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बिहार में 28 साल बाद मिला इंसाफ: बहुचर्चित हत्याकांड में 15 दोषियों को उम्रकैद; लंबी सुनवाई के चलते छह की मौत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अररिया
Published by: पूर्णिया ब्यूरो
Updated Thu, 16 Apr 2026 01:48 PM IST
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सार
अररिया के 1998 हत्याकांड में 28 साल बाद अदालत ने 15 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। प्रत्येक पर 20 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया गया है। छह आरोपियों की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है। पढ़ें पूरी खबर
फाइल फोटो जिला न्यायालय अररिया।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बिहार के अररिया जिले में वर्ष 1998 के बहुचर्चित हत्याकांड में करीब 28 साल बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायालय ने 15 आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही प्रत्येक दोषी पर 20 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। जुर्माना नहीं देने पर छह माह की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी।
डेंगा चौक पर हुई थी वारदात
यह मामला पलासी थाना क्षेत्र के कुमिहया रामनगर टोला से जुड़ा है। तीन मई 1998 को डेंगा चौक स्थित एक दुकान पर विवाद के दौरान हिंसा भड़क गई। बीच-बचाव करने पहुंचे अलीमुद्दीन पर 30-40 लोगों की भीड़ ने दबिया, फरसा और लाठी-डंडों से हमला कर दिया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
21 में से 15 दोषी, छह की हो चुकी मौत
पुलिस ने इस मामले में 21 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। लंबी सुनवाई के दौरान 6 आरोपियों की मृत्यु हो गई, जबकि शेष 15 को अदालत ने दोषी ठहराया।
ये हैं सभी दोषी।
दोषी करार दिए गए लोगों में मो. हाजी रोजिद (लगभग 89 वर्ष), समदानी, फकीर मोहम्मद, रजाबुल, अकलिम, नसीम, ऐनुल, सैजुदिन, इसहाक, मो. तैयब, अजमल, हसीब, कुद्दूस, कफील और मो. वसीक शामिल हैं। सभी की उम्र 70 वर्ष से अधिक बताई गई है। अदालत ने सभी आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149, 302/34, 379, 323, 341 और 307 के तहत दोषी पाया है।
ये भी पढ़ें- Bihar News: एनएच 27 पर ट्रक से टक्कर के बाद पलटी बस, बीस से अधिक यात्री घायल; आठ की हालत गंभीर इलाज जारी
13 गवाहों के आधार पर फैसला
मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 13 गवाह पेश किए गए। साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अदालत ने पाया कि घटना सुनियोजित थी और आरोपियों ने सामूहिक रूप से हत्या की वारदात को अंजाम दिया। करीब तीन दशक पुराने इस मामले में आया फैसला यह दर्शाता है कि न्याय में भले देरी हो, लेकिन अंततः न्याय मिलता है।
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डेंगा चौक पर हुई थी वारदात
यह मामला पलासी थाना क्षेत्र के कुमिहया रामनगर टोला से जुड़ा है। तीन मई 1998 को डेंगा चौक स्थित एक दुकान पर विवाद के दौरान हिंसा भड़क गई। बीच-बचाव करने पहुंचे अलीमुद्दीन पर 30-40 लोगों की भीड़ ने दबिया, फरसा और लाठी-डंडों से हमला कर दिया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
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21 में से 15 दोषी, छह की हो चुकी मौत
पुलिस ने इस मामले में 21 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। लंबी सुनवाई के दौरान 6 आरोपियों की मृत्यु हो गई, जबकि शेष 15 को अदालत ने दोषी ठहराया।
ये हैं सभी दोषी।
दोषी करार दिए गए लोगों में मो. हाजी रोजिद (लगभग 89 वर्ष), समदानी, फकीर मोहम्मद, रजाबुल, अकलिम, नसीम, ऐनुल, सैजुदिन, इसहाक, मो. तैयब, अजमल, हसीब, कुद्दूस, कफील और मो. वसीक शामिल हैं। सभी की उम्र 70 वर्ष से अधिक बताई गई है। अदालत ने सभी आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149, 302/34, 379, 323, 341 और 307 के तहत दोषी पाया है।
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13 गवाहों के आधार पर फैसला
मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 13 गवाह पेश किए गए। साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अदालत ने पाया कि घटना सुनियोजित थी और आरोपियों ने सामूहिक रूप से हत्या की वारदात को अंजाम दिया। करीब तीन दशक पुराने इस मामले में आया फैसला यह दर्शाता है कि न्याय में भले देरी हो, लेकिन अंततः न्याय मिलता है।

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