कोंडागांव जिले के अंतिम छोर पर बसे ग्राम तुमड़ीवाल की तस्वीर विकास के दावों पर कई सवाल खड़े कर रही है। लगभग 40 से 50 घरों वाला यह गांव कोंडागांव जिले का आखिरी गांव है, जो अबूझमाड़ (नारायणपुर) और दंतेवाड़ा की सीमाओं से सटा हुआ है। भले ही प्रशासनिक रूप से यह क्षेत्र विधानसभा नारायणपुर में आता हो, लेकिन मूलभूत सुविधाओं के अभाव में यहां के ग्रामीण आज भी संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर हैं।
सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना यहां केवल कागजों तक सीमित नजर आती है। गर्मी के दिनों में जब नदियों का जलस्तर गिर जाता है या पानी सूखने लगता है, तब गांव के लोग नदी के बीच रेत खोदकर गोल-गोल क्यारियां बनाते हैं और उनमें जमा हुए पानी को छानकर पीने, नहाने और खाना बनाने के लिए उपयोग करते हैं। यह पारंपरिक तरीका उनकी मजबूरी बन चुका है। मर्दापाल से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव लंबे समय तक नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्र में रहा है। हालांकि अब सुरक्षा स्थिति में सुधार हुआ है और विकास की किरणें यहां तक पहुंचने लगी हैं, लेकिन पानी जैसी बुनियादी जरूरत आज भी अधूरी है। गांव में बिजली पहुंच चुकी है, लेकिन पेयजल की स्थायी व्यवस्था अब तक नहीं हो पाई है।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार अधिकारियों को इस समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका है। ऐसे में हर साल गर्मी के मौसम में पानी की समस्या विकराल रूप ले लेती है। एक ओर देश को विश्व गुरु बनाने और स्पेस टेक्नोलॉजी के जरिए विकास की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर तुमड़ीवाल जैसे गांव आज भी पानी के लिए जुगाड़ तकनीक पर निर्भर हैं। यह स्थिति न केवल हैरान करती है, बल्कि यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि विकास के दावे जमीनी हकीकत से कितने दूर हैं।