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काशी की रामलीला: राम की माला पहनते ही बेटे की बीमारी दूर हुई तब महाराजा उदित ने शुरू कराई रामलीला

Fri, 25 Sep 2026 03:49 PM IST
Pragati Chand हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी।
हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Fri, 25 Sep 2026 03:49 PM IST
सार

रामनगर की रामलीला विश्व भर में प्रसिद्ध है। 1796 में महाराजा उदित नारायण ने इसकी शुरुआत कराई। तब से वर्तमान नरेश अनंत नारायण तक रामनगर की रामलीला आधुनिक नहीं हुई और यही इसकी खूबी है।

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Ramnagar Ramlila Maharaja Udit initiated after his son illness cured upon wearing  garland of Ram in Varanasi
रामनगर की रामलीला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी में 230 साल पुरानी रामनगर की रामलीला छह महाराजाओं का शाही शासन देख चुकी है। इसकी शुरुआत राम की माला पहनते ही बेटे की बीमारी दूर होने से हुई थी। ये बेटा था ईश्वरी नारायण और उनके पिता उदित नारायण। जब बेटे की बीमारी बनारस की एक रामलीला में मिली माला पहनने से ठीक हो गई तो महाराज उदित नारायण ने रामनगर में भी रामलीला की शुरुआत करवाई। 

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बीएचयू के पर्यटन आचार्य डॉ. राणा प्रवीन के मुताबिक बलवंत गार्गी की 1969 में प्रकाशित किताब ‘रामलीला इन रामनगर’ के अनुसार, महाराजा हर साल बनारस में होने वाली दूसरी रामलीला देखने जाते थे। एक बार उनके युवराज ईश्वरी नारायण सिंह बहुत बीमार पड़ गए। उनकी हालत इतनी खराब थी कि उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची थी। 
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महाराजा चिंतित अवस्था में उसी शाम रामलीला देखने पहुंच गए। वहां रामलीला के आध्यात्मिक प्रमुख ने उन्हें पात्र राम की पहनी माला दे दी और कहा कि इसे बीमार युवराज को पहना दें। उन्होंने ऐसा ही किया और युवराज का स्वास्थ्य बेहतर होने लगा। इसके बाद महाराजा रामलीला के भक्त बन गए। 
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1796 में महाराजा उदित नारायण से लेकर वर्तमान नरेश अनंत नारायण तक रामनगर की रामलीला आधुनिक नहीं हुई और यही इसकी खूबी है। इतिहासकार और रंगकर्मी बलवंत गार्गी ने अपनी किताब में इन महाराजाओं की कहानी का जिक्र किया है।

महाराजा उदित नारायण ने रामलीला शुरु करवाई और उनके बेटे महाराज ईश्वरी नारायण सिंह इसके पहले व्यास बनें। पात्रों को प्रशिक्षित कर कई शिष्य बनाए। ''चुप रहो, सावधान!'' वाला मशहूर घोष भी उन्होंने ही लिखवाया। आईआईटी बीएचयू में रामलीला पर रिसर्च कर चुके अरविंद मिश्रा के मुताबिक उस समय संवादों पर रिसर्च हुआ। जिस पर उनके गुुरु काष्ठ जिह्वा, भारतेंदु हरिश्चंद्र, रीवा नरेश रघुराज सिंह आदि ने काम किया। लीला स्थल और मंच को वैज्ञानिक ढंग से चुना गया। इसके डायलॉग भारतेंदु हरिश्चंद्र और अपने गुरु काष्ठजिह्वा से मानस के दोहों को समझने लायक संवाद में तब्दील कराया। संगीत शैली आई और गायन भी होने लगा।

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फिर महाराजा प्रभु नारायण सिंह ने रामलीला की प्रस्तुतियों का वक्त तय किया और नियम कानून कायदे तैयार करवाए। एक बार सुलोचना सती और नारांतक वध लीला हो रही थी। सुलोचना का पात्र जब मेघनाद के सिर को लेकर अग्नि में प्रवेश कर सुरंग पार कर रहा था तो सांप आ गया। ऐसे में पात्र की सुरक्षा को देखते हुए महाराज ने रामलीला के उस हिस्से को ही बंद करवा दिया।

फिर आजादी से लेकर 21वीं सदी की शुरुआत तक महाराजा विभूति नारायण सिंह ने इसके परंपरागत रूप को बरकरार रखा। कई तकनीक देश में आई लेकिन रामलीला तक न पहुंच पाए ये उन्होंने ही सुनिश्चित किया। यही वजह है कि अभी तक लीला लालटेन और मशाल की रोशनी में होती है। उनके बाद उनके बेटे कुंवर अनंत नारायण सिंह उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।

उदित नारायण ने ही रामचरितमानस का पांच खंड करवा कर उसका सचित्र संस्करण तैयार कराया। ये चित्र राजपूत शैली में राजस्थान के चित्रकारों ने बनाए थे। नीलम, पुखराज, पन्ना, माणिक और हीरे जैसे असली रत्नों को पीसकर चित्रों में रंग भरा गया। ये पांचों खंड अब राजघराने के अभिलेखागार में सुरक्षित हैं।

विभूति नारायण सिंह का मानना था कि यह आयोजन अलग-अलग जातियों और धर्मों के लोगों को एक साथ जोड़ता है। एक बार महाराजा विभूति नारायण सिंह से पूछा गया कि राम की भूमिका हमेशा किसी छोटे बालक से ही क्यों कराई जाती है, तो उन्होंने जवाब दिया कि रामलीला केवल नाटक नहीं, बल्कि यज्ञ है। यज्ञ में देवताओं को प्रसन्न करना है, ताकि रामनगर के लोगों के जीवन शांति और समृद्धि रहे। 12 साल का बच्चा शुद्ध माना जाता है और मान्यता है कि भगवान केवल शुद्ध शरीर में ही प्रवेश कर सकते हैं। बच्चा सांसारिक भावनाओं से अलग और निष्कलंक होता है, ठीक उसी तरह जैसे राम।

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