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Champawat News: काली कुमाऊं की खड़ी होली में है ब्रज की परंपरा का संगम
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Sat, 28 Feb 2026 11:22 PM IST
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चंपावत। कहने के लिए होली का त्योहार रंगों का होता है लेकिन काली कुमाऊं की खड़ी होली अपने आप में विशेष पहचान रखती है। यह होली विश्वविख्यात है जो इसका हिस्सा बनता है वह इसके रंग में रंग जाता है। संगीत के सुरों के बीच बैठकी होली के भक्ति, शृंगार, संयोग, वियोग से भरे गीत गाने की परंपरा काली कुमाऊं अंचल के गांव-गांव में चली आ रही है।
होली का यह शास्त्रीय रूप 15वीं शताब्दी में चंद राजाओं के काल में चंपावत में विकसित हुआ। यह कुमाऊंनी संगीत और ब्रज की परंपराओं का मिश्रण है। यह होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि वैष्णव भक्ति, लोक आस्था और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।
एकादशी को रंगों की शुरुआत के बाद गांव-गांव में ढोल-झांझर और पैरों की विशेष कदम ताल के साथ खड़ी होली गायन चलता है।इसी दिन चीर बंधन के साथ शिव स्तुति से होली गायन शुरू किया जाता है। इसमें शिव के मन माहि बसे काशी, हरि धरै मुकुट खेले होरी... आदि गीत शामिल है।
इतिहासकार देवेंद्र ओली पहली और दूसरी होली को भगवान के बाल रूपों का वर्णन किया जाता है। आध्यात्मिक रसों, भक्ति, शृंगार आदि से जुड़ीं होली का गायन छरड़ी तक किया जाता है। इसके अलावा परिवार, समाज में होने वाली विभिन्न घटनाओं, स्त्री पुरुष प्रसंग, हास्य ठिठोली से भरी होलियां भी गाई जाती हैं।
होली पर्व कुंठाओं को दूर करने का भी पर्व है लेकिन समय के साथ नशे के बढ़ते प्रचलन के चलते एके दूसरे के प्रति लोग अपने विचार व्यक्त नहीं कर पाते हैं। ऐसे में पूर्व का सामाजिक सौहार्द बनाए रखना आसान नहीं हो रहा है।
नारी के शृंगार और सौंदर्य का बखान करते हैं होली के गीत
इतिहासकार देवेंद्र बताते हैं कि हर होली गीत से अलग रंग छलकता है। हम घर पिया परदेश बदरिया जन बरसों, पश्विम दिशा घनघोर बदरिया जन बरसों होली गीत में जहां जोबन की ज्वाला में दहक रही यौवना प्रकृति से विनय करते दिखती है वहीं पतली कमर, लंबे केस, सुघड़ जल भरन चली पनघट पर गीत से नारी के शृंगार और सौंदर्य का बखान करते हैं।
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होली का यह शास्त्रीय रूप 15वीं शताब्दी में चंद राजाओं के काल में चंपावत में विकसित हुआ। यह कुमाऊंनी संगीत और ब्रज की परंपराओं का मिश्रण है। यह होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि वैष्णव भक्ति, लोक आस्था और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।
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एकादशी को रंगों की शुरुआत के बाद गांव-गांव में ढोल-झांझर और पैरों की विशेष कदम ताल के साथ खड़ी होली गायन चलता है।इसी दिन चीर बंधन के साथ शिव स्तुति से होली गायन शुरू किया जाता है। इसमें शिव के मन माहि बसे काशी, हरि धरै मुकुट खेले होरी... आदि गीत शामिल है।
इतिहासकार देवेंद्र ओली पहली और दूसरी होली को भगवान के बाल रूपों का वर्णन किया जाता है। आध्यात्मिक रसों, भक्ति, शृंगार आदि से जुड़ीं होली का गायन छरड़ी तक किया जाता है। इसके अलावा परिवार, समाज में होने वाली विभिन्न घटनाओं, स्त्री पुरुष प्रसंग, हास्य ठिठोली से भरी होलियां भी गाई जाती हैं।
होली पर्व कुंठाओं को दूर करने का भी पर्व है लेकिन समय के साथ नशे के बढ़ते प्रचलन के चलते एके दूसरे के प्रति लोग अपने विचार व्यक्त नहीं कर पाते हैं। ऐसे में पूर्व का सामाजिक सौहार्द बनाए रखना आसान नहीं हो रहा है।
नारी के शृंगार और सौंदर्य का बखान करते हैं होली के गीत
इतिहासकार देवेंद्र बताते हैं कि हर होली गीत से अलग रंग छलकता है। हम घर पिया परदेश बदरिया जन बरसों, पश्विम दिशा घनघोर बदरिया जन बरसों होली गीत में जहां जोबन की ज्वाला में दहक रही यौवना प्रकृति से विनय करते दिखती है वहीं पतली कमर, लंबे केस, सुघड़ जल भरन चली पनघट पर गीत से नारी के शृंगार और सौंदर्य का बखान करते हैं।