भूजल का दम घोंट रही लापरवाही: प्यास बुझाने वाले 15 से ज्यादा कुएं बने कूड़ाघर, संरक्षण से वंचित; लापरवाही भी
एक ओर जल संरक्षण को लेकर दावे किए जा रहे हैं, वहीं प्रशासनिक अनदेखी से 15 से अधिक ऐतिहासिक कुएं बदहाल हैं। कभी लोगों की प्यास बुझाने वाले ये कुएं अब कूड़ाघर बन चुके हैं। कहीं सड़े-गले माला-फूल भरे हैं तो कहीं झाड़-झंखाड़ का जमावड़ा है। संरक्षण और सफाई की पहल नहीं होने से भूजल संरक्षण का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है।
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पीडीडीयू नगर जिले में एक ओर जहां प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण के लिए कागजी दावे और अभियान चलाए जा रहे हैं, अमृत सरोवर में करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, वहीं दूसरी ओर 15 से अधिक पुराने और ऐतिहासिक कुएं देखरेख के अभाव में कूड़ा-करकट, मिट्टी और पूजा सामग्री से पाट दिए गए हैं। कहीं झाड़-झंखाड़ और पेड़ उग आए हैं, तो कहीं ये कुएं हादसों को दावत दे रहे हैं।
जिन कुओं से कभी पूरे-पूरे गांव और राहगीरों की प्यास बुझती थी और भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद मिलती थी, वे अब धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। कई स्थानों पर तो कुओं को पूरी तरह से दबा दिया गया है, जहां अब सिर्फ उनके चबूतरे ही कुएं होने की गवाही दे रहे हैं। कुएं केवल पेयजल का जरिया नहीं, बल्कि भूजल रिचार्ज के सबसे बड़े माध्यम हैं। प्रशासनिक अनदेखी के कारण इन बहुमूल्य स्रोतों का इस तरह खत्म होना सरकार के जल संरक्षण अभियानों की पोल खोल रहा है।
केस-1: पीडीडीयू जंक्शन के सामने कूड़े में दफन विशाल कुआं
पीडीडीयू जंक्शन के ठीक सामने 200 स्क्वायर फीट से अधिक चबूतरे और नक्काशीदार पत्थरों वाला एक विशाल और मजबूत कुआं स्थित है। उचित संरक्षण के अभाव में आसपास के दुकानदारों और फूल-माला बेचने वालों ने इसमें लगातार कचरा फेंककर इसे पूरी तरह पाट दिया है। यदि इसका रख-रखाव होता, तो यह यात्रियों के लिए पानी का बेहतरीन जरिया और सुंदरता का केंद्र बन सकता था।
केस-2: पट्टी गांव में जर्जर कुएं से बड़े हादसे की आशंका
चहनियां विकास खंड के पट्टी गांव में बुजुर्गों के जमाने का ऐतिहासिक कुआं अब देखभाल न होने से अत्यंत जर्जर होकर दुर्घटनाओं का कारण बन रहा है। कुएं के आसपास बने गहरे गड्ढों में पूर्व में ट्रैक्टर का पहिया फंस चुका है और एक गाय भी गिर चुकी है, जिसे ग्रामीणों ने बामुश्किल निकाला। ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम प्रधान और सेक्रेटरी से बार-बार शिकायत के बावजूद कुएं को सुरक्षित करने या ढकने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
केस-3: धार्मिक-सामाजिक कार्यों में उपयोगी कुएं झाड़-झंखाड़ से पटे
ताराजीवनपुर के कोरी गांव, महडौरा और जीवनपुर क्षेत्र के वर्षों पुराने कुएं, जो कभी पेयजल, सिंचाई और दाह संस्कार के बाद स्नान आदि के काम आते थे, अब उपेक्षा के शिकार हैं। लगभग 125 वर्ष पुराने इन ऐतिहासिक कुओं में अब ग्रामीणों द्वारा गंदगी, फूल-मालाएं और कचरा फेंका जा रहा है। देखरेख के अभाव में ये कुएं पूरी तरह झाड़-झंखाड़ से पट चुके हैं और उनका अस्तित्व समाप्ति के कगार पर है।
केस-4: सड़क चौड़ीकरण की भेंट चढ़ेंगे नियामताबाद के 7 ऐतिहासिक कुएं
नियामताबाद क्षेत्र के नियामताबाद गांव (गोधना से लेवा रोड) में सड़क चौड़ीकरण योजना के तहत 7 बहुमूल्य पुराने कुओं का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। इनमें बच्चों की प्यास बुझाने वाला प्राथमिक विद्यालय का कुआं, आस्था से जुड़ा मां काली का कुआं और राहगीरों के लिए बने फकड़ बाबा व अन्य कुएं शामिल हैं। पुराने समय में विभिन्न स्वास्थ्य लाभों और राहगीरों के उपयोग में आने वाले इन कुओं के विलुप्त होने से ग्रामीण बेहद दुखी हैं।
हमारे गांव का यह कुआं बुजुर्गों के जमाने का है, जिससे कभी पूरा गांव पानी पीता था। अब उचित रखरखाव न होने से यह जर्जर हो चुका है। प्रशासन और ग्राम प्रधान को कई बार अवगत कराया गया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। - राकेश त्रिपाठी, पट्टी
कुएं केवल पानी पीने का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये हमारे इलाके के भूजल स्तर को रीचार्ज करने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। जिस तरह से 15 से ज्यादा कुओं को कूड़ा-कचरा डालकर पाटा जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है। चौड़ीकरण में भी कुएं ध्वस्त कर दिए गए। - संजय तिवारी, नियामताबाद
एक तरफ जल संरक्षण के बड़े-बड़े दावे हो रहे हैं और दूसरी तरफ ऐतिहासिक जलस्रोतों को खत्म किया जा रहा है। पीडीडीयू जंक्शन के सामने के कुएं को खुलेआम सड़े फूल मालाओं और कूड़े से पाट दिया गया और अधिकारी जानकर अनजान बने हैं। - रवींद्र यादव, हनुमानपुर
स्टेशन के ठीक सामने का यह विशाल कुआं ऐतिहासिक है और इसमें बेहद खूबसूरत नक्काशीदार पत्थर लगे हैं। लेकिन देखरेख न होने के कारण लोग और आसपास के विक्रेता इसमें फूल-माला और कचरा फेंककर इसे पाट रहे हैं। अगर प्रशासन इसका सुंदरीकरण कराकर इसे संरक्षित करे, तो यह स्थल बेहद सुंदर दिखेगा और राहगीरों को पानी भी मिलेगा। - सागर गुप्ता, रविनगर
28 वर्षों में एक बार भी नहीं हुई कुओं के संरक्षण की पहल
जिले को बने 28 साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन इस दौरान प्राचीन और प्राकृतिक जलस्रोतों के रूप में पहचाने जाने वाले कुओं को सहेजने के लिए एक बार भी कोई ठोस अभियान नहीं चलाया गया। भूजल स्तर को दुरुस्त करने के नाम पर जिले में 70 से अधिक नए 'अमृत सरोवर' (तालाब) तो बनवा दिए गए, लेकिन गांव-गांव में पानी का मुख्य आधार रहे पुराने कुएं प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार बनकर रह गए। यदि समय रहते अमृत सरोवरों की तर्ज पर कुओं के पुनर्जीवन और संरक्षण के लिए विशेष अभियान नहीं चलाया गया, तो आने वाले समय में जिले की यह ऐतिहासिक धरोहर और भूजल रिचार्ज का पारंपरिक जरिया पूरी तरह से विलुप्त हो जाएगा।
कुएं के मुख्य फायदे
प्राकृतिक खनिज- कुएं का पानी जमीन की मिट्टी और चट्टानों से छनकर आता है, जिससे उसमें कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे प्राकृतिक खनिज सुरक्षित रहते हैं।
रासायनिक उपचार से मुक्ति- सरकारी या नगर पालिका के पानी की तरह इसमें क्लोरीन या फ्लोराइड जैसे हानिकारक रसायन नहीं मिलाए जाते हैं।
पर्यावरण के अनुकूल- पानी को साफ करने के लिए किसी बड़े ऊर्जा-खपत वाले प्लांट की जरूरत नहीं होती, क्योंकि धरती इसे प्राकृतिक रूप से छानती है।
कुएं हमारे प्रमुख प्राकृतिक जलस्रोत हैं। इनके संरक्षण के लिए और जहां भी इन्हें अवैध रूप से पाटा जा रहा है या नुकसान पहुंचाया जा रहा है, उस पर रोक लगाने के लिए जिलाधिकारी से बात कर जल्द उचित समाधान निकाला जाएगा। - राजेश वर्मा, एसडीएम, पीडीडीयू नगर