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डॉक्टर्स डे पर विशेष : ट्रैक पर फेंके नवजात को अस्पताल में मिला दूसरा जन्म, तीन डॉक्टरों की टीम ने बचाई थी जान
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रेलवे ट्रैक पर मिला नवजात, इलाज के बाद अब हो चुका हैं स्वस्थ्य, सर पर अभी हेड इंजरी है निशान
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हर साल 1 जुलाई को भारत में ‘नेशनल डॉक्टर्स डे’ मनाया जाता है। यह दिन उन सरकारी डॉक्टरों को समर्पित है जो निस्वार्थ भाव से मानव जीवन बचाने और स्वास्थ्य सेवाओं में अपना अमूल्य योगदान देते हैं।
टीम ऐसे ही दो मामलों को सामने ला रही है, जो कभी न भुलने वाले पल बनकर एक संस्मरण के रूप में उन डॉक्टरों के साथ-साथ उन परिवारों के मन-मस्तिष्क में भी समा चुके हैं, जो अक्सर सरकारी डॉक्टरों को लेकर कोई न कोई कमी निकालते हैं।
इन डॉक्टरों ने न केवल अपने कर्तव्य और मानवता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाया, बल्कि मानवता का भी अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
इसमें एक कहानी ऐसे नवजात की है जिसे रेलवे ट्रैक पर लावारिस छोड़ दिया गया था, और कैसे महिला जिला अस्पताल की डॉक्टरों की एक समर्पित टीम ने तीन महीने तक उसकी अथक देखभाल कर उसे जीवनदान दिया।
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वहीं दूसरे मामले में प्रसव के दौरान जटिलता आने पर बच्चेदानी के फटने के बावजूद उसे रेफर करने के बजाय पहली बार महिला जिला अस्पताल में ही सफल ऑपरेशन कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया गया।
सात माह पहले मुहम्मदाबाद गोहना रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पर जन्म के तुरंत बाद एक नवजात को मारने की नीयत से फेंक दिया गया था। इस बीच उसके चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनकर स्थानीय लोगों ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद चाइल्डलाइन की टीम ने उसे घायल अवस्था में महिला जिला अस्पताल पहुंचाया।
यहां बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. दुर्गेश, डॉ. कंचन और डॉ. समीर की टीम ने उसका इलाज शुरू किया। सिर के बल रेलवे ट्रैक पर गिरने से उसके सिर में गंभीर चोट आई थी। शिशु की हालत नाजुक थी, ऐसे में तीन डॉक्टरों की टीम ने इस चुनौती को स्वीकार किया।
उन्होंने तीन माह तक न केवल उसका उपचार किया, बल्कि जरूरत पड़ने पर दो यूनिट रक्त भी स्वयं दान किया। टीम के सामूहिक प्रयास से यह नवजात अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुका है।
जिला महिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. नीलेश श्रीवास्तव ने बताया कि तीन माह के उपचार के दौरान स्टाफ का इस नवजात से भावनात्मक जुड़ाव हो गया था। भले ही यह बच्चा अब चाइल्डलाइन के पास है, लेकिन सभी उसकी कुशलता की जानकारी लेते रहते हैं।
प्रसव के दौरान जटिल स्थिति में सफल ऑपरेशन
जिला महिला अस्पताल में तीन माह पहले प्रसव पीड़ा के दौरान सोमवती पत्नी रोहित, जो दूसरे बच्चे के जन्म के लिए भर्ती थीं, प्रसव के समय एक गंभीर जटिलता सामने आई। प्रसव के दौरान बच्चेदानी फट गई, जिससे मां और नवजात दोनों का जीवन खतरे में पड़ गया। यह एक अत्यंत नाजुक और जानलेवा स्थिति थी।
इस स्थिति में महिला अस्पताल की डॉ. शिवांगी और डॉ. माया ने सूझबूझ और तत्परता दिखाते हुए तीन घंटे तक चले जटिल ऑपरेशन के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित किया और सफल प्रसव कराया।
डॉ. शिवांगी ने बताया कि प्रसव के दौरान बच्चेदानी का फटना एक दुर्लभ लेकिन गंभीर आपातकालीन स्थिति है, जिसमें आंतरिक रक्तस्राव का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है।
इससे मां के जीवन पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है और बच्चे को भी ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इस मामले में महिला पहले से मां बन चुकी थीं, लेकिन दूसरे प्रसव के दौरान यह जटिलता उत्पन्न हुई।
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टीम ऐसे ही दो मामलों को सामने ला रही है, जो कभी न भुलने वाले पल बनकर एक संस्मरण के रूप में उन डॉक्टरों के साथ-साथ उन परिवारों के मन-मस्तिष्क में भी समा चुके हैं, जो अक्सर सरकारी डॉक्टरों को लेकर कोई न कोई कमी निकालते हैं।
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इन डॉक्टरों ने न केवल अपने कर्तव्य और मानवता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाया, बल्कि मानवता का भी अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
इसमें एक कहानी ऐसे नवजात की है जिसे रेलवे ट्रैक पर लावारिस छोड़ दिया गया था, और कैसे महिला जिला अस्पताल की डॉक्टरों की एक समर्पित टीम ने तीन महीने तक उसकी अथक देखभाल कर उसे जीवनदान दिया।
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वहीं दूसरे मामले में प्रसव के दौरान जटिलता आने पर बच्चेदानी के फटने के बावजूद उसे रेफर करने के बजाय पहली बार महिला जिला अस्पताल में ही सफल ऑपरेशन कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया गया।
सात माह पहले मुहम्मदाबाद गोहना रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पर जन्म के तुरंत बाद एक नवजात को मारने की नीयत से फेंक दिया गया था। इस बीच उसके चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनकर स्थानीय लोगों ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद चाइल्डलाइन की टीम ने उसे घायल अवस्था में महिला जिला अस्पताल पहुंचाया।
यहां बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. दुर्गेश, डॉ. कंचन और डॉ. समीर की टीम ने उसका इलाज शुरू किया। सिर के बल रेलवे ट्रैक पर गिरने से उसके सिर में गंभीर चोट आई थी। शिशु की हालत नाजुक थी, ऐसे में तीन डॉक्टरों की टीम ने इस चुनौती को स्वीकार किया।
उन्होंने तीन माह तक न केवल उसका उपचार किया, बल्कि जरूरत पड़ने पर दो यूनिट रक्त भी स्वयं दान किया। टीम के सामूहिक प्रयास से यह नवजात अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुका है।
जिला महिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. नीलेश श्रीवास्तव ने बताया कि तीन माह के उपचार के दौरान स्टाफ का इस नवजात से भावनात्मक जुड़ाव हो गया था। भले ही यह बच्चा अब चाइल्डलाइन के पास है, लेकिन सभी उसकी कुशलता की जानकारी लेते रहते हैं।
प्रसव के दौरान जटिल स्थिति में सफल ऑपरेशन
जिला महिला अस्पताल में तीन माह पहले प्रसव पीड़ा के दौरान सोमवती पत्नी रोहित, जो दूसरे बच्चे के जन्म के लिए भर्ती थीं, प्रसव के समय एक गंभीर जटिलता सामने आई। प्रसव के दौरान बच्चेदानी फट गई, जिससे मां और नवजात दोनों का जीवन खतरे में पड़ गया। यह एक अत्यंत नाजुक और जानलेवा स्थिति थी।
इस स्थिति में महिला अस्पताल की डॉ. शिवांगी और डॉ. माया ने सूझबूझ और तत्परता दिखाते हुए तीन घंटे तक चले जटिल ऑपरेशन के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित किया और सफल प्रसव कराया।
डॉ. शिवांगी ने बताया कि प्रसव के दौरान बच्चेदानी का फटना एक दुर्लभ लेकिन गंभीर आपातकालीन स्थिति है, जिसमें आंतरिक रक्तस्राव का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है।
इससे मां के जीवन पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है और बच्चे को भी ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इस मामले में महिला पहले से मां बन चुकी थीं, लेकिन दूसरे प्रसव के दौरान यह जटिलता उत्पन्न हुई।