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Sitapur News: होटल-रेस्टोरेंट के मेन्यू बदले, ठेले-खोमचे बंद
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जनता ढाबा पर कोयले की भट्टी पर भोजन बनाता कारीगर।
- फोटो : जनता ढाबा पर कोयले की भट्टी पर भोजन बनाता कारीगर।
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सीतापुर। एलपीजी की किल्लत ने होटल और ढाबा संचालकों की परेशानी बढ़ा दी है। पिछले कई दिनों से व्यावसायिक सिलिंडर की नियमित आपूर्ति नहीं हो पाने के कारण रेस्टोरेंट व होटलों पर मेन्यू में बदलाव किया गया है। हालात ये हैं कि कई संचालक अब गैस के विकल्प तलाशने को मजबूर हो गए हैं। कई जगहों पर कोयले की भट्ठी इस्तेमाल किए जाने से खर्च बढ़ गया है। वहीं, खानपान के तमाम ठेले व स्टॉल बंद हो गए हैं।
शहर में संचालित होटल, रेस्टोरेंट और फास्ट फूड के स्टॉलों पर खाना बनाने के लिए सबसे ज्यादा गैस सिलिंडर का उपयोग होता है, लेकिन इन दिनों सिलिंडर समय पर नहीं मिल पा रहे हैं। इससे कई होटल व रेस्टोरेंटों के मेन्यू में बदलाव किया गया है। शहर में राजस्थानी रेस्टारेंट के संचालक नवीन अग्रवाल बताते हैं कि कॉमर्शियल सिलिंडर न मिलने से मेन्यू में बदलाव करना पड़ा है। ढोकला, साउथ इंडियन के कई पकवान और तवा प्लेट समेत कई आइटम बनाने बंद करने पड़े जिनमें ईंधन की ज्यादा खपत होती है।
व्यवसाय चलाते रहने के लिए इंडक्शन व डीजल वाले चूल्हे मंगाए गए हैं। इसके बाद भी दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं। नवीन के मुताबिक जो आइटम सिलिंडर से कम समय में बन जाता था अब उसके लिए डेढ़ गुना ज्यादा समय लगता है। इसी तरह कई अन्य रेस्टोरेंट व होटलों के मेन्यू भी बदल गए हैं। इसके अलावा गैस संकट के चलते कई छोटे होटल और ढाबा संचालकों ने अस्थायी तौर पर लकड़ी और कोयले का सहारा लेना शुरू कर दिया है। कारोबारियों का कहना है कि लकड़ी और कोयले से खाना बनाना न केवल मुश्किल है, बल्कि इससे समय व खर्च भी ज्यादा लगता है। होटल संचालकों का कहना है कि यदि जल्द ही गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो उनका कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। कई फास्ट फूड स्टॉल और ठेले बंद तक हो गए हैं।
सिर्फ शाम को चला रहे पंजाबी रसोई
शहर के मोहल्ला सिविल लाइन में चर्च के पास अकाल पंजाबी रसोई के संचालन का समय कम कर दिया गया है। इसके संचालक संदीप ने बताया कि सिलिंडर न मिलने से अब दिन भर संचालन के बजाय सिर्फ शाम को स्टॉल चला रहे हैं। यदि स्थिति सामान्य न हुई तो कारोबार बंद करना पड़ सकता है। बड़े डाकघर के पास फास्ट फूड का ठेला लगाने वाले अनुज ने बताया कि सिलिंडर न मिलने से काम बंद हो गया है। इसी तरह रोडवेज बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, आंख अस्पताल मार्ग, चुंगी चौराहा समेत विभिन्न स्थानों पर लगने वाले कई चाट, चाय व फास्ट फूड आदि के ठेले व स्टॉल अब नजर नहीं आते हैं।
मिठाई विक्रेताओं के मेन्यू भी बदले
लहरपुर में सिलिंडर न मिलने से जायका रेस्टोरेंट दो दिन से बंद है। केसरीगंज-लखीमपुर मार्ग स्थित पंजाबी ढाबा भी बंद हो गया है। रामचंद्र व काशीराम ने बताया कि शनिवार को नई कोई मिठाई नहीं बना पाए। यहां तक जलेबी तक नहीं बनाई। बागवानी टोला के हरिशंकर ने बताया कि गैस न मिलने से चाट का स्टॉल बंद होने की कगार पर पहुंच गया था, अब पिता की बुरादे की अंगीठी से काम चला रहे हैं। नगर के विभिन्न चौराहों पर लगने वाले स्टॉल व ठेले भी गायब हैं। अशोक ने बताया के मोमोज का स्टॉल लगाते थे, सिलिंडर न मिलने से काम बंद है। दिलीप को चाट का ठेला, रवि मेहरोत्रा को चाउमीन का स्टॉल बंद करना पड़ा।
कोयले की भट्ठी के सहारे ढाबे
खैराबाद इलाके में नेशनल हाईवे के किनारे न्यू मिडवे ढाबा के संचालक मनजीत ने बताया कि व्यावसायिक सिलिंडर न मिलने से कोयले की भट्ठी से काम चला रहे हैं। इसमें गैस की तुलना में 25 से 40 फीसदी तक का खर्च बढ़ गया है। कारोबार में नुकसान उठाना पड़ रहा है। टोल प्लाजा के करीब स्थित जनता ढाबा के संचालक अंजुम ने बताया कि कोयला भट्ठी बनवाई है। कोयला 35 रुपये किलो खरीदना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि सिलिंडर जब जरूरत पड़ती थी तभी जलाया जाता था। कोयला सुबह जला दिया फिर लगातार आग बनाए रखने के लिए थोड़ी-थोड़ी देर बाद भट्ठी में कोयला डालना पड़ता है। खर्च भी बढ़ गया, मेहनत ज्यादा और धुएं से भी परेशानी उठानी पड़ रही है।
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शहर में संचालित होटल, रेस्टोरेंट और फास्ट फूड के स्टॉलों पर खाना बनाने के लिए सबसे ज्यादा गैस सिलिंडर का उपयोग होता है, लेकिन इन दिनों सिलिंडर समय पर नहीं मिल पा रहे हैं। इससे कई होटल व रेस्टोरेंटों के मेन्यू में बदलाव किया गया है। शहर में राजस्थानी रेस्टारेंट के संचालक नवीन अग्रवाल बताते हैं कि कॉमर्शियल सिलिंडर न मिलने से मेन्यू में बदलाव करना पड़ा है। ढोकला, साउथ इंडियन के कई पकवान और तवा प्लेट समेत कई आइटम बनाने बंद करने पड़े जिनमें ईंधन की ज्यादा खपत होती है।
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व्यवसाय चलाते रहने के लिए इंडक्शन व डीजल वाले चूल्हे मंगाए गए हैं। इसके बाद भी दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं। नवीन के मुताबिक जो आइटम सिलिंडर से कम समय में बन जाता था अब उसके लिए डेढ़ गुना ज्यादा समय लगता है। इसी तरह कई अन्य रेस्टोरेंट व होटलों के मेन्यू भी बदल गए हैं। इसके अलावा गैस संकट के चलते कई छोटे होटल और ढाबा संचालकों ने अस्थायी तौर पर लकड़ी और कोयले का सहारा लेना शुरू कर दिया है। कारोबारियों का कहना है कि लकड़ी और कोयले से खाना बनाना न केवल मुश्किल है, बल्कि इससे समय व खर्च भी ज्यादा लगता है। होटल संचालकों का कहना है कि यदि जल्द ही गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो उनका कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। कई फास्ट फूड स्टॉल और ठेले बंद तक हो गए हैं।
सिर्फ शाम को चला रहे पंजाबी रसोई
शहर के मोहल्ला सिविल लाइन में चर्च के पास अकाल पंजाबी रसोई के संचालन का समय कम कर दिया गया है। इसके संचालक संदीप ने बताया कि सिलिंडर न मिलने से अब दिन भर संचालन के बजाय सिर्फ शाम को स्टॉल चला रहे हैं। यदि स्थिति सामान्य न हुई तो कारोबार बंद करना पड़ सकता है। बड़े डाकघर के पास फास्ट फूड का ठेला लगाने वाले अनुज ने बताया कि सिलिंडर न मिलने से काम बंद हो गया है। इसी तरह रोडवेज बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, आंख अस्पताल मार्ग, चुंगी चौराहा समेत विभिन्न स्थानों पर लगने वाले कई चाट, चाय व फास्ट फूड आदि के ठेले व स्टॉल अब नजर नहीं आते हैं।
मिठाई विक्रेताओं के मेन्यू भी बदले
लहरपुर में सिलिंडर न मिलने से जायका रेस्टोरेंट दो दिन से बंद है। केसरीगंज-लखीमपुर मार्ग स्थित पंजाबी ढाबा भी बंद हो गया है। रामचंद्र व काशीराम ने बताया कि शनिवार को नई कोई मिठाई नहीं बना पाए। यहां तक जलेबी तक नहीं बनाई। बागवानी टोला के हरिशंकर ने बताया कि गैस न मिलने से चाट का स्टॉल बंद होने की कगार पर पहुंच गया था, अब पिता की बुरादे की अंगीठी से काम चला रहे हैं। नगर के विभिन्न चौराहों पर लगने वाले स्टॉल व ठेले भी गायब हैं। अशोक ने बताया के मोमोज का स्टॉल लगाते थे, सिलिंडर न मिलने से काम बंद है। दिलीप को चाट का ठेला, रवि मेहरोत्रा को चाउमीन का स्टॉल बंद करना पड़ा।
कोयले की भट्ठी के सहारे ढाबे
खैराबाद इलाके में नेशनल हाईवे के किनारे न्यू मिडवे ढाबा के संचालक मनजीत ने बताया कि व्यावसायिक सिलिंडर न मिलने से कोयले की भट्ठी से काम चला रहे हैं। इसमें गैस की तुलना में 25 से 40 फीसदी तक का खर्च बढ़ गया है। कारोबार में नुकसान उठाना पड़ रहा है। टोल प्लाजा के करीब स्थित जनता ढाबा के संचालक अंजुम ने बताया कि कोयला भट्ठी बनवाई है। कोयला 35 रुपये किलो खरीदना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि सिलिंडर जब जरूरत पड़ती थी तभी जलाया जाता था। कोयला सुबह जला दिया फिर लगातार आग बनाए रखने के लिए थोड़ी-थोड़ी देर बाद भट्ठी में कोयला डालना पड़ता है। खर्च भी बढ़ गया, मेहनत ज्यादा और धुएं से भी परेशानी उठानी पड़ रही है।