Chandigarh: जीपीए पर बिके मकानों को मिलेगा मालिकाना हक, नई पॉलिसी तैयार करने की प्रक्रिया शुरू
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार नवंबर 2011 तक जीपीए, विल या वसीयतनामा के आधार पर जिन संपत्तियों का लेन-देन हुआ या जिन पर वर्तमान में कब्जा है, उन्हें नियमित करने के लिए नीति लाई जाएगी। वहीं 2011 के बाद जीपीए के जरिये हुए सौदों को वैधता देने के प्रश्न पर प्रशासन ने अपने लीगल रिप्रेजेंटेटिव (एलआर) से विस्तृत कानूनी सलाह मांगी है।
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चंडीगढ़ में जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) के आधार पर बिके हजारों मकानों को जल्द मालिकाना हक मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।
चंडीगढ़ प्रशासन ने नवंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम हरियाणा प्रदेश फैसले का दोबारा अध्ययन कर नई पॉलिसी तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने इस संबंध में मुख्य सचिव एच राजेश प्रसाद को नीति बनाने के निर्देश दिए हैं।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार नवंबर 2011 तक जीपीए, विल या वसीयतनामा के आधार पर जिन संपत्तियों का लेन-देन हुआ या जिन पर वर्तमान में कब्जा है, उन्हें नियमित करने के लिए नीति लाई जाएगी। वहीं 2011 के बाद जीपीए के जरिये हुए सौदों को वैधता देने के प्रश्न पर प्रशासन ने अपने लीगल रिप्रेजेंटेटिव (एलआर) से विस्तृत कानूनी सलाह मांगी है।
40 हजार से अधिक संपत्तियां दायरे में
शहर के अलग-अलग गांवों और कॉलोनियों में अनुमानतः 40 हजार से ज्यादा मकान ऐसे हैं, जो 2011 के बाद भी जीपीए के माध्यम से बिकते रहे। सेक्टर-29, 30, 31, रामदरबार, मलोया और सेक्टर-38 वेस्ट सहित कई क्षेत्रों में ईडब्ल्यूएस और स्मॉल फ्लैट श्रेणी के मकान 20 से 25 लाख रुपये तक में जीपीए पर बेचे गए।
कई संपत्तियां पिछले 12-13 वर्षों में तीन से चार बार तक जीपीए के जरिये बेची जा चुकी हैं। इन सौदों में न तो विधिवत रजिस्ट्री हुई और न ही प्रशासन को स्टांप ड्यूटी या रजिस्ट्रेशन शुल्क का लाभ मिला। नतीजतन खरीदारों को कानूनी सुरक्षा भी नहीं मिल सकी और विवादों की स्थिति में लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा।
नई नीति से राजस्व और राहत दोनों
प्रस्तावित नीति के तहत यदि जीपीए पर बिके मकानों को मालिकाना हक देने का प्रावधान किया जाता है तो संपत्ति धारकों को कलेक्टर रेट के अनुसार रजिस्ट्रेशन शुल्क और अन्य निर्धारित फीस जमा करानी होगी। इससे प्रशासन को बड़े पैमाने पर राजस्व मिलने की संभावना है, वहीं हजारों परिवारों को वैध स्वामित्व का अधिकार मिलेगा। जानकारों का मानना है कि इससे संपत्तियों की वैध खरीद-फरोख्त का रास्ता खुलेगा और वर्षों से लंबित कानूनी अनिश्चितता खत्म होगी।
क्या था सूरज लैम्प फैसला
नवंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सूरज लैम्प मामले में साफ किया था कि जीपीए, विल या एग्रीमेंट टू सेल के आधार पर संपत्ति का हस्तांतरण पूर्ण स्वामित्व नहीं माना जाएगा। हालांकि उस समय तक हुए सौदों को एकमुश्त राहत दी गई थी। इसके बाद से जीपीए के माध्यम से खरीदी गई संपत्तियों को नियमित स्वामित्व नहीं मिल सका। अब प्रशासन इसी फैसले के आधार पर पुरानी और 2011 के बाद की संपत्तियों को लेकर स्पष्ट नीति बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।