बनारस लिट फेस्ट: टिस्का चोपड़ा बोलीं- हिंदी सिनेमा की हीरोइनें बेब, भाभी और बीजी के खांचों में ही बंधी हैं
Banaras Lit Fest: फेस्ट के सीजन 4 में कलाकारों ने खुलकर सवालों के जवाब दिए। उन्होंने समाज में युवाओं की भूमिका बताई। यह भी बताया कि ऐसे आयोजनों से समाज को कैसे नई दिशा दी जा सकती है।
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बनारस लिट फेस्ट–4 में ज्ञान गंगा के मंच पर बॉलीवुड अभिनेत्री टिस्का चोपड़ा ने पंकज भार्गव के साथ हिंदी सिनेमा में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा की। कहा कि उनकी चर्चित फिल्म चटनी की कहानी गुस्से की उपज थी, क्योंकि हिंदी फिल्मों में महिलाओं के लिए अक्सर बेहद सीमित और रूढ़ छवियों वाले किरदार ही लिखे जाते हैं।
हिंदी सिनेमा में स्त्री पात्रों को तीन खांचों बेब, भाभी और बीजी में बांध दिया जाता है। जबकि चटनी की नायिका वनिता इन तयशुदा सीमाओं को तोड़ती है। टिस्का चोपड़ा ने कहा कि बॉलीवुड में स्टीरियोटाइप का चलन गहराई तक पैठ बना चुका है। कोई किरदार यदि लोकप्रिय हो जाए, तो उसी का ठप्पा कलाकार पर चिपका दिया जाता है।
चिंता जताई कि फिल्में आज भी पुरुष प्रधान हैं और महिला पात्रों को सीमित लेखन तक सिमटा दिया जाता है। फिल्म धुरंधर की खुलकर सराहना करते हुए कहा कि अच्छी स्क्रिप्ट और सार्थक काम हो तो बेहतर। अपनी किताब ‘एक्टिंग स्मार्ट’ पर कहा कि यह फिल्मी सेट की पूरी दुनिया को समझने की किताब है। उन्होंने एआर रहमान को एक मौलिक कलाकार बताते हुए कहा कि उनका संगीत किसी फिल्मी गीत से आगे बढ़कर एक कला बन जाता है।
युवाओं को देख वृद्धों को होती है जलन
बनारस लिट फेस्ट में शनिवार को दरबार हॉल में पूर्व आईएएस अशोक बाजपेयी ने रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल से संवाद कर कहा कि कविता संसार के लिए लिखा गया प्रेम पत्र है जिसे संसार नहीं पढ़ता। हमारे जमाने में प्रेम पत्र लिख तो लेते थे लेकिन उसे पहुंचाएंगे कैसे। आजकल देखकर वृद्धों को जलन होती है कि हमारे समय में ऐसा क्यों नहीं हुआ। किताब के कवर में चिट्ठियों का आदान-प्रदान होता था।
मिथक ही स्मृतियों को स्थायी बनाता है : प्रवीण कुमार
बनारस लिट फेस्ट में काशी कीर्ति मंच पर ‘साहित्य में स्मृति, मिथक और यथार्थ’ पर विमर्श हुआ। लेखक प्रवीण कुमार ने कहा कि स्मृति को स्थायी बनाने का कार्य मिथक करता है। उन्होंने कहा कि भारत विविधताओं का देश है और लोकनायक का दायित्व इसे संवारने का होना चाहिए, न कि इसे समाप्त करने का। लेखक प्रभात रंजन ने परिवार केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों तक फैला हुआ है। लेखक रंजनी गुप्ता ने कहा कि किसी भी रचनाकार के मूल ग्रंथ की परिकल्पना बिना मिथक संभव नहीं है।
अमेरिका, यूरोप संग दुनिया के 80% हिस्से तक पहुंचाई काशी की गायकी : पं. साजन मिश्र
दुनिया के 80 फीसदी देशों में प्रस्तुतियां देकर बनारस घरानों के ख्याल और तरानों को पहुंचाया गया है। इसमें दिवंगत हो चुके बड़े भाई पंडित राजन मिश्र भी रहे। 2019 में हम लोगों ने वर्ल्ड टूर किया था। पहली बार किसी ख्याल गायक ने ऐसा किया था। 13 देशों में दौरा कर एक साथ 56 प्रस्तु़तियां दे दी गईं। ये बातें बनारस लिट फेस्ट में आए प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और पद्मभूषण से सम्मानित पंडित साजन मिश्रा ने अमर उजाला से कही।
पंडित साजन मिश्रा ने कहा कि 1978 में श्रीलंका से संगीत की प्रस्तुति की शृंखला शुरू हुई और 150 से ज्यादा देशों में प्रस्तुतियां दे दी गईं। अमेरिका के सभी 50 राज्यों में बनारस घराना का तराना गूंजा है। जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस लेकर सभी यूरोपीय देशों बनारस घराने के संगीत विधा को पहुंचाया है। बनारस को प्रस्तुत करना बहुत अच्छा लगता है। यहां के संगीत पुरोधाओं को पूरी दुनिया में ख्याति मिली हुई है।
लेखन कला को कोई एआई या तकनीक नहीं हटा सकती
बनारस लिट फेस्ट के काशी साहित्य कला उत्सव के चौथे संस्करण में शनिवार को पत्रकारिता में एआई पर संवाद हुआ। लेखक कश्यप कोंपले ने कहा कि लेखन के शुरुआती दौर में छात्रों को एआई पर निर्भर नहीं होना चाहिए। ऐसा करने से उनकी सोचने, समझने और विश्लेषण करने की क्षमता सीमित हो सकती है। लेखन की बुनियाद अनुभव, निरीक्षण और संवेदना से बनती है, जिसे कोई भी तकनीक पूरी तरह नहीं हटा सकती।
एआई और एल्गोरिदम से कंट्रोल हो रहीं सूचनाएं
ताज होटल के दरबार हॉल में लेखिका नमिता देविदयाल ने कहा कि आज सूचना का बड़ा हिस्सा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एल्गोरिदम द्वारा कंट्रोल हो रहा है। हम जो देख रहे हैं, पढ़ रहे हैं, वह बहुत हद तक तकनीकी से तय किया जा रहा है। पत्रकार प्रभाकर मिश्रा ने कहा कि हर सूचना खबर नहीं होती। कुछ खबरें सवाल होती हैं।
4000 साल में कई बार बदलीं हैं भाषाएं : पेगी मोहन
बनारस लिट फेस्ट में प्रख्यात लेखिका पेगी मोहन ने युवानिका चोपड़ा के साथ संवाद किया। भारत और दक्षिण एशिया की भाषाई परंपराओं की बात की। पेगी मोहन ने कहा कि पंजाबी, भोजपुरी सहित कई भारतीय भाषाओं की जड़ें वैदिक और संस्कृत परंपरा में निहित हैं। 4000 वर्षों में ऐतिहासिक घटनाओं और सांस्कृतिक मेल-जोल के कारण भाषाओं में बदलाव होता रहा है।
अनूप जलोटा के प्रभु जी तुम चंदन हम पानी...से रैदासी हुए मगन
संत रविदास जयंती के उपलक्ष्य में संगीत महोत्सव मन चंगा कठौती में गंगा के अंतिम दिन शनिवार को भजन सम्राट अनूप जलोटा और सोमा घोष ने सुरों से गुरु के चरण पखारे। अनूप ने प्रभु जी तुम चंदन हम पानी... से सभी गुरु भक्ति में मगन कर दिया। रैदास के समरसता के संदेश दिए।
लोक संगीत और काव्य रचनाओं की भी धूम रही। मधु मूर्च्छना संस्था की ओर से नगवां स्थित संत रविदास पार्क में गीत-संगीत के जरिए रैदास के समरसता की सोच प्रदर्शित किया। शास्त्रीय संगीत, लोककला, रंगमंच और साहित्य के विविध रंगों से सजी इस शृंखला से दर्शकों को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभूति से भर दिया। अनूप जलोटा ने गुरु भक्ति में सभी को भावविभोर कर दिया।
