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Lalitpur: हर गोली का दिया जवाब, कारगिल पर फहराया तिरंगा, सेवानिवृत्त सैन्य अफसरों ने सुनाई शौर्यगाथा
Sun, 26 Jul 2026 12:05 PM IST
दीपक महाजन
संवाद न्यूज एजेंसी, ललितपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, ललितपुर
Published by: दीपक महाजन
Updated Sun, 26 Jul 2026 12:05 PM IST
सार
संवाद कार्यक्रम में सेवानिवृत सैन्य अफसरों ने कारगिल युद्ध के दौरान अपने संस्मरण सुनाए। कहा कि सेना के जवानों ने हिम्मत नहीं हारी और हर गोली का जवाब देकर पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी।
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संवाद कार्यक्रम में सेवानिवृत सैन्य अफसर।
- फोटो : संवाद
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विस्तार
कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर चर्च रोड स्थित ‘अमर उजाला कार्यालय’ में संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें सेवानिवृत सैन्य अफसरों ने कारगिल युद्ध के दौरान अपने संस्मरण सुनाए। कहा कि सेना के जवानों ने हिम्मत नहीं हारी और हर गोली का जवाब देकर पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। 26 जुलाई 1999 को कारगिल में तिरंगा ध्वज फहराया था।
सेवानिवृत कैप्टन अशोक कुमार कौशिक ने कहा कि वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मनों की गोलियों से जवानों को कैंप तक स्ट्रेचर पर लिटा कर लाते थे, एक बार स्ट्रेचर खराब होने पर अपनी और घायल साथी की राइफल की सीलिंग खोलकर स्ट्रेचर बनाया और उस पर घायल को लेकर जब चले तो दुश्मन की गोली से बचने के लिए करीब आधा किमी कोहनी के बल चलकर कैंप तक आए। प्राथमिक उपचार के बाद हेलीकॉप्टर से जवान को अस्पताल भेजा गया।
अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद के जिलाध्यक्ष सेवानिवृत हवलदार रामकिशोर सिंह ने कहा कि दुश्मनों ने कारगिल के द्रास सेक्टर पर कब्जा करने की कोशिश की लेकिन भारतीय सेना ने हर गोली का जवाब दिया और दुश्मनों के दांत खट्टे करते हुए उन्हें खदेड़ दिया।
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सेवानिवृत सूबेदार मेजर दयाराम सिंह राजपूत ने कहा कि द्रास सेक्टर सबसे ठंडा इलाका होने के बावजूद भारतीय सेना ने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया। सेवानिवृत हवलदार लोकेंद्र शर्मा ने कहा कारगिल युद्ध के समय पठानकोट यूनिट को भेजा गया था। जिसकी जिम्मेदारी गोला बारूद और खाद्य सामग्री पहुंचानी थी। दुश्मन ऊपरी पहाड़ी से गोलीबारी कर रहे थे तो पहाड़ी के नीचे से रास्ता बनाकर रात के अंधेरे में जाते थे, कई बार रास्ते में गोला गिरे तो बाल बाल बचे। लेकिन एक रात हवलदार धीरेंद्र सिंह के जाने के दौरान दुश्मनों ने उन पर गोलियां बरसा दी जिसमें वह लहूलुहान हो गए, उन्हें तत्काल अस्पताल भेजा गया।
सेवानिवृत नायक मुन्नीलाल ने बताया कि युद्ध के दौरान कई बार ऐसी स्थित आई जब दुश्मनों की सेना से बचने के लिए कोहनी के बल सरकते हुए पहाड़ियों पर चढ़कर अपने जवानों के लिए सामग्री पहुंचाई। इस मौके पर सेवानिवृत हवलदार बलभद्र सिंह पटेल,सेवानिवृत नायक राजकुमार गोस्वामी ने भी अपने संस्मरण सुनाए।
मैं द्रास की पहाड़ियों पर अपने सेक्शन के साथ अपनी पोस्ट पर तैनात था। हमारी जवाब देही उस एरिया में अंबुश लगाने की थी। कारगिल युद्ध केवल सैन्य विजय नहीं था बल्कि यह भारत की एकता, साहस और आत्म विश्वास का प्रतीक भी था। जवानों का बलिदान हमारे लिए प्रेरणास्त्रोत रहेगा। - सेवानिवृत नायब सूबेदार बीरेंद्र सिंह परिहार,वेलफेयर ऑफीसर जिला सैनिक कल्याण कार्यालय,ललितपुर
अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में अनुभव साझा करते सेवानिवृत सैन्य अफसर...
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सेवानिवृत कैप्टन अशोक कुमार कौशिक ने कहा कि वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मनों की गोलियों से जवानों को कैंप तक स्ट्रेचर पर लिटा कर लाते थे, एक बार स्ट्रेचर खराब होने पर अपनी और घायल साथी की राइफल की सीलिंग खोलकर स्ट्रेचर बनाया और उस पर घायल को लेकर जब चले तो दुश्मन की गोली से बचने के लिए करीब आधा किमी कोहनी के बल चलकर कैंप तक आए। प्राथमिक उपचार के बाद हेलीकॉप्टर से जवान को अस्पताल भेजा गया।
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अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद के जिलाध्यक्ष सेवानिवृत हवलदार रामकिशोर सिंह ने कहा कि दुश्मनों ने कारगिल के द्रास सेक्टर पर कब्जा करने की कोशिश की लेकिन भारतीय सेना ने हर गोली का जवाब दिया और दुश्मनों के दांत खट्टे करते हुए उन्हें खदेड़ दिया।
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सेवानिवृत सूबेदार मेजर दयाराम सिंह राजपूत ने कहा कि द्रास सेक्टर सबसे ठंडा इलाका होने के बावजूद भारतीय सेना ने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया। सेवानिवृत हवलदार लोकेंद्र शर्मा ने कहा कारगिल युद्ध के समय पठानकोट यूनिट को भेजा गया था। जिसकी जिम्मेदारी गोला बारूद और खाद्य सामग्री पहुंचानी थी। दुश्मन ऊपरी पहाड़ी से गोलीबारी कर रहे थे तो पहाड़ी के नीचे से रास्ता बनाकर रात के अंधेरे में जाते थे, कई बार रास्ते में गोला गिरे तो बाल बाल बचे। लेकिन एक रात हवलदार धीरेंद्र सिंह के जाने के दौरान दुश्मनों ने उन पर गोलियां बरसा दी जिसमें वह लहूलुहान हो गए, उन्हें तत्काल अस्पताल भेजा गया।
सेवानिवृत नायक मुन्नीलाल ने बताया कि युद्ध के दौरान कई बार ऐसी स्थित आई जब दुश्मनों की सेना से बचने के लिए कोहनी के बल सरकते हुए पहाड़ियों पर चढ़कर अपने जवानों के लिए सामग्री पहुंचाई। इस मौके पर सेवानिवृत हवलदार बलभद्र सिंह पटेल,सेवानिवृत नायक राजकुमार गोस्वामी ने भी अपने संस्मरण सुनाए।
मैं द्रास की पहाड़ियों पर अपने सेक्शन के साथ अपनी पोस्ट पर तैनात था। हमारी जवाब देही उस एरिया में अंबुश लगाने की थी। कारगिल युद्ध केवल सैन्य विजय नहीं था बल्कि यह भारत की एकता, साहस और आत्म विश्वास का प्रतीक भी था। जवानों का बलिदान हमारे लिए प्रेरणास्त्रोत रहेगा। - सेवानिवृत नायब सूबेदार बीरेंद्र सिंह परिहार,वेलफेयर ऑफीसर जिला सैनिक कल्याण कार्यालय,ललितपुर
अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में अनुभव साझा करते सेवानिवृत सैन्य अफसर...
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