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Siddharthnagar News: कागजों में निगरानी, जमीन पर लापरवाही...और ढह गया मछली मंडी का गेट
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 05 Jun 2026 02:50 AM IST
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तुलसियापुर। मधवापुर में निर्माणाधीन मछली मंडी का गेट गिरने से मजदूर मुश्ताक की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं बल्कि सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी व्यवस्था की बड़ी चूक है। लोगों के अनुसार, ठेकेदार निर्माण स्थल पर कम ही दिखाई देता था और अधिकांश काम एक मुंशी के भरोसे संचालित हो रहा था, जिस गेट का निर्माण कराया जा रहा था, उसके नीचे हाल में ही मिट्टी भरी गई थी। दोनों पिलर भी नए बने थे। ऐसे में पर्याप्त मजबूती हासिल करने से पहले ही ऊपर की ढलाई शुरू कर दी गई। स्थानीय लोगों के मुताबिक शटरिंग में भी मानक के अनुरूप सामग्री का उपयोग नहीं किया गया, जिससे पूरा ढांचा असंतुलित हो गया।
बृहस्पतिवार को घटनास्थल का निरीक्षण करने पहुंची शोहरतगढ़ एसडीएम कर्मेंद्र कुमार के नेतृत्व में पहुंची टीम को लोगों ने हकीकत से रूबरू कराया। गठित समिति के सदस्यों पीडब्ल्यूडी के अधिशासी अभियंता कमल किशोर और बढ़नी बीडीओ अनिशी मणि पांडेय ने ने अध्यक्ष की निगरानी में निर्माण सामग्री और गेट के ढांचे का बारीकी से जांच की। स्थानीय लोगों से घटना के संबंध में जानकारी जुटाई। निरीक्षण के दौरान शटरिंग में खामियों और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी वहां के लोगों से चर्चा की।
सबसे बड़ा सवाल निर्माण कार्य की तकनीकी निगरानी को लेकर उठ रहा है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि यदि विभागीय इंजीनियर मौके पर मौजूद होते या नियमित निगरानी होती तो ऐसी स्थिति ही नहीं बनती। निर्माण स्थल पर जिस तरह का काम चल रहा था, उसे तकनीकी स्तर पर रोका जा सकता था। अब पूरे मामले में निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। हालांकि स्थानीय लोगों का मानना है कि केवल तकनीकी कारण तलाश लेना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी तय होना चाहिए कि यदि निर्माण में खामियां थीं तो उन्हें समय रहते रोकने और सुधारने की जिम्मेदारी किसकी थी।
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चेतावनी पर चेते होते तो जिंदा होता मुश्ताक
- यह हादसा इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि 19 मई को जिलाधिकारी शिवशरणप्पा जीएन ने स्वयं निर्माणाधीन मछली मंडी का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने कार्य की गुणवत्ता और धीमी प्रगति पर नाराजगी जताते हुए संबंधित अधिकारियों और कार्यदाई संस्था को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि मानकों से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसके महज 15 दिन बाद गेट का ढह जाना चेतावनी के बाद भी निगरानी तंत्र की सक्रियता पर सवाल खड़े कर रहा है।
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अभी 60 फीसदी काम अधूरा
- करीब 5.56 करोड़ रुपये की लागत से बन रही इस मछली मंडी को जिले की महत्वपूर्ण परियोजनाओं में शामिल किया गया है। परियोजना में 26 दुकानें, कैंटीन, बैंक, सिक्योरिटी कार्यालय, स्टाफ रूम और सात प्लेटफॉर्म प्रस्तावित हैं। इनमें दो प्लेटफॉर्म कवर्ड होंगे तथा मंडी में प्रवेश और निकास के लिए तीन गेट बनाए जा रहे हैं। निर्माण कार्य मार्च में शुरू हुआ था और लगभग 40 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था।
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एक घर पर दोहरी मार, मां के बाद बेटे को खोया
मधवापुर हादसे में जान गंवाने वाला मड़नी गांव निवासी मुश्ताक अपने परिवार का सहारा था। परिवार अभी उसकी मां की मौत के सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि बुधवार को हुई दुर्घटना ने दूसरा बड़ा आघात दे दिया। परिजनों के अनुसार, मुश्ताक की मां का निधन करीब 15 दिन पहले हुआ था। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार में पिता किताबुल्लाह और उनके बेटे मजदूरी कर घर चलाते हैं। बुधवार को शटरिंग के काम के लिए अतिरिक्त मजदूरों की जरूरत पड़ी तो मुंशी ने मुश्ताक को वहां लगा दिया। कुछ ही देर बाद गेट भरभराकर गिर पड़ा और मलबे में दबकर उसकी मौत हो गई। रात में जब पोस्टमार्टम के बाद शव गांव पहुंचा तो पूरे माहौल में मातम पसर गया। गांव के कब्रिस्तान में देर रात उसका अंतिम संस्कार किया गया। परिवार में अब बूढ़े पिता, एक बड़ा भाई और दो नाबालिग भाइयों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
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पांच बड़े सवाल
- डीएम की चेतावनी के बाद भी निर्माण की निगरानी क्यों नहीं की गई?
- क्या ढलाई से पहले पिलरों को पर्याप्त समय दिया गया था?
- शटरिंग में मानक सामग्री का इस्तेमाल हुआ या नहीं?
- निर्माण स्थल पर तकनीकी पर्यवेक्षण कौन कर रहा था?
- हादसे की जिम्मेदारी सिर्फ मजदूरों तक सीमित रहेगी या जवाबदेही तय होगी?
बृहस्पतिवार को घटनास्थल का निरीक्षण करने पहुंची शोहरतगढ़ एसडीएम कर्मेंद्र कुमार के नेतृत्व में पहुंची टीम को लोगों ने हकीकत से रूबरू कराया। गठित समिति के सदस्यों पीडब्ल्यूडी के अधिशासी अभियंता कमल किशोर और बढ़नी बीडीओ अनिशी मणि पांडेय ने ने अध्यक्ष की निगरानी में निर्माण सामग्री और गेट के ढांचे का बारीकी से जांच की। स्थानीय लोगों से घटना के संबंध में जानकारी जुटाई। निरीक्षण के दौरान शटरिंग में खामियों और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी वहां के लोगों से चर्चा की।
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सबसे बड़ा सवाल निर्माण कार्य की तकनीकी निगरानी को लेकर उठ रहा है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि यदि विभागीय इंजीनियर मौके पर मौजूद होते या नियमित निगरानी होती तो ऐसी स्थिति ही नहीं बनती। निर्माण स्थल पर जिस तरह का काम चल रहा था, उसे तकनीकी स्तर पर रोका जा सकता था। अब पूरे मामले में निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। हालांकि स्थानीय लोगों का मानना है कि केवल तकनीकी कारण तलाश लेना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी तय होना चाहिए कि यदि निर्माण में खामियां थीं तो उन्हें समय रहते रोकने और सुधारने की जिम्मेदारी किसकी थी।
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चेतावनी पर चेते होते तो जिंदा होता मुश्ताक
- यह हादसा इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि 19 मई को जिलाधिकारी शिवशरणप्पा जीएन ने स्वयं निर्माणाधीन मछली मंडी का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने कार्य की गुणवत्ता और धीमी प्रगति पर नाराजगी जताते हुए संबंधित अधिकारियों और कार्यदाई संस्था को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि मानकों से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसके महज 15 दिन बाद गेट का ढह जाना चेतावनी के बाद भी निगरानी तंत्र की सक्रियता पर सवाल खड़े कर रहा है।
अभी 60 फीसदी काम अधूरा
- करीब 5.56 करोड़ रुपये की लागत से बन रही इस मछली मंडी को जिले की महत्वपूर्ण परियोजनाओं में शामिल किया गया है। परियोजना में 26 दुकानें, कैंटीन, बैंक, सिक्योरिटी कार्यालय, स्टाफ रूम और सात प्लेटफॉर्म प्रस्तावित हैं। इनमें दो प्लेटफॉर्म कवर्ड होंगे तथा मंडी में प्रवेश और निकास के लिए तीन गेट बनाए जा रहे हैं। निर्माण कार्य मार्च में शुरू हुआ था और लगभग 40 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था।
एक घर पर दोहरी मार, मां के बाद बेटे को खोया
मधवापुर हादसे में जान गंवाने वाला मड़नी गांव निवासी मुश्ताक अपने परिवार का सहारा था। परिवार अभी उसकी मां की मौत के सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि बुधवार को हुई दुर्घटना ने दूसरा बड़ा आघात दे दिया। परिजनों के अनुसार, मुश्ताक की मां का निधन करीब 15 दिन पहले हुआ था। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार में पिता किताबुल्लाह और उनके बेटे मजदूरी कर घर चलाते हैं। बुधवार को शटरिंग के काम के लिए अतिरिक्त मजदूरों की जरूरत पड़ी तो मुंशी ने मुश्ताक को वहां लगा दिया। कुछ ही देर बाद गेट भरभराकर गिर पड़ा और मलबे में दबकर उसकी मौत हो गई। रात में जब पोस्टमार्टम के बाद शव गांव पहुंचा तो पूरे माहौल में मातम पसर गया। गांव के कब्रिस्तान में देर रात उसका अंतिम संस्कार किया गया। परिवार में अब बूढ़े पिता, एक बड़ा भाई और दो नाबालिग भाइयों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
पांच बड़े सवाल
- डीएम की चेतावनी के बाद भी निर्माण की निगरानी क्यों नहीं की गई?
- क्या ढलाई से पहले पिलरों को पर्याप्त समय दिया गया था?
- शटरिंग में मानक सामग्री का इस्तेमाल हुआ या नहीं?
- निर्माण स्थल पर तकनीकी पर्यवेक्षण कौन कर रहा था?
- हादसे की जिम्मेदारी सिर्फ मजदूरों तक सीमित रहेगी या जवाबदेही तय होगी?