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Kanpur News: अब डायबिटीज के मरीजों में शुरुआती स्तर पर पता चलेगी किडनी की बीमारी
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कानपुर। अब डायबिटीज के मरीजों में किडनी को होने वाले नुकसान की पहचान शुरुआती स्तर पर ही की जा सकेगी। छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लाइफ साइंस एंड बायोटेक्नोलॉजी की शोधार्थी शताक्षी चतुर्वेदी ने अपने शोध में एक ऐसे बायोमार्कर की पहचान की है, जो मूत्र की जांच से किडनी रोग का संकेत दे सकता है।
शोध का विषय रोल ऑफ एक्सोसोम इन डायग्नोसिस एंड थेराप्युटिक इंटरवेंशन इन डायबिटिक किडनी इंजरी है। डायबिटीज के मरीजों में अक्सर किडनी धीरे-धीरे खराब होने लगती है, लेकिन समय पर इसके लक्षण सामने नहीं आते। ऐसे में यह शोध काफी उपयोगी माना जा रहा है।
इस शोध में एक्सोसोम नामक सूक्ष्म जैविक कणों का उपयोग किया गया है। एक्सोसोम शरीर की कोशिकाओं की ओर से छोड़े जाते हैं और एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संदेश पहुंचाने का काम करते हैं। इन्हें बीमारी की पहचान और इलाज दोनों में उपयोगी पाया गया है।
शोध के दौरान डब्ल्युटी-1 नामक बायोमार्कर को डायबिटिक किडनी रोग की पहचान के लिए महत्वपूर्ण पाया गया। यह बायोमार्कर मूत्र में पाया जाता है। इसके आधार पर एक जांच पद्धति विकसित की गई है, जिससे बिना किसी दर्द और जटिल जांच के किडनी की स्थिति का पता लगाया जा सकेगा। बायोमार्कर दरअसल शरीर में मौजूद वह संकेतक होते हैं, जो यह बताते हैं कि शरीर के किसी अंग में बीमारी शुरू हो रही है या नहीं। जैसे बुखार शरीर में संक्रमण का संकेत देता है, उसी तरह कुछ विशेष प्रोटीन या तत्व किडनी खराब होने की शुरुआती चेतावनी देते हैं।
शोध के अंतर्गत एलिसा तकनीक पर आधारित जांच किट तैयार की गई है। इससे मूत्र की जांच कर यह जाना जा सकेगा कि डायबिटीज के कारण किडनी को नुकसान शुरू हुआ है या नहीं। अभी तक किडनी रोग की पहचान तब होती थी जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती थी। शुरुआती पहचान से समय पर इलाज संभव होगा, जिससे किडनी को गंभीर नुकसान, डायलिसिस और महंगे इलाज से बचाया जा सकेगा।
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शोध का विषय रोल ऑफ एक्सोसोम इन डायग्नोसिस एंड थेराप्युटिक इंटरवेंशन इन डायबिटिक किडनी इंजरी है। डायबिटीज के मरीजों में अक्सर किडनी धीरे-धीरे खराब होने लगती है, लेकिन समय पर इसके लक्षण सामने नहीं आते। ऐसे में यह शोध काफी उपयोगी माना जा रहा है।
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इस शोध में एक्सोसोम नामक सूक्ष्म जैविक कणों का उपयोग किया गया है। एक्सोसोम शरीर की कोशिकाओं की ओर से छोड़े जाते हैं और एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संदेश पहुंचाने का काम करते हैं। इन्हें बीमारी की पहचान और इलाज दोनों में उपयोगी पाया गया है।
शोध के दौरान डब्ल्युटी-1 नामक बायोमार्कर को डायबिटिक किडनी रोग की पहचान के लिए महत्वपूर्ण पाया गया। यह बायोमार्कर मूत्र में पाया जाता है। इसके आधार पर एक जांच पद्धति विकसित की गई है, जिससे बिना किसी दर्द और जटिल जांच के किडनी की स्थिति का पता लगाया जा सकेगा। बायोमार्कर दरअसल शरीर में मौजूद वह संकेतक होते हैं, जो यह बताते हैं कि शरीर के किसी अंग में बीमारी शुरू हो रही है या नहीं। जैसे बुखार शरीर में संक्रमण का संकेत देता है, उसी तरह कुछ विशेष प्रोटीन या तत्व किडनी खराब होने की शुरुआती चेतावनी देते हैं।
शोध के अंतर्गत एलिसा तकनीक पर आधारित जांच किट तैयार की गई है। इससे मूत्र की जांच कर यह जाना जा सकेगा कि डायबिटीज के कारण किडनी को नुकसान शुरू हुआ है या नहीं। अभी तक किडनी रोग की पहचान तब होती थी जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती थी। शुरुआती पहचान से समय पर इलाज संभव होगा, जिससे किडनी को गंभीर नुकसान, डायलिसिस और महंगे इलाज से बचाया जा सकेगा।
