पीलीभीत: मतदाता सूची के खेल में उच्चाधिकारियों पर भी कार्रवाई की आंच, कई सवालों के जवाब मिलने के बाकी
पीलीभीत की मतदाता सूची में हुई गड़बड़ी का मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। इस मामले में दो एसडीएम निलंबित हो चुके हैं। मामले की जांच की आंच उच्चाधिकारियों पर भी आनी तय मानी जा रही है। इस मामले को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं, जिनके जवाब आना बाकी हैं।
विस्तार
पीलीभीत की सदर विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में संशोधन के नाम पर हुआ कथित फर्जीवाड़ा अब दो एसडीएम और एक कंप्यूटर ऑपरेटर पर कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उच्चाधिकारियों पर भी इसकी आंच आनी तय मानी जा रही है। मतदाता सूची में संशोधन का फर्जीवाड़ा सामान्य चूक नहीं, बल्कि अब एक सोची-समझी और गहरी गड़बड़ी का परिणाम माना जा रहा है।
कुल 13,779 फॉर्म-8 प्रविष्टियों में से 10,470 को मंजूरी दी गई, लेकिन जांच में इनके समर्थन में मूल आवेदन और अभिलेख उपलब्ध नहीं मिले। आरोप है कि ईआरओ की लॉगिन आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल कर बिना निर्धारित प्रक्रिया पूरी किए संशोधन किए गए। तत्कालीन एसडीएम मयंक गोस्वामी और हेमंत चौधरी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार की सेवा समाप्त करने की संस्तुति भी भेजी गई है। अब पांच एईआरओ की भूमिका के साथ जिला स्तर पर निगरानी की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों से भी जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
एक शिकायत ने खोली संशोधन प्रक्रिया की परतें
मामले की शुरुआत तब हुई जब सदर विधानसभा क्षेत्र में कुछ मतदाताओं के ईपीआईसी नंबर पर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम और पिता का नाम प्रदर्शित होने की शिकायत सामने आई। कांग्रेस ने अपनी पड़ताल में 16,554 मतदाताओं से संबंधित कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाया। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने ज्ञापन और प्रेसवार्ता के माध्यम से निर्वाचन आयोग तथा प्रशासन से जांच कराने की मांग उठाई। इसके बाद आयोग के निर्देश पर जिला स्तर पर अभिलेखों और ऑनलाइन प्रविष्टियों का परीक्षण कराया गया।
जांच में 31 मई से 29 अगस्त 2026 के बीच मतदाता विवरण संशोधन के लिए 13,779 फॉर्म-8 प्रविष्टियां दर्ज होने का पता चला। इनमें 10,470 स्वीकृत और 3,309 अस्वीकृत थीं। हैरानी की बात यह रही कि इन प्रविष्टियों के समर्थन में मूल आवेदन और संबंधित अभिलेख उपलब्ध नहीं मिले। इसी आधार पर संशोधन की पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई।
मामले में अब अमरिया के तहसीलदार, अमरिया और ललौरीखेड़ा के खंड शिक्षा अधिकारी तथा दोनों ब्लॉकों के खंड विकास अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है। ये पांचों अधिकारी संबंधित अवधि में सदर विधानसभा क्षेत्र में एईआरओ की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। जिलाधिकारी ने उनकी भूमिका के संबंध में निर्वाचन आयोग को रिपोर्ट भेजी है।
इसके अलावा अमरिया तहसील के 150 बूथों पर मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में है। इन बूथों पर 150 बीएलओ और 35 सुपरवाइजरों को लगाकर मतदाता विवरण का सत्यापन कराया जा रहा है। नाम, पिता का नाम और ईपीआईसी नंबर समेत अन्य जानकारियों में मिली त्रुटियों को दुरुस्त किया जा रहा है।
अब जिला स्तर की निगरानी पर भी सवाल
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब यह सवाल भी उठ रहा है कि जब तीन महीने तक हजारों प्रविष्टियां दर्ज और स्वीकृत होती रहीं तो जिला निर्वाचन कार्यालय के स्तर पर उनकी निगरानी कैसे हुई? मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की ओर से जिला स्तर पर मॉनिटरिंग और जिम्मेदारी के बिंदुओं की पड़ताल किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस क्रम में संबंधित अवधि में तैनात रहे पूर्व और वर्तमान जिला निर्वाचन अधिकारियों से भी चुंनाव आयोग ने स्पष्टीकरण मांगा है।
शिकायत से उच्चस्तरीय जांच तक ऐसे बढ़ी कार्यवाही
- 21 अक्तूबर कांग्रेस ने 16,554 मतदाताओं से जुड़ी कथित गड़बड़ियों का मुद्दा उठाया। दोनों एसडीएम को जिला मुख्यालय से संबद्ध किया गया।
- 22 अक्तूबर एसडीएम मयंक गोस्वामी, हेमंत चौधरी और कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार के खिलाफ कोतवाली नगर में एफआईआर दर्ज हुई।
- 23 अक्तूबर 13,779 प्रविष्टियों की जांच का विवरण सामने आया। पांच एईआरओ और अमरिया के 150 बूथों की पड़ताल शुरू हुई।
- 25 अक्तूबर वीआरसी ऑपरेटर की सेवा समाप्त करने की संस्तुति निर्वाचन आयोग को भेजी गई।
- 30 अक्तूबर शासन ने दोनों एसडीएम को लखनऊ में नई तैनाती दी।
- 31 अक्तूबर दोनों एसडीएम को शासन ने प्रतीक्षा सूची में डाला, दोनों जिले से कार्यमुक्त किए गए।
- 31 अक्तूबर निर्वाचन आयोग ने दोनों ईआरओ को निलंबित करने और एफआईआर में बीएनएस की धारा 198 जोड़ने के निर्देश दिए।
ईआरओ की आईडी ऑपरेटर तक कैसे पहुंची?
प्रशासनिक जांच में सामने आया कि कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार को ईआरओ की लॉगिन आईडी और पासवर्ड दिए गए थे। आरोप है कि इसी लॉगिन के माध्यम से मूल फॉर्म के बिना ही मतदाताओं के विवरण में संशोधन किए गए। निर्वाचन व्यवस्था में लॉगिन आईडी और पासवर्ड संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी और नियंत्रण में रहते हैं। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि गोपनीय लॉगिन ऑपरेटर तक कैसे पहुंचा, कितनी प्रविष्टियां किसके स्तर से दर्ज हुईं और उन्हें अंतिम मंजूरी किसने दी?
जांच में मयंक गोस्वामी और हेमंत चौधरी की भूमिका भी सामने आने के बाद दोनों के खिलाफ सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी की तहरीर पर 22 अक्तूबर को कोतवाली नगर में मुकदमा दर्ज कराया गया। दोनों उस अवधि में सदर विधानसभा क्षेत्र के ईआरओ रहे थे। ऑपरेटर अनिल कुमार के खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज हुई। बाद में उसकी सेवा समाप्त करने की संस्तुति निर्वाचन आयोग को भेज दी गई।
जांच में इन सवालों के जवाब आना बाकी
ईआरओ की गोपनीय लॉगिन आईडी और पासवर्ड ऑपरेटर तक कैसे पहुंचे? मूल फॉर्म के बिना 10,470 प्रविष्टियों को मंजूरी किस प्रक्रिया से मिली? बीएलओ और एईआरओ स्तर पर सत्यापन की व्यवस्था क्यों प्रभावी नहीं रही? डिजिटल लॉगिन का इस्तेमाल किसने और किन तारीखों में किया? जिला निर्वाचन कार्यालय ने नियमित समीक्षा के दौरान इतनी बड़ी संख्या में प्रविष्टियों की जांच क्यों नहीं की? पांच एईआरओ और संबंधित निगरानी अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी बनती है?
प्रदेशभर के अधिकारियों को लॉगिन सुरक्षा के निर्देश
पीलीभीत के प्रकरण ने निर्वाचन संबंधी डिजिटल व्यवस्था की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किए हैं। ईआरओ की यूजर आईडी, पासवर्ड और ओटीपी की गोपनीयता बनाए रखना अब अहम विषय बन गया है। निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपनी लॉगिन जानकारी किसी अन्य व्यक्ति से साझा न करें और ईसीआई नेट पर स्वयं लॉगिन कर प्रतिदिन कामकाज की समीक्षा करें। इसका उद्देश्य किसी ऑपरेटर या दूसरे कर्मचारी के स्तर से अनधिकृत बदलाव की आशंका को रोकना है।
अब पुलिस की विवेचना में कंप्यूटर सिस्टम, लॉगिन हिस्ट्री, डिजिटल रिकॉर्ड और प्रविष्टियों की स्वीकृति से जुड़े तथ्यों की जांच महत्वपूर्ण होगी। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि संशोधन किस लॉगिन से, किस समय और किस स्तर पर किए गए। फिलहाल प्रशासनिक जांच, विभागीय कार्रवाई और निर्वाचन आयोग के निर्देशों के बाद इस प्रकरण में जवाबदेही तय होने का इंतजार है।
सीओ सिटी अमरनाथ वर्मा ने बताया कि इस मामले में कोतवाली में एफआईआर दर्ज है। तथ्यों के आधार पर मामले की विवेचना चल रही है। जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे उसके अनुसार नियमानुसार पुलिस के स्तर से कार्रवाई की जाएगी।
जिलाधिकारी आलोक कुमार ने बताया कि सदर विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में सामने आईं 10,470 नामों की गड़बड़ी को अब नियमानुसार दुरुस्त कराया जा रहा है। इसके लिए 12 नवंबर से शुरू हो रहे विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान के दौरान प्राप्त आवेदनों के आधार पर इन त्रुटियों को ठीक कराया जाएगा।