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कपसाड़ कांड: बालिग है पारस सोम, मां की हत्या करके बेटी का अपरण करने का है आरोपी, अब ऐसे होगी सुनवाई

अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ Published by: Mohd Mustakim Updated Wed, 10 Jun 2026 03:15 PM IST
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सार

Meerut News: आठ जनवरी 2026 को सरधना के कपसाड़ गांव में सुनीता की हत्या करके बेटी का अपहरण कर लिया गया था। इस मामले में गांव के पारस सोम को पुलिस ने जेल भेजा था। पारस की उम्र को लेकर पेंच फंस गया था। 

Kapsad Case: Paras Som is an adult; accused of murdering his mother and abducting his daughter
कपसाड़ मामला - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

कपसाड़ कांड में जेजे बोर्ड ने मुख्य आरोपी पारस सोम को बालिग घोषित कर दिया। अब इस मामले में आगे की सुनवाई SC/ST कोर्ट में होगी। वारदात के वक्त पारस की उम्र 18 साल 7 महीने से ऊपर बताई गई है। वहीं पारस के बालिग होने पर मृतका के पीड़ित बेटे ने निर्णय को सही बताते हुए इंसाफ की उम्मीद जताई है। हालांकि इस मामले में पीड़ित का कहना है कि प्रशासन द्वारा जिस मदद की घोषणा की गई थी, उसमें से कोई मदद नहीं हुई है। 

 

आठ जनवरी को हुई थी सनसनीखेज वारदात
सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव में 8 जनवरी को अनुसूचित जाति की युवती रूबी के अपहरण का मामला सामने आया था। विरोध करने पर युवती की मां सुनीता की फरसे से हमला कर हत्या कर दी गई थी। मृतका के बेटे नरसी कुमार ने गांव के ही एक युवक के खिलाफ हत्या, अपहरण और अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम की धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था।
 
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वारदात के बाद हुआ था भारी हंगामा
घटना के बाद इलाके में तनाव फैल गया था और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर प्रदर्शन हुए थे। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस को गांव की नाकेबंदी करनी पड़ी थी। वारदात के तीसरे दिन पुलिस ने आरोपी को रुड़की से गिरफ्तार कर लिया था और युवती को बरामद कर लिया गया था। बाद में युवती को बयान दर्ज कराने के बाद परिजनों को सौंप दिया गया था।
 
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स्कूल रिकॉर्ड और उम्र पर था विवाद
आरोपी के परिजनों ने दावा किया था कि वह नाबालिग है और इसके समर्थन में हाईस्कूल की अंकतालिका न्यायालय में पेश की थी। इसके बाद अदालत ने आरोपी की आयु निर्धारण के लिए मामला किशोर न्याय बोर्ड को भेज दिया था।
 

सुनवाई के दौरान स्कूल शिक्षक समेत कई लोगों के बयान दर्ज किए गए। कक्षा एक से चार तक का शैक्षणिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने पर किशोर न्याय बोर्ड ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व आदेश का हवाला देते हुए मेडिकल परीक्षण कराने का निर्देश दिया था।

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