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Kushinagar News: पहले अंग्रेजों से लड़े फिर व्यवस्था से भी टकराए बुद्ध भूमि के मतवाले

Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 26 Jan 2026 02:10 AM IST
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First they fought with the British and then clashed with the system as well. The madmen of the land of Buddha
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गुरवलिया बाजार (कुशीनगर)। जिले के रामधारी शास्त्री और गेंदा सिंह दो ऐसे नेता रहे जिन्होंने आजादी से पहले अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष किया और आजादी के बाद व्यवस्था से टकराने का साहस दिखाया। विधायक, सांसद और मंत्री बनने के बावजूद दोनों ने सत्ता को जनहित का साधन माना।
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एक ने पूर्वांचल राज्य की मांग को राष्ट्रीय विमर्श बनाया तो दूसरे ने किसानों के हित में पद तक छोड़ दिया और एशिया स्तर का अनुसंधान संस्थान कुशीनगर में खड़ा कर दिया। रामधारी शास्त्री और गेंदा सिंह ने यह साबित किया कि राजनीति केवल सत्ता के लिए बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम भी हो सकती है। गणतंत्र दिवस पर लोग इन विभूतियों को याद कर रहे हैं।
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रामधारी शास्त्री फाजिलनगर क्षेत्र के सोहंग गांव के निवासी थे। उनका मानना था कि सत्ता में पहुंचना अंत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की शुरुआत है। इसी सोच के साथ उन्होंने पूर्वांचल राज्य बनाओ दल का गठन किया और इसके पहले अध्यक्ष बने। चुनावी दौर में यह मांग इतनी मजबूत हुई कि प्रदेश की राजनीति को दिशा देने लगी। 2010 में उनके अध्यक्षीय कार्यकाल के खत्म होने और फिर उनके निधन के बाद यह आंदोलन धीरे-धीरे सियासी हाशिए पर चला गया।
आज यह मुद्दा मंचों पर नहीं दिखता, मगर गांव-गांव में लोग अब भी कहते हैं कि शास्त्री जी होते तो आवाज दबती नहीं।रामधारी शास्त्री का जीवन खुद में संघर्ष की कहानी था। 2 जनवरी 1923 को जन्मे रामधारी ने 1937 में कांग्रेस से जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में कदम रखा। 1941 में एक साल का कारावास, 1942 में गिरफ्तारी पर इनाम और 1943 में गोरखपुर जेल में रहे।
आपातकाल के दौरान भी वे बरेली सेंट्रल जेल में बंद रहे। आजादी के बाद 1969 में वे फाजिलनगर से विधायक बने और लोक निर्माण विभाग के राज्यमंत्री रहे। 1977 से 1979 तक पडरौना लोकसभा से सांसद रहते हुए भी उनकी राजनीति सड़क, स्कूल और आम आदमी के सवालों के इर्द-गिर्द घूमती रही।
उन्होंने क्षेत्र में दर्जनभर शिक्षण संस्थानों की नींव रखी और फाजिलनगर-बघौचघाट, कुबेरस्थान, तमकुही जैसे प्रमुख मार्गों का निर्माण कराया। सत्ता से बाहर होने के बाद भी वे शांत नहीं हुए। जीवन के अंतिम समय तक वे जनता की समस्याओं को लेकर व्यवस्था से टकराते रहे। पूर्वांचल राज्य का सपना अधूरा रह गया, लेकिन गणतंत्र के इतिहास में रामधारी शास्त्री का संघर्ष अमिट है। दुदही विकास खंड के दुमही गांव से निकले बाबू गेंदा सिंह का नाम आज भी इलाके में ईमानदार राजनीति की मिसाल के तौर पर लिया जाता है। 1952 में प्रदेश की पहली विधानसभा में पडरौना (पूर्व) से विधायक बनकर उन्होंने इतिहास रचा। उस चुनाव में उनकी भूमिका इतनी प्रभावी रही कि देवरिया जिले की 12 में से 9 सीटों पर जीत दर्ज हुई। समाजवादी विचारधारा से राजनीति शुरू करने वाले गेंदा सिंह प्रजा शोषित पार्टी से होते हुए कांग्रेस तक पहुंचे। जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर कांग्रेस में शामिल हुए और कृषि, पशुपालन, लोक निर्माण व सूचना मंत्री बने।
जब किसानों के सवाल पर सरकार से टकराव हुआ तो उन्होंने 1969 में बिना हिचक सूचना मंत्री पद से इस्तीफा भेज दिया। यह फैसला आज भी बताता है कि उनके लिए पद नहीं, नीति और किसान पहले थे। 1942 के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन से प्रभावित होकर गेंदा सिंह स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और 1942 से 1945 तक बरेली जेल में बंद रहे। यही कारण है कि उन्हें लोकतंत्र सेनानी के रूप में भी जाना जाता है।
पंडित नेहरू के निधन के बाद भी उनकी राजनीतिक पैठ बनी रही।लाल बहादुर शास्त्री सरकार ने उन्हें कृषि और वनों के अध्ययन के लिए जर्मनी भेजा। सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद अनुभव और मेहनत से वे गन्ना खेती के जानकार बने। 1971 में वे लोकसभा सांसद बने। स्वास्थ्य चुनौतियों और पैरालिसिस के बावजूद उनका संघर्ष रुका नहीं। सेवरही-तमकुही क्षेत्र में उन्होंने गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन व अनुसंधान केंद्र की स्थापना की जो अपने समय में देश का दूसरा बड़ा और एशिया स्तर पर चर्चित संस्थान बना। 15 नवंबर 1977 को उनका निधन हुआ।
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