{"_id":"69648d0a7c869600950a4855","slug":"darbhanga-last-maharani-kamsundari-devi-death-shyama-mai-temple-funeral-2026-01-12","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bihar: राजसी वैभव से आधुनिक संघर्ष तक..., संभाली थी सांस्कृतिक विरासत, कामसुंदरी देवी के साथ खत्म हुआ एक युग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bihar: राजसी वैभव से आधुनिक संघर्ष तक..., संभाली थी सांस्कृतिक विरासत, कामसुंदरी देवी के साथ खत्म हुआ एक युग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दरभंगा
Published by: दरभंगा ब्यूरो
Updated Mon, 12 Jan 2026 01:05 PM IST
विज्ञापन
सार
दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी के निधन से मिथिला की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत में एक खालीपन आ गया है।
दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी का हुआ देहांत
- फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
विस्तार
मिथिला अंचल के लिए एक ऐतिहासिक युग के समापन की खबर सामने आई है। दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी और अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी के निधन से पूरे मिथिला क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई है। महारानी पिछले छह महीनों से अस्वस्थ चल रही थीं और उन्होंने दरभंगा स्थित कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली।
निधन की सूचना मिलते ही युवराज कपिलेश्वर सिंह दिल्ली से दरभंगा के लिए रवाना हो गए हैं। वहीं, कल्याणी निवास में रह रहे ट्रस्ट से जुड़े लोग अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुटे हुए हैं। महारानी का अंतिम संस्कार राज परिसर स्थित श्यामा माई मंदिर परिसर में किया जाएगा, जहां परंपरागत रूप से राज परिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार होता रहा है।
महाराज कामेश्वर सिंह से 1940 में हुआ था विवाह
महाराज कामेश्वर सिंह ने वर्ष 1940 में महारानी कामसुंदरी देवी से तीसरा विवाह किया था। इससे पहले उनकी दो शादियां महारानी राजलक्ष्मी देवी और महारानी कामेश्वरी प्रिया से हुई थीं। महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म वर्ष 1930 में हुआ था। दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह रियासत के अंतिम शासक माने जाते हैं, जिनका निधन वर्ष 1962 में हुआ था। उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी देवी का निधन 1976 में और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन 1940 में ही हो गया था।
कल्याणी फाउंडेशन के जरिए संभाली सांस्कृतिक विरासत
महाराज कामेश्वर सिंह के निधन के बाद महारानी कामसुंदरी देवी ने उनकी स्मृति में कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की थी। इस फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने महाराजा के नाम पर एक समृद्ध पुस्तकालय की स्थापना कराई, जिसमें आज भी करीब 15 हजार से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं। इसके साथ ही महारानी साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन में भी सक्रिय भूमिका निभाती रहीं और दरभंगा की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का कार्य किया।
पढ़ें- Bihar Crime: युवती को अगवा कर छह दरिंदों ने किया सामूहिक दुष्कर्म, शराब पिलाकर रात भर बरपाया कहर; एक गिरफ्तार
श्यामा माई मंदिर से जुड़ा है राजपरिवार का इतिहास
दरभंगा का प्रसिद्ध श्यामा माई मंदिर महाराज रामेश्वर सिंह की चिता स्थल पर निर्मित किया गया था, जो आज ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी परिसर में राज परिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार होता रहा है। परंपरा के अनुसार महारानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार भी इसी श्यामा माई मंदिर परिसर में किया जाएगा। महारानी के निधन को मिथिला में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। उनकी स्मृतियां, योगदान और सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेंगी।
Trending Videos
निधन की सूचना मिलते ही युवराज कपिलेश्वर सिंह दिल्ली से दरभंगा के लिए रवाना हो गए हैं। वहीं, कल्याणी निवास में रह रहे ट्रस्ट से जुड़े लोग अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुटे हुए हैं। महारानी का अंतिम संस्कार राज परिसर स्थित श्यामा माई मंदिर परिसर में किया जाएगा, जहां परंपरागत रूप से राज परिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार होता रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन
महाराज कामेश्वर सिंह से 1940 में हुआ था विवाह
महाराज कामेश्वर सिंह ने वर्ष 1940 में महारानी कामसुंदरी देवी से तीसरा विवाह किया था। इससे पहले उनकी दो शादियां महारानी राजलक्ष्मी देवी और महारानी कामेश्वरी प्रिया से हुई थीं। महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म वर्ष 1930 में हुआ था। दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह रियासत के अंतिम शासक माने जाते हैं, जिनका निधन वर्ष 1962 में हुआ था। उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी देवी का निधन 1976 में और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन 1940 में ही हो गया था।
कल्याणी फाउंडेशन के जरिए संभाली सांस्कृतिक विरासत
महाराज कामेश्वर सिंह के निधन के बाद महारानी कामसुंदरी देवी ने उनकी स्मृति में कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की थी। इस फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने महाराजा के नाम पर एक समृद्ध पुस्तकालय की स्थापना कराई, जिसमें आज भी करीब 15 हजार से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं। इसके साथ ही महारानी साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन में भी सक्रिय भूमिका निभाती रहीं और दरभंगा की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का कार्य किया।
पढ़ें- Bihar Crime: युवती को अगवा कर छह दरिंदों ने किया सामूहिक दुष्कर्म, शराब पिलाकर रात भर बरपाया कहर; एक गिरफ्तार
श्यामा माई मंदिर से जुड़ा है राजपरिवार का इतिहास
दरभंगा का प्रसिद्ध श्यामा माई मंदिर महाराज रामेश्वर सिंह की चिता स्थल पर निर्मित किया गया था, जो आज ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी परिसर में राज परिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार होता रहा है। परंपरा के अनुसार महारानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार भी इसी श्यामा माई मंदिर परिसर में किया जाएगा। महारानी के निधन को मिथिला में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। उनकी स्मृतियां, योगदान और सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेंगी।