिला जज ने वादी पक्ष को सर्वे रिपोर्ट दिए जाने का आदेश दिया, जिसके बाद गुरुवार को कोर्ट ने सर्वे की नकल गुरुवार को पांच लोगों को दे दी गई। मुकदमे से संबंधित पक्षकारों ने गुरुवार को अदालत में नकल दिए जाने को लेकर प्रार्थना पत्र दिया था। सर्वे रिपोर्ट मिलने के बाद हिंदू पक्षकारों ने दावा किया है कि सर्वे में मिले 32 प्रमाण बता रहे ज्ञानवापी कभी मंदिर था। आइए जानते हैं ज्ञानवापी के सर्वे में एएसआई ने किन-किन तकनीक या वैज्ञानिक विधियों का इस्तेमाल किया।
कलाकृति और बनावट की जांच के लिए सीएसवीबीपी की ली गई मदद
दीवारों, खंभों और छत की माप के लिए कांबिनेशन सेंट वर्नियर बैवल प्रोट्रेक्टर (CSVBP) की मदद ली गई। इसके जरिये उसकी बनावट, कलाकृति आदि की जांच की गई। एएसआई की टीम ने प्रशासनिक अधिकारियों से हुई चर्चा में बताया कि दर्ज किए गए आंकड़े व नक्शे आदि का मिलान भी किया गया।
सतह-निर्माण की जांच के बाद आंकड़े टोपोग्राफी शीट पर दर्ज किए
एएसआई की टीम ने सतह, निर्माण और बनावट आदि की जांच के बाद मशीनों से मिलने वाले आंकड़े को टोपोग्राफी शीट पर दर्ज किए। इसके जरिये सतह के आकार और कलाकृतियों का अध्ययन किया जाता है।
रडार विधि का भी लिया गया सहारा
ज्ञानवापी के सर्वे में हैदराबाद की ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) की टीम ने निर्धारित मानकों पर कार्रवाई की। ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार ऐसी तकनीक है जिससे किसी भी वस्तु या ढांचे से बिना छेड़छाड़ किए उसके नीचे मौजूद कंक्रीट, धातु, केबल या किसी अन्य वस्तुओं की पहचान की जा सकती है। इस प्रक्रिया में10 मेगा हर्टज और 2.6 मेगा हर्टज के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन की मदद से ऐसे सिग्नल प्राप्त किए जाते हैं जो यह बताने में सक्षम हैं कि किसी भी वस्तु के अंदरुनी हिस्से में क्या मौजूद है। इस विधि से किसी बड़ी चट्टान के अंदर मौजूद धातु या अन्य किसी पदार्थ की पहचान की जा सकती है।
सारनाथ के वैज्ञानिक सर्वे में भी रडार तकनीक का हुआ था प्रयोग
बीएचयू के इतिहासकार प्रो. अशोक सिंह के मुताबिक, अब तो माइक्रो डेटिंग का जमाना है, अगर एक अनाज का दाना भी मिल गया तो उसकी डेटिंग से उसकी असली तारीख पता चल जाएगी। पहले भी सारनाथ का सर्वे किया था। सर्वे के जरिये देखने का प्रयास हुआ था कि जो स्ट्रक्चर दिख रहा है, उसके अतिरिक्त और क्या-क्या है? वर्तमान में जो कुछ दिख रहा है, उससे ज्यादा सारनाथ की जमीन के नीचे है। रडार सर्वे तकनीक के जरिये तीन से चार मीटर का सर्वे हुआ था। एएसआई के सामने रडार सर्वे के अलावा ट्रेंच लगाने का भी विकल्प है।
चार हिस्से में बंटकर किया गया सर्वे
एएसआई की टीम ने चार हिस्से में बंटकर ज्ञानवापी की मौजूदा इमारत के चार अलग-अलग दिशाओं में सर्वे किया है। इसके लिए मौजूदा इमारत को चार सेक्टर में बांटा गया था। बाहरी हिस्से की मैपिंग, इमेजिंग और स्कैनिंग के बाद मुख्य रूप से फोकस आंतरिक हिस्से के सर्वे में किया गया था।