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एसआईआर : संयुक्त सचिव ने निरीक्षण कार्य की परखी हकीकत, सुनीं समस्याएं
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सहकारिता विभाग के संयुक्त सचिव सिद्धार्थ जैन ने उपस्थित महिलाओं की समस्याएं सुनीं
ब्लॉक कार्यालय के सामने बैठी महिला के पास संयुक्त सचिव कुर्सी लेकर स्वयं बैठे, अपडेट कराया फार्म
परतावल। परतावल ब्लॉक में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्य के निरीक्षण के लिए पहुंचे भारत सरकार के सहकारिता विभाग के संयुक्त सचिव सिद्धार्थ जैन ने उपस्थित महिलाओं की समस्याएं सुनीं। ब्लॉक कार्यालय के सामने बैठी ग्राम पिपरा खादर की कुसुमावती के पास संयुक्त सचिव सिद्धार्थ जैन कुर्सी लेकर स्वयं बैठ गए।
संयुक्त सचिव ने जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा को भी बगल में बैठाकर महिला की समस्या सुनी और मौके पर ही एसआईआर फार्म अपडेट कराया। पकड़ी दीक्षित गांव की साबिया के कागजात को लेकर भी फार्म दुरुस्त कराया गया। निरीक्षण के दौरान एक स्थानीय व्यक्ति ने उदाहरण के तौर पर पूछा कि यदि नेपाल से वर्ष 2004 के बाद कोई महिला विवाह कर भारत आई है, तो उसके बच्चों का नाम उनके पिता के 2003 के वोटर लिस्ट से एसआईआर में मैप किया जा रहा है लेकिन उनकी माता का देश नेपाल होने के कारण उसका नाम मैप नहीं हो पा रहा है। इस सवाल पर अधिकारियों ने कोई जवाब नहीं दिया। इस चुप्पी ने उन हजारों महिलाओं की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो वर्षों से भारत में रहकर परिवार चला रही हैं लेकिन नागरिक दस्तावेजों में आज भी अदृश्य बनी हुई हैं।
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परतावल। परतावल ब्लॉक में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्य के निरीक्षण के लिए पहुंचे भारत सरकार के सहकारिता विभाग के संयुक्त सचिव सिद्धार्थ जैन ने उपस्थित महिलाओं की समस्याएं सुनीं। ब्लॉक कार्यालय के सामने बैठी ग्राम पिपरा खादर की कुसुमावती के पास संयुक्त सचिव सिद्धार्थ जैन कुर्सी लेकर स्वयं बैठ गए।
संयुक्त सचिव ने जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा को भी बगल में बैठाकर महिला की समस्या सुनी और मौके पर ही एसआईआर फार्म अपडेट कराया। पकड़ी दीक्षित गांव की साबिया के कागजात को लेकर भी फार्म दुरुस्त कराया गया। निरीक्षण के दौरान एक स्थानीय व्यक्ति ने उदाहरण के तौर पर पूछा कि यदि नेपाल से वर्ष 2004 के बाद कोई महिला विवाह कर भारत आई है, तो उसके बच्चों का नाम उनके पिता के 2003 के वोटर लिस्ट से एसआईआर में मैप किया जा रहा है लेकिन उनकी माता का देश नेपाल होने के कारण उसका नाम मैप नहीं हो पा रहा है। इस सवाल पर अधिकारियों ने कोई जवाब नहीं दिया। इस चुप्पी ने उन हजारों महिलाओं की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो वर्षों से भारत में रहकर परिवार चला रही हैं लेकिन नागरिक दस्तावेजों में आज भी अदृश्य बनी हुई हैं।
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