मिनी कुंभ: फर्रुखाबाद में बसा मेला रामनगरिया; कल्पवासियों ने त्यागीं सुख-सुविधाएं, गंगा तट पर साधना शुरू
Farrukhabad News: फर्रुखाबाद के पांचाल घाट पर मिनी कुंभ मेला रामनगरिया शुरू हो गया है। गंगा की रेती पर बसे इस तंबुओं के शहर में हजारों कल्पवासी एक माह की कठिन साधना के जरिए मोक्ष की कामना करेंगे।
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जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति की कामना। भक्ति, भजन और स्नान-दान के जरिए आराध्य की कृपा प्राप्ति। गंगा की रेती में ऐसे ही भावों को साकार करने के लिए तंबुओं का शहर मेला रामनगरिया बस गया है। घर-द्वार की आधुनिक सुविधाएं छोड़ तंबू और झोपड़ी में कल्पवासियों ने गृहस्थी सजा ली है। तीन कोटि देवताओं की अदृश्य मौजूदगी में तीन समय स्नान, दान, और भजन की अमृत वर्षा होगी तो समरसता का घट भी छलकेगा। बनारस की तरह चंद्राकर आकार में यहां गंगा बहतीं। अपरा काशी कहे जाने वाले महाभारत कालीन फर्रुखाबाद का पांचाल घाट ब्रटिश काल में जल मार्ग से व्यापार का राष्ट्र स्तरीय केंद्र रहा।
इसी पांचाल घाट पर गंगा की पवित्र रेती में प्रयागराज संगम के बाद देश का दूसरा बड़ा माघ मेला लग गया है। यूं तो इसका उद्धघाटन तीन जनवरी को पौष पूर्णिमा स्नान से होगा। लेकिन रंग-बिरंगे शिविर और कुटियां सज चुकी हैं। अखाडे भी रम गए, सतरंगी भगवत छटा को समेटे साधुओं की दिव्य संगत आकार ले चुकी। तीन किलोमीटर क्षेत्र में मां गंगा का आंचल जगमग होने लगा। धर्म ध्वजाओं संग राष्ट्र धर्म की ध्वज पताका भी लहरा रही। मिनी कुंभ का वैभव समेटे एक माह के इस मेले में आस्था और विश्वास के आगे धुंध और ठंड भी बौनी पड़ जाती।
यह सिलसिला दो-चार दिन तक और बढ़ेगा
आस्था के इस पावन उत्सव में एक मास तक कल्पवासी घरों की सुख-सुविधाओं को छोड़ तंबू, झोपड़ी (राउटी) में रहकर कठिन व्रत और साधना का कल्पवास करेंगे। घर-गृहस्थी की झंझटों से मुक्त होकर कल्पवासी सन्यासियों सा जीवन व्यतीत कर जप-तप के जरिए स्वयं का काया 'कल्प' यानी जीते-जी मोक्ष प्राप्त करने की कामना से पहुंचे हैं। यहां सद्भाव व समरसता के बीच आस्था की हिलोरें गंगा की लहरों के साथ एकसार होती हैं। जिले के साथ ही हरदोई, शाहजहांपुर, बरेली, बदायूं, पीलीभीत, मैनपुरी, कन्नौज, लखीमपुर खीरी, सीतापुर आदि जिलों से भी बड़ी तादाद में साधक मां सुरसरि के आंचल में डेरा जमा चुके। यह सिलसिला दो-चार दिन तक और बढ़ेगा।
वर्ष 1957 में 20 कल्पवासियों व संतों से हुई शुरुआत, 1989 में आए थे एनडी तिवारी
तेरह साल तक मेला व्यवस्थापक रहे संदीप दीक्षित बताते हैं कि गांधीवादी नेता स्व महरम सिंह के प्रयास से वर्ष 1957 में 15-20 साधकों और संतों ने माघ माह में एक माह तक उस समय कल्पवास किया तो आगे संख्या बढ़ती गई। कल्पवास धीरे-धीरे प्रयागराज जैसे मेले के रूप में तब्दील होता गया। गांधी विचार मंच के अध्यक्ष व मेला रामनगरिया के सदस्य दिनेश प्रकाश सिंह का कहना है कि 14 जनवरी 1989 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी भी रामनगरिया मेले में पहुंचे थे। उन्होंने प्रदेश शासन की ओर से पांच लाख रुपये अनुदान दिए जाने की घोषणा की थी। हांलाकि एक बार के बाद फिर अनुदान नहीं मिला। एनडी तिवारी के साथ केंद्रीय कृषि मंत्री भजनलाल भी आए थे।
अपने ही साधनों पर खड़ा होता यह मिनी कुंभ
1985 से मेला सदस्य व 1998 से आयोजन समिति सदस्य अधिवक्ता सुरेंद्र सिंह सोमवंशी बताते हैं कि पतित पावनी मां गंगा की पवित्र रेती पर महीने भर का यह मेला अपने ही साधनों पर खड़ा होता। इस बार ढाई करोड़ रुपये जुटाने के लिए मेला तैयार है। इसमें वाहन स्टैंड, मनोरंजन क्षेत्र नीलामी धनराशि व दूकानों का किराया भी शामिल है। इस धनराशि से सारी व्यवस्थाएं होती हैं। मेला कमेटी अध्यक्ष जिलाधकारी होते हैं। मेला व्यवस्थापक के रूप में हरिदत्त मिश्रा, डॉ सुरेश सोमवंशी, संदीप दीक्षित के बाद अब संजय मिश्रा दायित्व निभा रहे। तीन सेक्टर में बांटकर यहां व्यवस्था होती है।
कई राज्यों के आते हैं संत, कार्यक्रमों की रही प्रतिष्ठा
जूना अखाड़ा, अग्नि अखाड़ा, आह्वान अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा व दंडी संतों के भी शिविर यहां आस्था का वैभव बढ़ाते हैं। प्रेमदास बाबा छाता वाले, स्वामी श्यामानंद, कपिलदेव महाराज, स्वामी नारदानंद, पागल बाबा, स्वामी अवधबिहारी दास, योगेश्वरानंद गिरि, सुबोधा आश्रम सहित कई राज्यों के संतों ने दिव्य संगत सजाई। रामायण के श्रीराम अरुण गोविल, अनूप जलोटा, जया किशोरी, मालिनी अवस्थी, मैत्रेयी ठाकुर, शर्मा बंधु सहित कई प्रतिष्ठित कार्यक्रमों की गवाह बनी यहां की पवित्र रज।
अमृत व शाही स्नान की परंपरा, आपदा में भी आंच नहीं
अमृत व शाही स्नान की परंपरा संत समाज के वैभव की झांकी दिखाती है। पौष पूर्णिमा, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी व माघी पूर्णिमा के अमृत स्नान मेले में श्रद्धा व भक्ति की अमृत बूंदें बरसाते हैं। संत अखाड़ों का शाही स्नान अलौकिक आभा की छटा बिखेरता। यहां सद्भाव व समरसता का संगम आकार लेता। सांस्कृतिक पांडाल में भारतीय संस्कृति वैभव से जुड़े कार्यक्रम चमक बिखेरते तो विकास प्रदर्शनी में देश के विकास की बढ़ती रफ्तार व क्षेत्रीय नवाचार प्रेरणा देते। बाजार में करोड़ों रुपये का कारोबार होता। दूसरे राज्यों के दुकानदार व कारोबारी आते हैँ।