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Shamli News: 20 और 100 रुपये के इकरारनामे पर बन रहे रिश्ते, 15 दिन में टूट रहे
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
Updated Wed, 01 Apr 2026 01:13 AM IST
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शामली। जिले में लिव-इन रिलेशनशिप का चलन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही विवादों के मामले भी सामने आ रहे हैं। अब लोग 20 से लेकर 100 रुपये के स्टांप पेपर पर इकरारनामा कर साथ रहने लगे हैं, मगर ऐसे रिश्ते महज 12 से 15 दिन में ही टूट रहे हैं।
स्थिति यह है कि पुलिस और वन स्टॉप सेंटर में ऐसे छह मामले पहुंचे हैं। इनमें से दो मामलों में पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। इकरारनामों में महिला को प्रथम पक्ष और पुरुष को द्वितीय पक्ष दर्शाया जा रहा है। साथ ही, दोनों पक्षों के बीच कई शर्तें भी तय की जा रही हैं, जो बाद में विवाद का कारण बन रही हैं। संवाद
केस-1:
ऊन क्षेत्र के एक युवक शोभित ने 100 रुपये के स्टांप पेपर पर पानीपत की महिला के साथ लिव-इन का इकरारनामा किया। दोनों साथ रहने लगे, लेकिन करीब 15 दिन बाद विवाद हो गया। आरोप है कि महिला घर का सामान लेकर चली गई। पुलिस ने मामले में महिला सोनिया के खिलाफ 24 मार्च को प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
केस-2
रेलपार निवासी शादीशुदा महिला ने पति की मृत्यु के बाद कैराना निवासी युवक के साथ लिव-इन शुरू किया। 20 रुपये के इकरारनामे में साथ रहने की शर्तें तय की गईं, लेकिन कुछ दिनों बाद महिला ने मारपीट का आरोप लगाते हुए साथ छोड़ दिया। फिलहाल अधिकारियों द्वारा सुलह का प्रयास किया जा रहा है।
केस-3
दिल्ली रोड निवासी युवक मनबीर ने शादीशुदा महिला के साथ इकरारनामा कर लिव-इन शुरू किया। 15 दिन बाद महिला घर में रखे जेवर लेकर चली गई। मनबीर का आरोप है कि पत्नी जमीन और घर नाम कराने की जिद कर रही थी। पीड़ित ने 22 मार्च को कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई है।
इकरारनामों में रखी जा रहीं ये शर्तें
अधिवक्ताओं के अनुसार इन इकरारनामों में दोनों पक्ष एक-दूसरे पर शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना का आरोप न लगाने और चल-अचल संपत्ति पर दावा न करने जैसी शर्तें लिखवा रहे हैं। हालांकि कानूनविदों का कहना है कि ऐसे दस्तावेज केवल औपचारिकता हैं और उनकी कोई ठोस कानूनी वैधता नहीं है।
क्या कहते हैं अधिकारी और कानून विशेषज्ञ
एसपी नरेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार लिव-इन संबंधों के लिए स्टांप पेपर पर बनाया गया इकरारनामा एक निजी दस्तावेज है, जिसे कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है। शिकायत मिलने पर पहले सुलह का प्रयास किया जाता है, इसके बाद जांच के आधार पर कार्रवाई की जाती है।
वरिष्ठ अधिवक्ता सन्नी निर्वाल के अनुसार लिव-इन में रहना अवैध नहीं है, लेकिन इसके लिए किसी प्रकार का आधिकारिक पंजीकरण या इकरारनामा अनिवार्य नहीं है। पुलिस भी शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई करती है।
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स्थिति यह है कि पुलिस और वन स्टॉप सेंटर में ऐसे छह मामले पहुंचे हैं। इनमें से दो मामलों में पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। इकरारनामों में महिला को प्रथम पक्ष और पुरुष को द्वितीय पक्ष दर्शाया जा रहा है। साथ ही, दोनों पक्षों के बीच कई शर्तें भी तय की जा रही हैं, जो बाद में विवाद का कारण बन रही हैं। संवाद
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केस-1:
ऊन क्षेत्र के एक युवक शोभित ने 100 रुपये के स्टांप पेपर पर पानीपत की महिला के साथ लिव-इन का इकरारनामा किया। दोनों साथ रहने लगे, लेकिन करीब 15 दिन बाद विवाद हो गया। आरोप है कि महिला घर का सामान लेकर चली गई। पुलिस ने मामले में महिला सोनिया के खिलाफ 24 मार्च को प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
केस-2
रेलपार निवासी शादीशुदा महिला ने पति की मृत्यु के बाद कैराना निवासी युवक के साथ लिव-इन शुरू किया। 20 रुपये के इकरारनामे में साथ रहने की शर्तें तय की गईं, लेकिन कुछ दिनों बाद महिला ने मारपीट का आरोप लगाते हुए साथ छोड़ दिया। फिलहाल अधिकारियों द्वारा सुलह का प्रयास किया जा रहा है।
केस-3
दिल्ली रोड निवासी युवक मनबीर ने शादीशुदा महिला के साथ इकरारनामा कर लिव-इन शुरू किया। 15 दिन बाद महिला घर में रखे जेवर लेकर चली गई। मनबीर का आरोप है कि पत्नी जमीन और घर नाम कराने की जिद कर रही थी। पीड़ित ने 22 मार्च को कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई है।
इकरारनामों में रखी जा रहीं ये शर्तें
अधिवक्ताओं के अनुसार इन इकरारनामों में दोनों पक्ष एक-दूसरे पर शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना का आरोप न लगाने और चल-अचल संपत्ति पर दावा न करने जैसी शर्तें लिखवा रहे हैं। हालांकि कानूनविदों का कहना है कि ऐसे दस्तावेज केवल औपचारिकता हैं और उनकी कोई ठोस कानूनी वैधता नहीं है।
क्या कहते हैं अधिकारी और कानून विशेषज्ञ
एसपी नरेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार लिव-इन संबंधों के लिए स्टांप पेपर पर बनाया गया इकरारनामा एक निजी दस्तावेज है, जिसे कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है। शिकायत मिलने पर पहले सुलह का प्रयास किया जाता है, इसके बाद जांच के आधार पर कार्रवाई की जाती है।
वरिष्ठ अधिवक्ता सन्नी निर्वाल के अनुसार लिव-इन में रहना अवैध नहीं है, लेकिन इसके लिए किसी प्रकार का आधिकारिक पंजीकरण या इकरारनामा अनिवार्य नहीं है। पुलिस भी शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई करती है।