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Jalaun News: 30 साल से स्नातक विधायक पद पर काबिज नहीं हो सके बुंदेलखंडी
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उरई। झांसी-इलाहाबाद खंड स्नातक विधायक निर्वाचन में दस जिले शामिल हैं, जिनमें से बुंदेलखंड के अकेले सात हैं। इसके बावजूद एक समय प्रयागराज के सबसे अधिक वोटर होने के चलते बने वर्चस्व को तोड़ने में बुंदेलखंडी कामयाब रहे थे। हालांकि तीन चुनाव बाद यह वर्चस्व फिर प्रयागराज अपने पाले में ले आया और 30 साल से बुंदेलखंडी इस सीट पर अपनी जगह नहीं बना सके। हालांकि इस बार भाजपा ने बुंदेलखंड के जालौन से प्रत्याशी उतारकर अलग करने का प्रयास किया है।
वर्ष 1952 के शुरुआती दौर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. ईश्वरी प्रसाद निर्दलीय होकर इस सीट पर लगातार तीन जीत हासिल करने में कामयाब रहे और उन्होंने इस चुनाव में प्रयागराज का वर्चस्व कायम कर दिया। इसके बाद वर्ष 1978 में बांदा के जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव ने जीत दर्ज कर बुंदेलखंड को पहली बार इस सीट पर काबिज कराया। उनके बाद 1984 व 1990 में झांसी के रमेश चंद्र श्रीवास्तव ने लगातार दो बार जीत दर्ज कर इस सीट पर बुंदेलखंड का वर्चस्व पैदा कर दिया।
इसके बाद से यह सीट बुंदेलखंड के किसी चेहरे को नसीब नहीं हुई। 1996 में प्रयागराज को कर्मस्थली बनाने वाले फतेहपुर निवासी डॉ. यज्ञदत्त शर्मा मैदान में आए और 24 साल तक इस सीट पर किसी और को बैठने नहीं दिया। लगातार चार बार जीत दर्ज करने वाले डॉ. यज्ञदत्त शर्मा को 2020 में हार का सामना करना पड़ा, पर उन्हें यह हार कौशांबी निवासी व प्रयागराज से ही ताल्लुक रखने वाले डॉ. मान सिंह यादव से मिली। (संवाद)
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वोट के मामले में बुंदेलखंड भी कम नहीं
इस चुनाव में माना यही जाता रहा कि प्रयागराज के पास अधिक वोट होने के चलते वहीं के प्रत्याशी ज्यादा हद तक सफलता हासिल कर सकते हैं। यही कारण रहा कि राजनीतिक दल प्रयागराज के प्रत्याशियों को ही प्रमुखता देते रहे। इस चुनाव प्रयागराज के पास ही अकेले 115019 वोट रहे। इसके अलावा कौशांबी के पास 20140 व फतेहपुर के पास 17596 वोट रहे। बुंदेलखंड की बात करें तो झांसी के पास 25220, जालौन के पास 20999, बांदा के पास 19794, हमीरपुर में 15480, चित्रकूट में 11622, ललितपुर में 11330 व महोबा में 7033 मतदाता थे। अगर इन संख्याओं को जोड़ दिया जाए तो बुंदेलखंड के पास भी 111478 वोट थे, जोकि अच्छी लड़ाई के लिए काफी हैं।
भाजपा का प्लान, सपा का विश्वास
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पिछले 30 साल से इस चुनाव में बुंदेलखंड से प्रतिनिधित्व न मिलने को भाजपा ने मौके के तौर पर देखा। पार्टी ने जालौन से अशोक कुमार राठौर को प्रत्याशी बनाकर जहां बुंदेलखंड को प्रतिनिधित्व देने का संदेश दिया तो इसी के जरिए विधानसभा चुनाव साधने का प्रयास भी किया है। पिछले विधानसभा चुनाव में बुंदेलखंड की 13 में से दस में भाजपा को जीत मिली थी। वहीं, सपा को विश्वास है कि डॉ. यज्ञदत्त शर्मा जैसे दिग्गज को परास्त कर चुके कौशांबी के डॉ. मान सिंह फिर से कमाल करने में कामयाब होंगे।
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वर्ष 1952 के शुरुआती दौर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. ईश्वरी प्रसाद निर्दलीय होकर इस सीट पर लगातार तीन जीत हासिल करने में कामयाब रहे और उन्होंने इस चुनाव में प्रयागराज का वर्चस्व कायम कर दिया। इसके बाद वर्ष 1978 में बांदा के जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव ने जीत दर्ज कर बुंदेलखंड को पहली बार इस सीट पर काबिज कराया। उनके बाद 1984 व 1990 में झांसी के रमेश चंद्र श्रीवास्तव ने लगातार दो बार जीत दर्ज कर इस सीट पर बुंदेलखंड का वर्चस्व पैदा कर दिया।
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इसके बाद से यह सीट बुंदेलखंड के किसी चेहरे को नसीब नहीं हुई। 1996 में प्रयागराज को कर्मस्थली बनाने वाले फतेहपुर निवासी डॉ. यज्ञदत्त शर्मा मैदान में आए और 24 साल तक इस सीट पर किसी और को बैठने नहीं दिया। लगातार चार बार जीत दर्ज करने वाले डॉ. यज्ञदत्त शर्मा को 2020 में हार का सामना करना पड़ा, पर उन्हें यह हार कौशांबी निवासी व प्रयागराज से ही ताल्लुक रखने वाले डॉ. मान सिंह यादव से मिली। (संवाद)
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वोट के मामले में बुंदेलखंड भी कम नहीं
इस चुनाव में माना यही जाता रहा कि प्रयागराज के पास अधिक वोट होने के चलते वहीं के प्रत्याशी ज्यादा हद तक सफलता हासिल कर सकते हैं। यही कारण रहा कि राजनीतिक दल प्रयागराज के प्रत्याशियों को ही प्रमुखता देते रहे। इस चुनाव प्रयागराज के पास ही अकेले 115019 वोट रहे। इसके अलावा कौशांबी के पास 20140 व फतेहपुर के पास 17596 वोट रहे। बुंदेलखंड की बात करें तो झांसी के पास 25220, जालौन के पास 20999, बांदा के पास 19794, हमीरपुर में 15480, चित्रकूट में 11622, ललितपुर में 11330 व महोबा में 7033 मतदाता थे। अगर इन संख्याओं को जोड़ दिया जाए तो बुंदेलखंड के पास भी 111478 वोट थे, जोकि अच्छी लड़ाई के लिए काफी हैं।
भाजपा का प्लान, सपा का विश्वास
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पिछले 30 साल से इस चुनाव में बुंदेलखंड से प्रतिनिधित्व न मिलने को भाजपा ने मौके के तौर पर देखा। पार्टी ने जालौन से अशोक कुमार राठौर को प्रत्याशी बनाकर जहां बुंदेलखंड को प्रतिनिधित्व देने का संदेश दिया तो इसी के जरिए विधानसभा चुनाव साधने का प्रयास भी किया है। पिछले विधानसभा चुनाव में बुंदेलखंड की 13 में से दस में भाजपा को जीत मिली थी। वहीं, सपा को विश्वास है कि डॉ. यज्ञदत्त शर्मा जैसे दिग्गज को परास्त कर चुके कौशांबी के डॉ. मान सिंह फिर से कमाल करने में कामयाब होंगे।