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यूपी: 35 साल पुरानी फर्जी मुठभेड़ में 12 पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज, सीआईडी जांच में खुली पोल, पढ़े पूरा मामला

Sun, 18 Oct 2026 10:03 AM IST
Himanshu Awasthi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: Himanshu Awasthi Updated Sun, 18 Oct 2026 10:03 AM IST
सार

Kanpur News: महाराजपुर थाने में 35 साल पुराने फर्जी पुलिस मुठभेड़ के मामले में बड़ा एक्शन लिया गया है। सीआईडी जांच में राकेश पाठक समेत 12 लोगों की गिरफ्तारी और मुठभेड़ की पूरी कहानी झूठी पाई गई, जिसके बाद 12 आरोपित पुलिसकर्मियों के खिलाफ गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई है।

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kanpur FIR registered against 12 police personnel in a 35 year old fake encounter case
महाराजपुर थाना - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कानपुर के महाराजपुर थाने में वर्ष 1991 की फर्जी पुलिस मुठभेड़ के मामले में 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप है कि तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी और उनकी टीम ने राकेश पाठक समेत 12 लोगों को झूठी मुठभेड़ दिखाकर गिरफ्तार किया। अवैध असलहों की बरामदगी दर्शाई और उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कराए। मामले की जांच सीआईडी की अपराध शाखा ने की थी। नामजद 18 पुलिसकर्मियों में छह की मृत्यु हो चुकी है, जबकि शेष 12 के खिलाफ गंभीर आठ धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई है।

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चकेरी के गांधीग्राम निवासी देव प्रसाद पाठक ने शासन से शिकायत की थी कि मुफ्त में प्लॉट न देने पर तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी ने उनके छोटे भाई राकेश पाठक समेत 12 लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाया। शासन ने 11 फरवरी 1991 को जांच सीआईडी की अपराध शाखा, कानपुर खंड को सौंपी थी।तत्कालीन निरीक्षक आरपी सिंह की जांच रिपोर्ट 25 सितंबर 1995 को सीआईडी मुख्यालय, लखनऊ से अनुमोदित हुई। जांच में पुलिस की ओर से दर्ज मुकदमों और मुठभेड़ की कहानी फर्जी पाई गई।

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नर्वल मोड़ पर लूट की साजिश दिखाने का आरोप
दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक, 22 अगस्त 1991 को मुखबिर से सूचना मिली थी कि बदमाश नर्वल मोड़ स्थित जीटी रोड पर वाहनों को रोककर लूटपाट करेंगे। पुलिस टीम मौके पर पहुंची और दावा किया कि 23 अगस्त की रात करीब 12:30 बजे बदमाशों ने बबूल की डालियां सड़क पर डालकर ट्रक और डीसीएम रोकने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस मुठभेड़ में राकेश पाठक समेत 12 लोगों की गिरफ्तारी और असलहे व बम बरामद होने की बात कही गई। इस आधार पर महाराजपुर थाने में दो मुकदमे दर्ज किए गए। तत्कालीन उपनिरीक्षक एवं नर्वल थानाध्यक्ष रमेश चंद्र भटोले ने विवेचना के बाद आरोपपत्र न्यायालय भेजे थे।

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डीसीएम चालक और क्लीनर ने खोली पोल
सीआईडी जांच में डीसीएम चालक उमाशंकर पासी और क्लीनर बृजेन्द्र सिंह के बयान अहम रहे। दोनों ने मुठभेड़ की कहानी का समर्थन नहीं किया। उनके मुताबिक, 22 अगस्त 1991 को वे डीसीएम में साबुन लादकर कानपुर से बनारस जा रहे थे। रामादेवी चौराहे पर एक सिपाही वाहन में बैठा और बाद में छह अन्य लोगों को भी बैठाया गया। इसके बाद डीसीएम को महाराजपुर थाने ले जाया गया। दोनों के अनुसार, थाने में वाहन में बैठे पांच लोगों में से दो भाग गए और तीन को पुलिस ने पकड़ लिया।

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नर्वल मोड़ पर बदमाशों ने नहीं रोका था
उनसे दो तमंचे, कारतूस और तीन बम मिलने की बात कही गई। चालक और क्लीनर ने आरोप लगाया कि पुलिस ने पकड़े गए लोगों से मारपीट की और बाद में अन्य लोगों को पकड़कर लाई। पुलिस एक राइफल और बंदूक भी लेकर आई थी। अगले दिन उनसे लिखे हुए कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए, लेकिन उन्हें पढ़कर नहीं सुनाया गया। दोनों ने यह भी कहा कि डीसीएम को नर्वल मोड़ पर बदमाशों ने नहीं रोका था। सीआईडी जांच के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत न्यायालय में दर्ज उनके बयानों में भी इन कथनों की पुष्टि हुई।

घर से उठाने और लाइसेंसी हथियार दिखाने का आरोप
शिकायतकर्ता देव प्रसाद पाठक समेत अन्य गवाहों ने जांचकर्ता को बताया कि राकेश पाठक, दिनेश कुमार, शिवकुमार और जगदीश द्विवेदी को घर से सोते समय उठाकर ले जाया गया था। आरोप है कि राकेश पाठक के पिता सदाशिव की लाइसेंसी दोनाली बंदूक और देव प्रसाद पाठक की लाइसेंसी राइफल भी पुलिस अपने साथ ले गई और बाद में उन्हें मुकदमों में बरामद हथियार के रूप में दर्शाया। सीआईडी निरीक्षक आरपी सिंह ने मौखिक, अभिलेखीय और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ झूठे साक्ष्य और दस्तावेज तैयार करने, झूठा आरोप लगाने, अवैध हिरासत और मारपीट समेत विभिन्न अपराधों के प्रथम दृष्टया साक्ष्य पाए।

छह पुलिसकर्मियों की हो चुकी है मौत
मामले में नामजद 18 पुलिसकर्मियों में तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी, उपनिरीक्षक दुर्बीन सिंह, उपनिरीक्षक रमाकांत, आरक्षी राजन सिंह, आरक्षी उदयशंकर पांडेय और आरक्षी महेंद्र सिंह की मृत्यु हो चुकी है।

आठ धाराओं में ये हैं आरोप

  • धारा 194: मृत्युदंड योग्य अपराध में दोषसिद्धि कराने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ना।
  • धारा 195: गंभीर अपराध में दोषसिद्धि कराने के लिए झूठे साक्ष्य देना या गढ़ना।
  • धारा 182: लोकसेवक को झूठी सूचना देना।
  • धारा 211: नुकसान पहुंचाने के इरादे से झूठा आपराधिक आरोप लगाना।
  • धारा 218: लोकसेवक द्वारा नुकसान पहुंचाने या बचाने के इरादे से गलत अभिलेख तैयार करना
  • धारा 220: कानून के विरुद्ध किसी व्यक्ति को मुकदमे के लिए भेजना या हिरासत में रखना।
  • धारा 323: स्वेच्छा से चोट पहुंचाना।
  • धारा 34 : अवैध रूप से बंधक बनाना।
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