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श्रीकृष्ण जन्मभूमि: वक्फ बोर्ड ने RTI में ईदगाह को नहीं बताया वक्फ संपत्ति, आखिर कौन है मालिक? 18 को सुनवाई
Wed, 12 Aug 2026 01:17 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 12 Aug 2026 01:17 AM IST
सार
श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही मस्जिद ईदगाह विवाद में हिंदू पक्ष 1670 के ऐतिहासिक दस्तावेजों, चित्रों और RTI से मिली जानकारी के आधार पर नया नक्शा अदालत में दाखिल करने की तैयारी में है।
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मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवाद।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही मस्जिद ईदगाह विवाद में नया मोड़ आया है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष और पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह न्यायालय में मालिकाना हक साबित करने के लिए नक्शा दाखिल करेंगे। यह नक्शा 1670 के ऐतिहासिक दस्तावेज, चित्रों और वक्फ बोर्ड से मिली सूचना का अधिकार जानकारी पर आधारित होगा।
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हिंदू पक्ष का दावा है कि 1670 से पहले विवादित भूमि पर शाही ईदगाह मस्जिद का अस्तित्व नहीं था। उस समय केवल कटरा केशवदेव मंदिर और मूल गर्भगृह ही दर्ज था। मुगल शासक औरंगजेब ने 1670 में प्राचीन केशवदेव मंदिर को तोड़ दिया था। इसका प्रमाण मासिर-ए-आलमगिरी किताब में मिलता है। यह पुस्तक मुहम्मद साकी मुस्तैद खान ने लिखी थी। मुस्तैद खान को एक प्रमुख मुगल इतिहासकार, लेखक और प्रशासनिक अधिकारी के रूप में जाना जाता है। उन्हें मुख्य रूप से मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल का विस्तृत इतिहास लिखने के लिए प्रसिद्धि मिली।
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औरंगजेब की मृत्यु के बाद औरंगजेब के आखिरी मुंशी इनायतउल्ला खान कश्मीरी के कहने पर उन्होंने यह फारसी ग्रंथ लिखा और सन 1710 ईस्वी में इसे पूरा किया था। उसमें इस मंदिर से जुड़ा पुराना सारा वृतांत बताया गया है। उधर हिंदू पक्ष ने इस बाबत वक्फ बोर्ड से भी सूचना मांगी थी। वर्ष 2024 में वक्फ बोर्ड ने सूचना का अधिकार अधिनियम में पूछे गए सवाल के जवाब में शाही मस्जिद ईदगाह को वक्फ संपत्ति नहीं बताया है। महेंद्र प्रताप के मुताबिक इससे स्पष्ट होता है कि वक्फ बोर्ड के पास इस जमीन का कोई रिकॉर्ड नहीं है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले की सुनवाई मथुरा जिला न्यायालय में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हो रही है। इसकी अगली तारीख 18 अगस्त निर्धारित है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भी एक संबंधित मामले की सुनवाई चल रही है।
पहला कानूनी मामला और 1968 का समझौता
कटरा केशवदेव की जमीन पर पहला कानूनी मामला 15 मार्च 1832 को दर्ज हुआ था। यह वाद ईस्ट इंडिया कंपनी की नीलामी को चुनौती देने के लिए दायर किया गया था। तब अदालत ने हिंदू पक्ष के स्वामित्व को वैध माना था। 12 अक्तूबर 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत विवादित जमीन के कुछ हिस्से को मस्जिद प्रबंधन को ईदगाह के रूप में उपयोग करने की अनुमति दी गई थी।
कटरा केशवदेव की जमीन पर पहला कानूनी मामला 15 मार्च 1832 को दर्ज हुआ था। यह वाद ईस्ट इंडिया कंपनी की नीलामी को चुनौती देने के लिए दायर किया गया था। तब अदालत ने हिंदू पक्ष के स्वामित्व को वैध माना था। 12 अक्तूबर 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत विवादित जमीन के कुछ हिस्से को मस्जिद प्रबंधन को ईदगाह के रूप में उपयोग करने की अनुमति दी गई थी।
समझौते की वैधता पर सवाल
अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह और अन्य हिंदू पक्षकारों का तर्क है कि 1968 का यह समझौता अवैध है। उनका कहना है कि मुख्य जमीन की वास्तविक मालिक श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट थी। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ को मालिकाना हक वाली भूमि पर समझौता करने का कानूनी अधिकार नहीं था। उधर शाही ईदगाह पक्ष वर्ष 1968 के इस समझौते को पूरी तरह से वैध मानता है और कहता है कि इसी समझौते के आधार पर उनका हक इस पर है। न्यायालय में इस विवाद से जुड़ी सभी याचिकाओं पर सुनवाई जारी है।
अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह और अन्य हिंदू पक्षकारों का तर्क है कि 1968 का यह समझौता अवैध है। उनका कहना है कि मुख्य जमीन की वास्तविक मालिक श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट थी। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ को मालिकाना हक वाली भूमि पर समझौता करने का कानूनी अधिकार नहीं था। उधर शाही ईदगाह पक्ष वर्ष 1968 के इस समझौते को पूरी तरह से वैध मानता है और कहता है कि इसी समझौते के आधार पर उनका हक इस पर है। न्यायालय में इस विवाद से जुड़ी सभी याचिकाओं पर सुनवाई जारी है।