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रामपुर तिराहा कांड: 32 साल पुराने मामले में पुलिस ने जो खेल किया, वो जानकर हो जाएंगे हैरान, ये है पूरी कहानी
Wed, 01 Jul 2026 12:14 AM IST
Mohd Mustakim
मदन बालियान, मुजफ्फरनगर
मदन बालियान, मुजफ्फरनगर
Published by: Mohd Mustakim
Updated Wed, 01 Jul 2026 12:14 AM IST
सार
Muzaffarnagar News: अलग राज्य निर्माण की मांग के लिए दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों के साथ एक अक्तूबर 1994 की रात को रामपुर तिराहा पर रोककर बर्बरता की गई थी। इस मामले में तीन पुलिसकर्मियों को डेढ़-डेढ़ साल के कारावास की सजा सुनाई गई है।
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सजा मिलने के बाद सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर ब्रजकिशोर, एसआई अनिल कुमार और एसआई उमेश चंद।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
रामपुर तिराहा कांड में 32 साल पहले की गई पुलिस की मनमानी एक बार फिर साबित हुई। सीबीआई की जांच पर अदालत ने सजा की मुहर लगाई। पुलिसकर्मियों ने देहरादून में खड़ी जीप को बागोवाली में बस दर्शाकर खुखरी भी बरामद दिखाई थी। अदालत में जीप मालिक राजेंद्र कुमार की गवाही महत्वपूर्ण साबित हुई। दूसरे पंजीकरण नंबर की कोई बस या अन्य वाहन ही सीबीआई जांच में नहीं मिला।
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अमर उजाला में प्रकाशित समाचार।
- फोटो : अमर उजाला
गाजियाबाद में रह रहे सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर ब्रज किशोर रामपुर तिराहा कांड के समय झिंझाना थाना प्रभारी थे। उन्होंने दो अक्तूबर 1994 को बसों की चेकिंग की। प्राथमिकी में बस नंबर यूपी 07-0183 से खुखरी बरामद दिखाई। सीबीआई ने वाहन मालिक देहरादून के त्यागी रोड निवासी ट्रांसपोर्टर राजेंद्र सिंह को अदालत में पेश किया। उन्होंने बताया कि 1994 में पड़ोसी राजेश कुमार से महेंद्रा जीप खरीदी थी। गाड़ी को चमोली में दोस्त महफूज के पास भेज दिया था, वह लोकल में इसका संचालन कर रहा था। अलग राज्य की मांग के लिए चल रहे आंदोलन में जीप नहीं भेजी गई। गवाह के बयान से पुलिसकर्मियों की कहानी पर सवाल खड़े हुए।
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आंदोलनकारियों की भीड़।
- फोटो : अमर उजाला
पुलिस ने बस संख्या- यूकेई 1094 से दो तमंचे और पांच कारतूस बरामद दर्शाए लेकिन सीबीआई की जांच में इस नंबर का कोई वाहन पंजीकृत नहीं मिला। उत्तराखंड परिवहन निगम की बस संख्या यूटीएस-1695 के परिचालक विनोद कुमार भट्ट ने स्वीकार किया कि वह ऋषिकेश से दिल्ली के लिए आंदोलनकारियों को लेकर जा रहा था। रामपुर तिराहा पर पुलिस ने बर्बरता की। आंदोलनकारी बस से उतरकर इधर-उधर भाग गए थे। ड्राइवर शिव सिंह गोसाई के साथ वह बस में ही था, लेकिन पुलिस ने हमारी बस से कोई तमंचा या खुखरी बरामद नहीं की। पुलिस की कहानी झूठी पाए जाने के बाद 31 जुलाई 1995 को सीबीआई ने चारों पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था।
विवादित फर्द के कारण भी फंस गई गर्दन
उत्तराखंड राज्य की मांग कर रहे आंदोलकारियों की रोकने की कार्यवाही एक अक्तूबर से दो अक्तूबर 1994 के दिन तक चलती रही। सीबीआई ने कहा कि अभियुक्त ब्रजकिशोर ने विवादित और फर्जी फर्द बरामदगी दिखाते हुए लिखा है कि तलाशी की कार्यवाही दो अक्तूबर को पूर्वाह्न साढ़े 11 से दोपहर एक बजे तक चलती रही। पुलिस ने बरामदगी का स्थान बागोवाली पुलिया दिखाया, जबकि जांच में रामपुर तिराहा साबित हुआ।
उत्तराखंड राज्य की मांग कर रहे आंदोलकारियों की रोकने की कार्यवाही एक अक्तूबर से दो अक्तूबर 1994 के दिन तक चलती रही। सीबीआई ने कहा कि अभियुक्त ब्रजकिशोर ने विवादित और फर्जी फर्द बरामदगी दिखाते हुए लिखा है कि तलाशी की कार्यवाही दो अक्तूबर को पूर्वाह्न साढ़े 11 से दोपहर एक बजे तक चलती रही। पुलिस ने बरामदगी का स्थान बागोवाली पुलिया दिखाया, जबकि जांच में रामपुर तिराहा साबित हुआ।
पुलिस को आई बारुद की बू...रिपोर्ट में नहीं
पुलिस ने रामपुर तिराहा के आंदोलनकारियों की बसों से तमंचे बरामद दिखाए थे। पुलिस का कहना था कि जब तमंचे बरामद किए गए तो बारुद की बू आ रही थी लेकिन अभियोजन साक्षी अभिजित डे ने रिपोर्ट में कहा कि तमंचों से गोली कब चली थी, यह सीएफएसएल रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं हुआ।
पुलिस ने रामपुर तिराहा के आंदोलनकारियों की बसों से तमंचे बरामद दिखाए थे। पुलिस का कहना था कि जब तमंचे बरामद किए गए तो बारुद की बू आ रही थी लेकिन अभियोजन साक्षी अभिजित डे ने रिपोर्ट में कहा कि तमंचों से गोली कब चली थी, यह सीएफएसएल रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं हुआ।
आंदोलनकारियों के पास नहीं थे हथियार
अदालत में गवाह महेंद्र सिंह ने बयान दिया कि एक अक्तूबर 1994 की रात नौ बजे 70-80 गाड़ियां आकर रुकी थी। पुलिस ने ट्रक लगाकर गाड़ियों को रोक लिया। साढ़े नौ से दस बजे के बीच आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच झगड़ा हुआ और रात एक बजे तक चलता रहा। आंदोलनकारी हमारे होटल आए और फिर हमारे साथ रामपुर गांव गए थे, उनके पास कोई हथियार नहीं था। सौ से दो सौ लोगों को गांव में खाना खिलाया गया।
अदालत में गवाह महेंद्र सिंह ने बयान दिया कि एक अक्तूबर 1994 की रात नौ बजे 70-80 गाड़ियां आकर रुकी थी। पुलिस ने ट्रक लगाकर गाड़ियों को रोक लिया। साढ़े नौ से दस बजे के बीच आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच झगड़ा हुआ और रात एक बजे तक चलता रहा। आंदोलनकारी हमारे होटल आए और फिर हमारे साथ रामपुर गांव गए थे, उनके पास कोई हथियार नहीं था। सौ से दो सौ लोगों को गांव में खाना खिलाया गया।
रामपुर तिराहा कांड में कब क्या हुआ
- एक अक्तूबर 1994 की रात रामपुर तिराहा पर वारदात हुई।
- दो अक्तूबर 1994 को आंदोलनकारियों पर मुकदमे दर्ज किए गए।
- 25 जनवरी 1995 को सीबीआई ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए।
- 25 अगस्त 2004 को मुजफ्फरनगर कोर्ट में पत्रावली दाखिल।
- मार्च 2023 में एडीजे-7 को सुनवाई के लिए अधिकृत किया गया।
- मजिस्ट्रेट कोर्ट के मामले एसीजेएम-1 में सुनवाई के लिए अधिकृत।
- 11 अगस्त 2023 को फोटोकॉपी पर सुनवाई के लिए अनुमति दी गई।
- 18 मार्च 2024 को सामूहिक दुष्कर्म में पहला फैसला आया।
- 30 जून 2026 को रामपुर तिराहा कांड का दूसरा फैसला।
- एक अक्तूबर 1994 की रात रामपुर तिराहा पर वारदात हुई।
- दो अक्तूबर 1994 को आंदोलनकारियों पर मुकदमे दर्ज किए गए।
- 25 जनवरी 1995 को सीबीआई ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए।
- 25 अगस्त 2004 को मुजफ्फरनगर कोर्ट में पत्रावली दाखिल।
- मार्च 2023 में एडीजे-7 को सुनवाई के लिए अधिकृत किया गया।
- मजिस्ट्रेट कोर्ट के मामले एसीजेएम-1 में सुनवाई के लिए अधिकृत।
- 11 अगस्त 2023 को फोटोकॉपी पर सुनवाई के लिए अनुमति दी गई।
- 18 मार्च 2024 को सामूहिक दुष्कर्म में पहला फैसला आया।
- 30 जून 2026 को रामपुर तिराहा कांड का दूसरा फैसला।
तीन पुलिसकर्मियों को हुआ है डेढ़-डेढ़ साल का कारावास
रामपुर तिराहा कांड में आंदोलनकारियों से फर्जी तरीके से हथियार बरामदगी दर्शाने के मामले में 32 साल बाद दोषी झिंझाना थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजकिशोर, सिपाही उमेश चंद एवं अनिल कुमार को डेढ़-डेढ़ साल कारावास की सजा एवं 21 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया। एसीजेएम-1/विशेष न्यायालय सीबीआई कोर्ट के पीठासीन अधिकारी डॉ. देवेंद्र सिंह फौजदार ने फैसला सुनाया। दोषियों को निजी मुचलकों पर छोड़ दिया गया और जमानत दाखिल करने के लिए एक जुलाई नियत की गई।
रामपुर तिराहा कांड में आंदोलनकारियों से फर्जी तरीके से हथियार बरामदगी दर्शाने के मामले में 32 साल बाद दोषी झिंझाना थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजकिशोर, सिपाही उमेश चंद एवं अनिल कुमार को डेढ़-डेढ़ साल कारावास की सजा एवं 21 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया। एसीजेएम-1/विशेष न्यायालय सीबीआई कोर्ट के पीठासीन अधिकारी डॉ. देवेंद्र सिंह फौजदार ने फैसला सुनाया। दोषियों को निजी मुचलकों पर छोड़ दिया गया और जमानत दाखिल करने के लिए एक जुलाई नियत की गई।
अलग राज्य निर्माण की मांग के लिए दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को एक अक्तूबर 1994 की रात को रामपुर तिराहा पर रोककर बर्बरता की गई थी। दो अक्तूबर को पुलिसकर्मियों ने छपार थाना क्षेत्र में सुबह सात बजे बागोवाली पुलिया के पास आंदोलनकारियों की बसों की चेकिंग की थी। तीन बसों से चार तमंचे, खुखरी और कारतूस बरामद दिखाए थे। विरोध में उत्तराखंड संघर्ष समिति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, जिसके बाद सीबीआई ने मामले की जांच की।
सीबीआई ने हथियारों की बरामदगी को फर्जी पाते हुए शामली जिले के झिंझाना थाने के तत्कालीन उप निरीक्षक गाजियाबाद के प्रताप विहार निवासी ब्रज किशोर, मेरठ निवासी सिपाही अनिल कुमार, मेरठ में रह रहे सिपाही उमेशचंद और कमल किशोर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। ट्रायल के दौरान कमल किशोर की मौत हो गई। सीबीआई की ओर से 17 गवाह पेश किए गए। मंगलवार को अदालत ने तीनों आरोपियों पर दोष सिद्ध करते हुए सजा सुनाई।
आईपीसी की किस धारा में क्या समाज मिली
- 120 बी :डेढ़-डेढ़ साल कारावास, पांच हजार रुपये अर्थदंड
- 180 : तीन-तीन महीने की सजा, एक हजार रुपये अर्थदंड
- 211 : एक-एक साल कारावास, पांच हजार रुपये अर्थदंड
- 218 : डेढ़-डेढ़ साल कारावास, पांच हजार रुपये अर्थदंड
- धारा 25 : डेढ़-डेढ़ साल कारावास, पांच हजार रुपये अर्थदंड
- 120 बी :डेढ़-डेढ़ साल कारावास, पांच हजार रुपये अर्थदंड
- 180 : तीन-तीन महीने की सजा, एक हजार रुपये अर्थदंड
- 211 : एक-एक साल कारावास, पांच हजार रुपये अर्थदंड
- 218 : डेढ़-डेढ़ साल कारावास, पांच हजार रुपये अर्थदंड
- धारा 25 : डेढ़-डेढ़ साल कारावास, पांच हजार रुपये अर्थदंड
दोषी ब्रज किशोर बोला...किसी ने सुध नहीं ली
सजा के बाद निजी मुचलकों पर छूटने के बाद दोषी सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर ब्रज किशोर ने कहा कि तत्कालीन डीजी, डीआईजी, डीएम और एसएसपी ने उल्टा सीधा कराकर कभी सुध नहीं ली। किसी ने नहीं देखा कि हम कोर्ट में किस तरह केस लड़ रहे हैं।
सजा के बाद निजी मुचलकों पर छूटने के बाद दोषी सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर ब्रज किशोर ने कहा कि तत्कालीन डीजी, डीआईजी, डीएम और एसएसपी ने उल्टा सीधा कराकर कभी सुध नहीं ली। किसी ने नहीं देखा कि हम कोर्ट में किस तरह केस लड़ रहे हैं।
आपराधिक षड्यंत्र...राज व्यवस्था के खिलाफ अपराध
रामपुर तिराहा कांड के 60 पेज के फैसले में लिखा कि न्यायालय का यह मत है कि जब राज्य के कर्मचारी (पुलिस अधिकारीगण) स्वयं ही निर्दोष नागरिकों को फंसाने के लिए आपराधिक षड्यंत्र रचते हैं। फर्जी साक्ष्य गढ़ते हैं तो यह केवल व्यक्ति के विरुद्ध ही नहीं बल्कि संपूर्ण राज्य व्यवस्था और न्याय प्रणाली के विरुद्ध अपराध होता है। संवैधानिक व्यवस्था में राज्य एवं राज्य के सेवकों का प्रथम दायित्व ही नागरिकों एवं व्यक्तियों का विधिक संरक्षण है। ब्यूरो
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