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Tehri News: अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहा है संस्कृत महाविद्यालय
संवाद न्यूज एजेंसी, टिहरी
Updated Thu, 04 Jun 2026 07:01 PM IST
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महाविद्यालय की संपत्ति से ऊर्जा निगम का कब्जा छुड़ाना हुआ मुश्किल
कॉलेज को गुरुकुल की तर्ज पर विकसित करे सरकार
नई टिहरी। ऐतिहासिक श्री बदरीनाथ राजकीय संस्कृत महाविद्यालय अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। शासन-प्रशासन की उपेक्षा के कारण अस्थायी शिक्षकाें के भरोसे चल रहे महाविद्यालय में छात्र घटकर 24 रह गई है। महाविद्यालय में 48 छात्र संख्या का छात्रावास की सुविधा के बावजूद छात्र संख्या नहीं बढ़ पा रही है। महाविद्यालय की आधी संपत्ति से ऊर्जा निगम का कब्जा हटाना भी महाविद्यालय के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
वर्ष 1907 में तत्कालीन महाराज कीर्तिशाह ने पुरानी टिहरी में श्री बदरीनाथ संस्कृत पाठशाला (मध्यमा) की स्थापना की थी। उसके बाद वर्ष 1949 में स्टेट विलीनिकरण के साथ संस्कृत पाठशाला का राजकीयकरण कर शास्त्री और आचार्य की मान्यता मिली। इस ऐतिहासिक महत्व का राजकीय संस्कृत महाविद्यालय आज अपनी पहचान बचाए रखने के लिए जूझ रहा है। शासन-प्रशासन की उपेक्षा के कारण यह महाविद्यालय कई समस्याओं से जूझ रहा है।
महाविद्यालय में शिक्षकों के 14 पदों के सापेक्ष प्राचार्य के अलावा अन्य 13 पद वर्ष 2020 से व्यवस्था शिक्षकों के भरोसे है जिससे षष्ठम कक्षा से मध्यमा तक छात्र संख्या कुल 14, शास्त्री में आठ और आचार्य में कुल दो छात्र हैं। महाविद्यालय में 48 छात्र संख्या का छात्रावास भी उपलब्ध है, बावजूद महाविद्यालय को छात्रों की कमी से जूझना पड़ रहा है।
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पूर्व प्राचार्य दिनेश प्रसाद बडोनी का कहना है कि सरकार ने संस्कृत भाषा को राज्य की दूसरी भाषा का दर्जा दिया है। बावजूद संस्कृत विद्यालय उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। महाविद्यालय में शिक्षकों के रिक्त पदों पर स्थायी नियुक्ति और नई तकनीकी शिक्षा को भी बढ़ावा देना चाहिए। इस महाविद्यालय को गुरुकुल की तर्ज पर विकसित किया जाना चाहिए।
संस्कृत महाविद्यालय की संपत्ति पर ऊर्जा निगम का कब्जा
संस्कृत महाविद्यालय को वर्ष 2000 में पुरानी टिहरी से जिला मुख्यालय में शिफ्ट किया गया था लेकिन उससे पहले ऊर्जा निगम ने प्राचार्य कार्यालय, पुस्तकालय, चार कक्षा कक्ष, स्टाफ आवास कक्ष और शौचालय आदि पर कब्जा जमा दिया था। महाविद्यालय प्रबंधन लगातार कब्जा हटाने की मांग करता आ रहा हैं लेकिन अभी तक ऊर्जा निगम ने कब्जा नहीं छोड़ा है। महाविद्यालय और निगम प्रवेश गेट भी एक ही है। बताया गया कि कॉलेज की खाली जमीन पर भी निगम ने टिनशेड बना दिया है। आगे की साइट से ठक्करबापा छात्रावास प्रबंधन ने कॉलेज से मंदिर जाने का रास्ता बंद कर दिया जिससे संस्कृत महाविद्यालय दोनों संस्थाओं के बीच में कैद होकर रह गया है।
महाविद्यालय में रिक्त पदों पर स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। कॉलेज की संपत्ति से ऊर्जा निगम का कब्जा छुड़ाने के लिए 23 मई को यहां पहुंचे संस्कृत शिक्षा सचिव को भी पत्र दिया गया। उम्मीद है, जल्द कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
- विनोद प्रसाद बेंजवाल, प्रभारी प्राचार्य संस्कृत महाविद्यालय नई टिहरी।
कॉलेज को गुरुकुल की तर्ज पर विकसित करे सरकार
नई टिहरी। ऐतिहासिक श्री बदरीनाथ राजकीय संस्कृत महाविद्यालय अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। शासन-प्रशासन की उपेक्षा के कारण अस्थायी शिक्षकाें के भरोसे चल रहे महाविद्यालय में छात्र घटकर 24 रह गई है। महाविद्यालय में 48 छात्र संख्या का छात्रावास की सुविधा के बावजूद छात्र संख्या नहीं बढ़ पा रही है। महाविद्यालय की आधी संपत्ति से ऊर्जा निगम का कब्जा हटाना भी महाविद्यालय के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
वर्ष 1907 में तत्कालीन महाराज कीर्तिशाह ने पुरानी टिहरी में श्री बदरीनाथ संस्कृत पाठशाला (मध्यमा) की स्थापना की थी। उसके बाद वर्ष 1949 में स्टेट विलीनिकरण के साथ संस्कृत पाठशाला का राजकीयकरण कर शास्त्री और आचार्य की मान्यता मिली। इस ऐतिहासिक महत्व का राजकीय संस्कृत महाविद्यालय आज अपनी पहचान बचाए रखने के लिए जूझ रहा है। शासन-प्रशासन की उपेक्षा के कारण यह महाविद्यालय कई समस्याओं से जूझ रहा है।
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महाविद्यालय में शिक्षकों के 14 पदों के सापेक्ष प्राचार्य के अलावा अन्य 13 पद वर्ष 2020 से व्यवस्था शिक्षकों के भरोसे है जिससे षष्ठम कक्षा से मध्यमा तक छात्र संख्या कुल 14, शास्त्री में आठ और आचार्य में कुल दो छात्र हैं। महाविद्यालय में 48 छात्र संख्या का छात्रावास भी उपलब्ध है, बावजूद महाविद्यालय को छात्रों की कमी से जूझना पड़ रहा है।
पूर्व प्राचार्य दिनेश प्रसाद बडोनी का कहना है कि सरकार ने संस्कृत भाषा को राज्य की दूसरी भाषा का दर्जा दिया है। बावजूद संस्कृत विद्यालय उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। महाविद्यालय में शिक्षकों के रिक्त पदों पर स्थायी नियुक्ति और नई तकनीकी शिक्षा को भी बढ़ावा देना चाहिए। इस महाविद्यालय को गुरुकुल की तर्ज पर विकसित किया जाना चाहिए।
संस्कृत महाविद्यालय की संपत्ति पर ऊर्जा निगम का कब्जा
संस्कृत महाविद्यालय को वर्ष 2000 में पुरानी टिहरी से जिला मुख्यालय में शिफ्ट किया गया था लेकिन उससे पहले ऊर्जा निगम ने प्राचार्य कार्यालय, पुस्तकालय, चार कक्षा कक्ष, स्टाफ आवास कक्ष और शौचालय आदि पर कब्जा जमा दिया था। महाविद्यालय प्रबंधन लगातार कब्जा हटाने की मांग करता आ रहा हैं लेकिन अभी तक ऊर्जा निगम ने कब्जा नहीं छोड़ा है। महाविद्यालय और निगम प्रवेश गेट भी एक ही है। बताया गया कि कॉलेज की खाली जमीन पर भी निगम ने टिनशेड बना दिया है। आगे की साइट से ठक्करबापा छात्रावास प्रबंधन ने कॉलेज से मंदिर जाने का रास्ता बंद कर दिया जिससे संस्कृत महाविद्यालय दोनों संस्थाओं के बीच में कैद होकर रह गया है।
महाविद्यालय में रिक्त पदों पर स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। कॉलेज की संपत्ति से ऊर्जा निगम का कब्जा छुड़ाने के लिए 23 मई को यहां पहुंचे संस्कृत शिक्षा सचिव को भी पत्र दिया गया। उम्मीद है, जल्द कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
- विनोद प्रसाद बेंजवाल, प्रभारी प्राचार्य संस्कृत महाविद्यालय नई टिहरी।