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मेरी गांव मेरी शान: उग्र सैन ने बसाया था उग्रा खेड़ी गांव, पानीपत की तीसरी लड़ाई में बहा खून गांव के तालाब में हो गया था जमा
उग्रा खेड़ी गांव उग्र सैन से पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) से पहले बसाया था। उन्हीं के नाम पर गांव का नाम उग्रा खेड़ी रखा। गांव के बसने का इतिहास लंबा चौड़ा है। गांव तीसरी बार वर्तमान स्थान पर संत गरीब दास के आशीर्वाद से बसाया था। यहां आज दादा खेड़ा के रूप में पूजा की जाती है। इसी धरती पर पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई। यहां मराठा सेना का इतना खून बहा था कि तालाब भर गया था। गांव में आज भी इसका गुहला तालाब और लड़ाई के मैदान को पापी थली के नाम से जानते हैं। गांव के साथ तीसरी लड़ाई का सूचक पर्यटन स्थल काला आंब बना है। ग्रामीणों का मानना है कि यहां सदाशिवराव का कैंप था। उग्रा खेड़ी गांव पानीपत-हरिद्वारा नेशनल हाईवे पर शहर से सटा हुआ है। गांव का कुछ रकबा नगर निगम के अंतर्गत आता है। इसमें बलजीत नगर, विद्यानंद कॉलोनी व धूप सिंह नगर आते हैं।
गांव के 67 वर्षीय सतबीर सिंह ने बताया कि पृथ्वीराज की हार के बाद 16 गोत्र के लोग अफगानिस्तान के गढ़ गजनी से चले और पाकिस्तान की सिंधु नदी पर आकर स्नान किया। उस समय स्नान के लिए घाटों लड़ाई हो जाती थी। उन्होंने गठजोड़ (इकट्ठा) होकर घाट पर कब्जा कर लिया। लोगों ने फिर गठवाला गोत्र बना। यह आज मलिक गोत्र के नाम से जाना जाता है। वे वहां से आकर भिवानी जिले के मेहंदीपुर गांव में आकर रहने लगे। उन्होंने यहां अपना किला बना लिया। उस समय दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक का राज था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने किले पर सेना भेज दी। लोगों ने एक गाड़ी में दो पत्थर रखे और किला छोड़ दिया। उन्होंने फैसला लिया कि जहां भी गाड़ी से पत्थर गिरेंगे, वहीं पर गांव बसाए जाएंगे। गाड़ी से पहला पत्थर सोनीपत के गोहाना के नजदीक आहुलाना व दूसरा कासंडी गांव में गिरा। कासंडी गांव से मलिक गौत्र के परिवार बाद में पानीपत के वार्ड-11 के जटवाड़ा में आकर बसें।
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