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Lakhimpur Kheri News: मृग रूप में यहां रम गए थे महादेव, इसलिए नाम पड़ा गोकर्णनाथ
Fri, 31 Jul 2026 11:08 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Fri, 31 Jul 2026 11:08 PM IST
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पौराणिक शिव मंदिर के गर्भ गृह में शिवश्रृंगार। संवाद
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गोला गोकर्णनाथ। छोटी काशी के नाम से विख्यात गोला गोकर्णनाथ का पौराणिक शिव मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इसके महात्म्य के दृष्टांत पुराणों और लोककथाओं में मिलते हैं। सावन में यहां काशी की तरह शिवभक्ति और आस्था का संगम देखने को मिलता है।
पौराणिक शिव मंदिर के पुजारी पं. दिनेश चंद्र मिश्रा ने बताया कि मान्यता है कि भगवान शंकर ने यहां मृग रूप में विचरण किया था। वराह पुराण में वर्णित है कि वैराग्य उत्पन्न होने पर भगवान शिव यहां के वन क्षेत्र में भ्रमण करते हुए रमणीय स्थल पाकर यहीं रम गए। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र चिंतित होकर उन्हें खोजते हुए पहुंचे। वन प्रांत में अद्भुत मृग को सोते देखकर समझ गए कि यही शिव हैं। उनके निकट जाते ही आहट पाकर मृग भागने लगा।
पौराणिक प्रसंग के अनुसार देवताओं ने पीछा कर मृग के सींग पकड़ लिए तो वह तीन टुकड़ों में विभक्त हो गया। सींग का मूल भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया, जो गोकर्णनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरा टुकड़ा ब्रह्मा जी ने बिहार के श्रृंगवेश्वर और तीसरा देवराज इंद्र ने अमरावती में स्थापित किया। यहां के महात्म्य का वर्णन शिव पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता है।
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रावण से भी जुड़ी है लोक मान्यता
मंदिर से जुड़ी लोक मान्यता के अनुसार त्रेतायुग में भगवान शिव लंकापति रावण की तपस्या से प्रसन्न हुए और रावण उन्हें अपने साथ लंका ले जाने लगा। भगवान शिव ने शर्त रखी कि रास्ते में उन्हें कहीं भी भूमि पर रखा गया तो वह उस स्थान से नहीं जाएंगे। मान्यता है कि गोला गोकर्णनाथ पहुंचने पर रावण लघुशंका के लिए रुका और एक चरवाहे को शिवलिंग देकर भूमि पर न रखने की हिदायत दी। काफी देर तक रावण के न लौटने पर चरवाहे ने शिवलिंग भूमि पर रख दिया। लौटने पर रावण शिवलिंग को उठा नहीं सका तो गुस्से में अंगूठे से उसे भूमि में दबा दिया। मान्यता है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर रावण के अंगूठे का निशान आज भी मौजूद है।
शिवभक्तों की ओर से समय-समय पर कराए गए जीर्णोद्धार से मंदिर भव्य स्वरूप प्राप्त करता गया। शिव मंदिर कॉरिडोर निर्माण के चलते इस वर्ष पिछले वर्षों की अपेक्षा अधिक श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। प्रशासन ने सावन को लेकर व्यापक तैयारियां की हैं।
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पौराणिक शिव मंदिर से अन्य देवालयों की दूरी
भूतनाथ मंदिर-डेढ़ किमी, त्रिलोकीनाथ मंदिर-एक किमी, लक्ष्मणजती मंदिर-दो किमी, मंगला देवी मंदिर-एक किमी, फूल बाबा आश्रम-दो किमी, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर-एक किमी, रामजानकी मंदिर-एक किमी, राधा कृष्ण मंदिर-डेढ़ किमी, कंजा देवस्थान-तीन किमी, अलीगंज मार्ग स्थित एक शताब्दी से अधिक प्राचीन बाबा गोकर्णनाथ मंदिर-डेढ़ किमी, कलेश हरण मंदिर-पांच किमी, महाभारतकालीन टेढ़ेनाथ मंदिर-34 किमी, गजमोचन नाथ मंदिर-40 किमी और जंगली नाथ मंदिर-45 किमी दूर है।
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पौराणिक शिव मंदिर के पुजारी पं. दिनेश चंद्र मिश्रा ने बताया कि मान्यता है कि भगवान शंकर ने यहां मृग रूप में विचरण किया था। वराह पुराण में वर्णित है कि वैराग्य उत्पन्न होने पर भगवान शिव यहां के वन क्षेत्र में भ्रमण करते हुए रमणीय स्थल पाकर यहीं रम गए। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र चिंतित होकर उन्हें खोजते हुए पहुंचे। वन प्रांत में अद्भुत मृग को सोते देखकर समझ गए कि यही शिव हैं। उनके निकट जाते ही आहट पाकर मृग भागने लगा।
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पौराणिक प्रसंग के अनुसार देवताओं ने पीछा कर मृग के सींग पकड़ लिए तो वह तीन टुकड़ों में विभक्त हो गया। सींग का मूल भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया, जो गोकर्णनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरा टुकड़ा ब्रह्मा जी ने बिहार के श्रृंगवेश्वर और तीसरा देवराज इंद्र ने अमरावती में स्थापित किया। यहां के महात्म्य का वर्णन शिव पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता है।
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रावण से भी जुड़ी है लोक मान्यता
मंदिर से जुड़ी लोक मान्यता के अनुसार त्रेतायुग में भगवान शिव लंकापति रावण की तपस्या से प्रसन्न हुए और रावण उन्हें अपने साथ लंका ले जाने लगा। भगवान शिव ने शर्त रखी कि रास्ते में उन्हें कहीं भी भूमि पर रखा गया तो वह उस स्थान से नहीं जाएंगे। मान्यता है कि गोला गोकर्णनाथ पहुंचने पर रावण लघुशंका के लिए रुका और एक चरवाहे को शिवलिंग देकर भूमि पर न रखने की हिदायत दी। काफी देर तक रावण के न लौटने पर चरवाहे ने शिवलिंग भूमि पर रख दिया। लौटने पर रावण शिवलिंग को उठा नहीं सका तो गुस्से में अंगूठे से उसे भूमि में दबा दिया। मान्यता है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर रावण के अंगूठे का निशान आज भी मौजूद है।
शिवभक्तों की ओर से समय-समय पर कराए गए जीर्णोद्धार से मंदिर भव्य स्वरूप प्राप्त करता गया। शिव मंदिर कॉरिडोर निर्माण के चलते इस वर्ष पिछले वर्षों की अपेक्षा अधिक श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। प्रशासन ने सावन को लेकर व्यापक तैयारियां की हैं।
पौराणिक शिव मंदिर से अन्य देवालयों की दूरी
भूतनाथ मंदिर-डेढ़ किमी, त्रिलोकीनाथ मंदिर-एक किमी, लक्ष्मणजती मंदिर-दो किमी, मंगला देवी मंदिर-एक किमी, फूल बाबा आश्रम-दो किमी, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर-एक किमी, रामजानकी मंदिर-एक किमी, राधा कृष्ण मंदिर-डेढ़ किमी, कंजा देवस्थान-तीन किमी, अलीगंज मार्ग स्थित एक शताब्दी से अधिक प्राचीन बाबा गोकर्णनाथ मंदिर-डेढ़ किमी, कलेश हरण मंदिर-पांच किमी, महाभारतकालीन टेढ़ेनाथ मंदिर-34 किमी, गजमोचन नाथ मंदिर-40 किमी और जंगली नाथ मंदिर-45 किमी दूर है।

पौराणिक शिव मंदिर के गर्भ गृह में शिवश्रृंगार। संवाद