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कृषि के दो भस्मासुर...पहला ग्लोबल वार्मिंग और दूसरा एआई : पद्मश्री पालेकर

Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 23 Mar 2026 12:43 AM IST
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Two demons of agriculture: First global warming and second AI Padmashree Palekar
डॉ. सुभाष पालेकर
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मुजफ्फरनगर। कृषि का ऋषि कहे जाने वाले जीरो बजट खेती के जनक पद्मश्री डॉ. सुभाष पालेकर रविवार को मुजफ्फरनगर में पश्चिमी यूपी के किसानों को जीरो बजट खेती का मंत्र देने सिसौली के किसान भवन पहुंचे। उन्होंने किसानों को सजग करतेे हुए ग्लोबल वार्मिंग और एआई को खेती का भस्मासुर करार दिया।
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उनका कहना था कि मुनाफा बढ़ाने और लागत कम करने के लिए अन्नदाताओं को बाजार के चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। यहां प्रस्तुत है डिजिटल खेती या एआई आधारित कृषि ज्ञान से लेकर उन्नतिशील खेती-बागवानी से जुड़े विषयों पर उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...
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सवाल : जीरो बजट खेती है क्या।
पालेकर: जीरो बजट खेती के फार्मूले से देश में किसानों के बीच नई उम्मीद जगी है। जाहिर है, रासायनिक खादों के चक्रव्यूह में उलझे किसानों की जेब तक मुनाफा नहीं पहुंचता। ऐसे में हर साल लागत बढ़ जाती है और किसान निराश हो रहेे हैं। ऐसे में अब जीरो बजट खेती वाले कृषि के नए युग में प्रवेश करना होगा। कम लागत आने के कारण इसे जीरो बजट खेती कहा गया। अब इसका नाम सुभाष पालेकर कृषि रखा है।

सवाल : इस महंगाई के दौर में खेती की लागत कम करने का तरीका क्या हो सकता है।

पालेकर: देखिए, इसके लिए जरूरी है कि किसान अपनी फसल मंडी में न बेचें। अब समय फसल को सीधे ग्राहक तक पहुंचाने का है। इससे किसान को कभी नुकसान नहीं होगा। खरीदार को तलाश कर अपनी मर्जी से अपनी फसल का दाम खुद तय करना चाहिए।

सवाल : अब तक कितने किसान आपके मॉडल से जुड़कर खेती कर रहे हैं।
पालेकर: पूरे देश में लगभग 70 लाख किसान इस पद्धति से कृषि कर रहे हैं। कुछ किसान वीडियो के माध्यम से सीखकर भी इस मॉडल को अपना रहे हैं। संख्या बड़ी है, रोज किसान जुड़ रहे हैं।

सवाल : श्रीलंका के बारे में कहा जाता है कि वहां किसानों ने जैविक खेती का मॉडल अपनाया। इससे वहां की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। इस पर आपका क्या कहना है।
पालेकर :सच है कि इससे वहां की अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा। क्योंकि, जैविक खेती रासायनिक खेती से भी विनाशकारी है। जैविक खेती से ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने वाली गैस ज्यादा मात्रा में उत्सर्जित होती हैं। भूमि की उर्वरा शक्ति कम होती है।

सवाल : हरित क्रांति को आप एक षडयंत्र बताते हैं। इसकी वजह क्या है।
पालेकर : हरित क्रांति अमेरिका से आई। उन्होंने संकर बीज लोगों दिए। कृषि के लिए वहां की भौगोलिक परिस्थिति अलग है। भारत में जिस समय हरित क्रांति आई, उस समय यह देश के लिए जरूरी थी। अब खेती में रसायनों का प्रयोग अत्यधिक बढ़ गया है। इससे खाद्य पदार्थ विषैले हो चुके हैं। रसायनों को छोड़कर गाय के गोबर और गो मूत्र से खेती करनी होगी।
सवाल : अब किसान रासायनिक खेती करने का आदी हो चुका है। यदि आपके मॉडल को अपनाया जाए तो उत्पादन पर कोई प्रभाव पड़ेगा।
पालेकर : यदि आप जीरो बजट पद्धति से खेती करते हैं, तो पहले वर्ष से ही रासायनिक कृषि के बराबर या उससे भी अधिक उत्पादन मिलेगा। जो किसान इस पद्धति से कृषि कर रहे हैं, उन किसानों से आप मिल सकते हैं।

सवाल : आने वाली पीढ़ी को लोग किसान नहीं बनाना चाहते। ऐसा क्यों,आप इस पर आपकी क्या है।
पालेकर : देखिए, इस समय खेती के दो भस्मासुर हैं। पहला है ग्लोबल वार्मिंग और दूसरा एआई। यही वजह है कि किसान को लगता है खेती से लाभ नहीं है। उत्पादन बढ़ाने के चक्कर में रासायनिक खादों के प्रयोग से लगातार लागत बढ़ रही है। लागत घटाना ही समाधान है। जब कृषि लाभकारी होगी तो युवा पीढ़ी भी खेती की ओर आकर्षित होगी।
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