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Meerut News: विज्ञापन समाचार पालि को वैश्विक विरासत की भाषा के रुप में विकसित करें
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सुभारती विश्वविद्यालय में चल रहे दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन
संवाद न्यूज एजेंसी
मेरठ। सुभारती विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान और प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग के सहयोग से चल रहे दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन हो गया।सम्मेलन का विषय एशिया की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करने और पालि को वैश्विक विरासत की भाषा के रूप में स्थापित करने में भारत की भूमिका रहा।
सम्मेलन में भारत के अलावा कोरिया, थाईलैंड, वियतनाम, म्यांमार, श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड्स, भूटान, नेपाल सहित कई देशों से प्रतिष्ठित विद्वान, बौद्ध भिक्षु, शिक्षाविद, शोधार्थी और छात्र शामिल हुए। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारत सरकार द्वारा 3 अक्टूबर 2024 को पालि भाषा को शास्त्रीय दर्जा दिए जाने के बाद इसके शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं वैश्विक महत्व पर गहन विमर्श करना था। सम्मेलन के दौरान विभिन्न तकनीकी एवं अकादमिक सत्रों में कुल 97 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भारत को पालि एवं बौद्ध धर्म की जन्मभूमि बताते हुए इसे एशिया व विश्व के लिए बौद्धिक एवं सांस्कृतिक केंद्र बनाने की जरूरत पर जोर दिया। समापन सत्र की अध्यक्षता अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के सदस्य तरुणेश बौद्ध ने की।
उन्होंने कहा कि पालि सिर्फ प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक, नैतिक एवं करुणामयी परंपरा की जीवंत धारा है। मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने वीडियो संदेश में कहा कि पालि को शास्त्रीय दर्जा मिलना भारत की बौद्धिक विरासत के पुनरुत्थान की ऐतिहासिक उपलब्धि है। उन्होंने उत्तर प्रदेश को सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, कपिलवस्तु जैसे तीर्थों के कारण वैश्विक बौद्ध केंद्र बनाने में अग्रणी बताया। मुख्य वक्ता प्रो. बिमलेंद्र कुमार ने केंद्रीय संस्थान स्थापना, छात्रवृत्ति विस्तार एवं पालि ग्रंथ अनुवाद पर बल दिया। कुलाधिपति डॉ. स्तुति नारायण कक्कड़ ने इसे वैश्विक मंच पर भारतीय परंपरा स्थापित करने का मील का पत्थर बताया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राकेश सिंह ने किया। मंच संचालन डॉ. सीमा शर्मा एवं डॉ. मनीषा लुथरा ने किया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
मेरठ। सुभारती विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान और प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग के सहयोग से चल रहे दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन हो गया।सम्मेलन का विषय एशिया की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करने और पालि को वैश्विक विरासत की भाषा के रूप में स्थापित करने में भारत की भूमिका रहा।
सम्मेलन में भारत के अलावा कोरिया, थाईलैंड, वियतनाम, म्यांमार, श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड्स, भूटान, नेपाल सहित कई देशों से प्रतिष्ठित विद्वान, बौद्ध भिक्षु, शिक्षाविद, शोधार्थी और छात्र शामिल हुए। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारत सरकार द्वारा 3 अक्टूबर 2024 को पालि भाषा को शास्त्रीय दर्जा दिए जाने के बाद इसके शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं वैश्विक महत्व पर गहन विमर्श करना था। सम्मेलन के दौरान विभिन्न तकनीकी एवं अकादमिक सत्रों में कुल 97 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भारत को पालि एवं बौद्ध धर्म की जन्मभूमि बताते हुए इसे एशिया व विश्व के लिए बौद्धिक एवं सांस्कृतिक केंद्र बनाने की जरूरत पर जोर दिया। समापन सत्र की अध्यक्षता अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के सदस्य तरुणेश बौद्ध ने की।
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उन्होंने कहा कि पालि सिर्फ प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक, नैतिक एवं करुणामयी परंपरा की जीवंत धारा है। मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने वीडियो संदेश में कहा कि पालि को शास्त्रीय दर्जा मिलना भारत की बौद्धिक विरासत के पुनरुत्थान की ऐतिहासिक उपलब्धि है। उन्होंने उत्तर प्रदेश को सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, कपिलवस्तु जैसे तीर्थों के कारण वैश्विक बौद्ध केंद्र बनाने में अग्रणी बताया। मुख्य वक्ता प्रो. बिमलेंद्र कुमार ने केंद्रीय संस्थान स्थापना, छात्रवृत्ति विस्तार एवं पालि ग्रंथ अनुवाद पर बल दिया। कुलाधिपति डॉ. स्तुति नारायण कक्कड़ ने इसे वैश्विक मंच पर भारतीय परंपरा स्थापित करने का मील का पत्थर बताया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राकेश सिंह ने किया। मंच संचालन डॉ. सीमा शर्मा एवं डॉ. मनीषा लुथरा ने किया।
