छत्तीसगढ़ के डोंडीलोहारा लोहारा ब्लॉक के घने, मूक जंगलों के बीच एक अजीब सी खामोशी थी, जिसे अचानक हजारों पैरों की चाप और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप ने तोड़ दिया। यह कोई आम चहल-पहल नहीं थी। यह अपनी अस्मिता, अपनी संस्कृति और अपने 'बंधक' बना लिए गए देवताओं को मुक्त कराने के लिए आदिवासियों का एक मौन, लेकिन बेहद शक्तिशाली शंखनाद था। इसे नाम दिया गया था जातरा छत्तीसगढ़ के आदिवासी और उनकी परंपराएं जो सभी से हटकर है बीते कुछ दिनों से छत्तीसगढ़ का बालोद जिला बाबा बालक दास के आश्रम और आदिवासी समाज के आरोप जिसमें ये कहा जा रहा है कि आश्रम द्वारा वन भूमि में कब्जा किया गया है और उनके देव स्थल को भी बंदी बना लिया गया है जब प्रशासन से इस विवाद का हल नहीं निकला तो आदिवासी समाज के लोग अपने देवी देवताओं के शरण में पहुंचे तो उनके देवताओं ने कहा कि आप सबको एक विशाल देव मिलन आयोजन करना होगा जिसका नाम दिया गया जातरा दोंदी लोहारा ब्लॉक के जंगलों की गोद में इस भव्य आयोजन को समाज ने किया तो दूसरी ओर पुलिस और प्रशासन आदिवासी समाज से ज्यादा आश्रम की सुरक्षा को लेकर तैनात नजर आई यहां पर पूरा जंगल छावनी में तब्दील था यहां तक की पत्रकारों को भी पुलिस और प्रशासन ने घुसने ही नहीं दिया और जब आदिवासी समाज के लोग अपने देव स्थल जलकैना देव स्थल पर पूजा करने और रूढ़िवादी पूजन संस्कार के लिए जीव सेवा अर्जी लेकर जा रहे थे तो प्रशासन और पुलिस के लोगों ने उसे छीन लिया जिस दौरान यहां काफी विवाद और झड़प भी हुई जिसके बाद समाज में आक्रोश व्याप्त है।
सर्व आदिवासी समाज और देव स्थल पर कब्जा सहित संरक्षित वन क्षेत्र पर अतिक्रमण जैसे विवादों से गिरे इस पूरे मसले में सर्वाधिक समाज के साथ कांग्रेस पार्टी जैन मुक्ति मोर्चा छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच भीम आर्मी जैसे विभिन्न संगठनों के लोगों का समर्थन यहां पर सर्व आदिवासी समाज को मिला वह भी इस पूरे यात्रा आयोजन में शामिल हुए थे सभी संगठनों ने प्रशासन की बुलडोजर कार्रवाई को भी महज़ समाज को शांत करने का एक हथकंडा बताया।
देव मिलन जरूरी, आती है समृद्धि
सर्व आदिवासी समाज के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बी. एस, रावटे ने बताया कि जब सरकारी आदिवासियों की बात नहीं सुनती प्रशासन और लोग उनके बात नहीं सुनते तो वह अपने देव के पास जाते हैं तो देव ने इस आयोजन को करने के लिए समाज को निर्देशित किया था और हमारी एक अलग अपनी एक परंपराएं हैं जिसे लेकर हम हमेशा से सजग रहते हैं और उन्होंने कहा कि इस आयोजन और उनके देव स्थल जिस पर कब्जा किया गया है उसे जब तक मुक्त नहीं किया जाएगा तब तक इस क्षेत्र में समृद्धि नहीं आएगी। वहीं विनोद नागवंशी ने कहा कि यहां पर बाबा बालक दास द्वारा जो वन भूमि और हमारे देव स्थल पर कब्जा किया गया है उसके लेकर हमने कई बार प्रशासन से चर्चा करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने हमारे चर्चाओं को गंभीरता से नहीं लिया इसके बाद 1 जून को हमने आंदोलन किया था आंदोलन नहीं था वह कलेक्टर नहीं मिले इसलिए आंदोलन का रूप ले लिया गया आखिर प्रशासन आदिवासियों को क्या समझती है और आज का हमारा पूजन संस्कार हमने किया है हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग यहां एकत्र हुए थे बहुत अच्छा आयोजन है उन्होंने कहा कि जब हमारी समस्याओं को लेकर हम मुख्यमंत्री के पास गए थे तो उन्होंने हमारी समस्याओं को समझा था कि आदिवासियों की संस्कृति अलग होती है उनकी परंपरा एवं मान्यताएं अलग होती है तो इन्हें रोकना नहीं चाहिए इन्हीं सब विषयों को लेकर हमने आज यह कार्यक्रम किया है और प्रशासन आज भी हमें नहीं समझ पा रही।
प्रशासन ने अपहृत किया सेवा अर्जी
समाज के गायता पुजारी नेमसिंह उइके ने बताया कि समाज समाज की मान्यताओं और देवपूजन रूढ़िवादी संस्कृति के तहत हम अपने देवी स्थल पर सेवा अर्जी के लिए जीव सेवा लेकर गए हुए थे हमने ऊपर पाठ बाबा में पूजा पाठ किया उसके बाद हम अपने जाल कहना देवी के पास जीव सेवा के लिए पहुंचे हुए थे जहां पर पुलिस और प्रशासन के लोग आए और हमारी जीव सेवा की वस्तुओं को लेकर चले गए इसके बाद हम काफी आक्रोशित हैं और आखिर यह सब किसके इशारे पर हो रहा है इसे लेकर समाज काफी चिंतित है उन्होंने कहा कि अभी सब खत्म नहीं हुआ है जब हमारे जीव सेवा को ले जाया गया तो समाज के लोग का आक्रोशित हुए और ऊपर झड़प भी हुई।
जानिए क्या होता है जातरा
बालोद जिले के वनांचल ग्राम तुएगोंदी के पठार पर समाज के लोग एक दिन पहले रात नहीं एकत्र हो गए थे और वहां पर पूजा अर्चना चली और 20 जून की सुबह भी यह पूजा चलती रही लगभग 11:00 के आसपास देवी देवताओं के साथ समाज के लोग पैदल ही लगभग 6 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए खड़े पहाड़ पर चढ़ने उबाल खबर दर्शन से अपने देव स्थल पहुंचे देव स्थल में ही दिनभर पूजा अर्चना चला हालांकि प्रशासन और पुलिस के साथ समाज के पदाधिकारी और लोगों की झड़प भी हुई लेकिन समय रहते समाज ने अपना आक्रोश शांत कर लिया पुलिस चप्पे छपे पढ़ते हैं नाथ थी और सभी तरह की बंदी से जायज थी बावजूद इसके समाज के लोगों ने जरा भी आक्रोश नहीं दिखाई शांतिपूर्ण आयोजन रहा और शाम को अपनी संस्कृतियों अनुसार देवी देवता वापस अपने स्थल पहुंचे लगभग 24 घंटे तक यह पूजन संस्कार चला जिसमें आदिवासी परंपराओं की अच्छी झलक देखने को मिली और हर वीडियो हम आपको इसलिए नहीं दिखा सकते क्योंकि समाज और देवी देवताओं के कुछ नियम रहते हैं जिन्हें मानना बेहद जरूरी होता है।