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बदलाव : डीजे के शोर में गुम हुए फाल्गुन के गीत
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
Updated Thu, 26 Feb 2026 12:37 AM IST
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सहारनपुर। मैं होली कैसे खेलूंगी सांवरिया के संग..., मोहन खेले होली हो..., जैसे गीत अब डीजे की धूम के बीच गुम होते जा रहे हैं। वसंत के आगमन के साथ ही वातावरण में एक अलग मस्ती और घरों में तैयारी शुरू हो जाती थी। बदलते दौर में होली का त्योहार दो दिन का रह गया है। भागती दौड़ती जिंदगी में त्योहार की रंगत और रौनक घटती जा रही है।
यह बातें आवास विकास के हरि मंदिर में हुए अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में निकलकर सामने आए। लोक गीत और परंपरागत तरीके से त्योहार मनाने को लेकर हुए संवाद में महिलाओं ने विचार रखे। दीपिका राठी ने बताया कि होली का त्योहार आते ही कभी ढोलक की थाप व मंजीरों पर चारों ओर फाग गीत गुंजायमान होने लगते थे, लेकिन आधुनिकता के दौर में यह परंपरा लुप्त सी हो चली है।
कविता श्रीवास्तव ने बताया कि आधुनिकता की दौड़ में हमारी परंपराएं सिसक रही है। मीना अरोड़ा का कहना था कि आज सबसे अधिक जरूरत युवा पीढ़ी को अपनी परंपराओं से परिचय कराने की है। त्योहार कंप्यूटर गेम नहीं, बल्कि हमारी विरासत है।
नीलम कालड़ा, मीना अरोड़ा ने बताया कि त्योहार के दिन गलियों में दिखने वाली टोलियां अब गायब हो गई है। सभी अपने में सिसकती जा रही है। रेखा, लोचन, पूनम यादव ने बताया कि बदलते दौर में त्योहारों का बदलना लाजिमी है, लेकिन हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि त्योहार मनाने के पीछे की भावना में बदलाव न हो। वहीं हरि मंदिर समिति के प्रधान राजेंद्र अरोड़ा, गोपाल दास, सचिव तुषार अग्रवाल ने कहा कि त्योहार का मजा तो सबके साथ मिल जुलकर मनाने का है। होली का त्योहार हो और पकवान की बात न हो, तो त्योहार अधूरा सा लगता है।
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यह बातें आवास विकास के हरि मंदिर में हुए अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में निकलकर सामने आए। लोक गीत और परंपरागत तरीके से त्योहार मनाने को लेकर हुए संवाद में महिलाओं ने विचार रखे। दीपिका राठी ने बताया कि होली का त्योहार आते ही कभी ढोलक की थाप व मंजीरों पर चारों ओर फाग गीत गुंजायमान होने लगते थे, लेकिन आधुनिकता के दौर में यह परंपरा लुप्त सी हो चली है।
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कविता श्रीवास्तव ने बताया कि आधुनिकता की दौड़ में हमारी परंपराएं सिसक रही है। मीना अरोड़ा का कहना था कि आज सबसे अधिक जरूरत युवा पीढ़ी को अपनी परंपराओं से परिचय कराने की है। त्योहार कंप्यूटर गेम नहीं, बल्कि हमारी विरासत है।
नीलम कालड़ा, मीना अरोड़ा ने बताया कि त्योहार के दिन गलियों में दिखने वाली टोलियां अब गायब हो गई है। सभी अपने में सिसकती जा रही है। रेखा, लोचन, पूनम यादव ने बताया कि बदलते दौर में त्योहारों का बदलना लाजिमी है, लेकिन हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि त्योहार मनाने के पीछे की भावना में बदलाव न हो। वहीं हरि मंदिर समिति के प्रधान राजेंद्र अरोड़ा, गोपाल दास, सचिव तुषार अग्रवाल ने कहा कि त्योहार का मजा तो सबके साथ मिल जुलकर मनाने का है। होली का त्योहार हो और पकवान की बात न हो, तो त्योहार अधूरा सा लगता है।
