{"_id":"6a5f4b4b8754e2916b06800e","slug":"delhi-cjp-protest-abhijeet-dipke-future-whats-going-to-happen-2026-07-21","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"बड़ा सवाल: दिपके का यह ‘दीप’ बुझ जाएगा या ‘लौ’ में बदलेगा?","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
बड़ा सवाल: दिपके का यह ‘दीप’ बुझ जाएगा या ‘लौ’ में बदलेगा?
सार
कहा यह भी जा रहा है कि जंतर मंतर पर जो हुआ, उसके पीछे युवा कम दूसरे राजनीतिक तत्वों का हाथ ज्यादा है। वामपंथी पार्टियों के छात्र संगठनों ने तो आंदोलन को खुला समर्थन दे ही दिया था। उसके अलावा आम आदमी पार्टी और चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी के लोग भी बड़ी तादाद में आंदोलन में पहुंचे।
विज्ञापन
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके
- फोटो : एएनआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
देश की राजधानी नई दिल्ली के जंतर मंतर पर 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी ( सीजेपी) के आह्वान पर आयोजित संसद मार्च में जिस तरह से हजारों युवाओं की भीड़ जुटी, उसे रोकने लाठी चार्ज हुआ, भीड़ ने हिंसा की, विपक्ष ने इसको लेकर संसद में हंगामा किया और अनशन स्थल से हटाए जाने के बाद दूसरे दिन आंदोलनकारियों का फिर से जंतर मंतर पर धरने पर जम जाना कई सवाल खड़े करता है।
विज्ञापन
उधर पंजाब के किसानों ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील (जो अभी अंतिम रूप से हुई ही नहीं है) को लेकर दिल्ली कूच कर दिया है।
क्या ये घटनाक्रम महज संयोग अथवा किसी दूरगामी राजनीतिक अभियान की ओर संकेत करता है? इसके पीछे आधार यह है कि भारत में कई बार सत्ता परिवर्तन का मूल कारण कुछ और रहता है और बाद में वह शुद्ध रूप से राजनीतिक आकार ले लेता है। फिर चाहे वह बोफोर्स घूस कांड हो, मंडल-कमंडल आंदोलन या फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का आंदोलन हो।
विज्ञापन
सभी की शुरूआत ‘व्यवस्था में सुधार’ की मांग से हुई थी और अंजाम सत्तारूढ़ दल की रवानगी से हुआ। तो क्या इस बार भी वैसा ही कुछ होने जा रहा है या फिर यह भी ‘चाय की प्याली’ में उठा तूफान है, जिससे मोदी सरकार अपने तरीके से निपट लेगी।
विज्ञापन
बीते 12 वर्षों में उठे आंदोलनों के बुलबुलों की माफिक यह भी जल्द फूट जाएगा। क्योंकि आंदोलनों से निपटने की प्रति रणनीति पहले से तैयार है। हालांकि प्रति रणनीति हर बार सफल ही हो, यह जरूरी नहीं है।
विपक्ष में इच्छाशक्ति और संगठन क्षमता की कमी?
दरअसल दिल्ली में पांच साल पहले किसान आंदोलन के कारण जो जबर्दस्त हलचल मची थी, वैसी फिर देखने में नहीं आई। ऐसा नहीं है देश में मुद्दे खत्म हो गए हैं, लेकिन उसे उठाने के लिए जरूरी इच्छाशक्ति और संगठन क्षमता विपक्ष में नहीं दिखाई दी।
दरअसल विपक्ष स्वयं किसी मुद्दे को व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने में नाकाम रहा है, लेकिन दूसरों द्वारा शुरू किए आंदोलनों में अपनी राजनीतिक संभावनाएं जरूर खोजता रहा है। जबकि सत्तारूढ़ भाजपा और उसकी प्रेरक शक्ति आरएसएस इन आंदोलनों के पीछे की मंशा को भांपकर अपने तरीकों से उसकी हवा निकालने में कामयाब रहे हैं। क्योंकि इन आंदोलनों का जनता का व्यापक समर्थन कभी नहीं मिला। वह किसी एक वर्ग अथवा समुदाय तक सीमित होकर रह गया।
विपक्ष की मानें तो उसका असल उद्देश्य मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करना है ताकि ‘देश और संविधान को बचाया जा सके।‘ जबकि मोदी सरकार और संघ भी इसे इसलिए कामयाब नहीं होने देता क्योंकि ‘देश और उसकी संस्कृति को बचाए रखना है।‘ इसमें कौन सही है, यह निरपेक्ष भाव से तय करना कठिन है, क्योंकि हकीकत में दोनो की दृष्टि एकांगी है।
उदाहरण के लिए 20 जुलाई को एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक और सीजेपी के आव्हान पर छात्रों की मांगों को लेकर आयोजित संसद मार्च के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में जाने से पहले मीडिया से भारत की युवाशक्ति की उपलब्धियों का तो जिक्र किया, लेकिन उसी समय जंतर मंतर पर इकट्ठा हो रहे हजारों नाराज युवाओं के बारे में एक शब्द नहीं कहा।
दूसरी तरफ विपक्ष ने संसद में आंदोलनकारी युवाओं के दमन और सरकार की उनके प्रति ‘असंवदेनशीलता’ का तो मुद्दा उठाया, लेकिन आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और बड़ी संख्या में घायल सुरक्षाकर्मियों के बारे में मौन साध लिया।
लेकिन इससे इस आंदोलन की महत्ता कम नहीं होती। क्योंकि यह बात ही अपने आप में चिंता का विषय होनी चाहिए कि देश का भविष्य युवा अगर अपनी समस्याओं और तकलीफों को लेकर सड़कों पर उतर रहा है तो यह स्थिति बनी क्यों?
वैसे भी असंगठित सीजेपी की मांगों और सोनम वांगचुक के आमरण अनशन के प्रति सरकार ने शुरू से सकारात्मक रवैया अपनाया होता तो यह स्थिति शायद बनती ही नहीं। केन्द्रीय मंत्री जेपी. नड्डा ने आंदोलनकारियों से जो बात जंतर-मंतर पर हंगामे के बाद की, वह अगर पहले ही कर ली जाती तो संसद मार्च की नौबत ही नहीं आती। वैसे भी सरकार आंदोलनकारियों की सारी मांगे माने, यह जरूरी नहीं है, लेकिन वह युवाओं को यह तो बता सकती थी कि सरकार उनकी मांगों के संदर्भ में क्या करने जा रही है।
‘ठीक’ से हैंडल नहीं किया गया मामला'
यहां बात मूलत: कोई भी काम सदाशयता के साथ दूसरों को विश्वास में लेकर करने की है। लेकिन सरकार को शायद यही मंजूर नहीं है। वह बात भी करती है तो रायता फैल जाने के बाद। इस पूरे मामले को भी ‘ठीक’ से हैंडल नहीं किया गया, यह राय खुद भाजपा और संघ में कई लोगों की है। वैसे भी सरकार युवाओं से लड़कर संदेश क्या देना चाहती है?
कहा यह भी जा रहा है कि जंतर मंतर पर जो हुआ, उसके पीछे युवा कम दूसरे राजनीतिक तत्वों का हाथ ज्यादा है। वामपंथी पार्टियों के छात्र संगठनों ने तो आंदोलन को खुला समर्थन दे ही दिया था। उसके अलावा आम आदमी पार्टी और चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी के लोग भी बड़ी तादाद में आंदोलन में पहुंचे। इस वजह से पूरा आंदोलन शुद्ध रूप से छात्रों का रह नहीं गया था। लेकिन यह भी सही है कि हजारों छात्र छात्राएं देश के कई हिस्सों से अपने खर्चे पर इस मार्च में शामिल होने के लिए पहुंचे थे, क्योंकि उनकी समस्याएं जायज हैं।
उनका दर्द वाजिब है कि अगर परीक्षाएं ही ईमानदारी से नहीं होंगी तो वो क्या करेंगे? कहां जाएंगे? यही व्यक्तिगत आक्रोश जंतर मंतर पर सामूहिक रूप से व्यक्त हुआ। हालांकि सरकार ने भी उसे शुरू में नहीं रोका। लेकिन तभी संवाद होता तो बात कुछ अलग होती। यह तर्क भी लचर है कि संवाद सरकार करती तो किससे, जो बात बाद में जिनसे की गई, उन्हीं से पहले भी की जा सकती थी।
आंदोलनकारियों की तीन मुख्य मांगों में पहली केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की है। आंदोलनकारियों को लगता है कि परीक्षा में पेपर लीक के लिए वो नैतिक जिम्मदारी लें। दूसरी मांग सोनम वांगचुक की रिहाई की है। तीसरी मांग पेपर लीक से दुखी होकर खुदकुशी करने वाले परीक्षार्थियों के परिवारों को 1-1 करोड़ रू. का मुआवजा दिया जाए।
जहां तक किसी भी मामले में नैतिक आधार पर इस्तीफे की बात है तो वह भाजपा के ‘राम राज्य’ में वह फिट नहीं होती। आखिर किसी भी ‘अनैतिक काम’ की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ कोई क्यों ले? अपना मन चंगा तो कठौती में गंगा। सत्ता में रहते हमारा काम चोरों को पकड़ना है, आत्मावलोकन करना नहीं है। यही मानस हमने श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी कांड में देखा।
दूसरी मांग मानने में कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि सोनम वांगचुक अस्पताल में हैं, किसी जेल में नहीं। अलबत्ता तीसरी मांग मानी जाएगी, इसमें संदेह है, क्योंकि किसान आत्महत्या की तरह भानमती का नया पिटारा खुल जाएगा। कोई छात्र किसी भी कारण से खुदकुशी करे, मुआवजे के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाएगा।
भाजपा समर्थक इस छात्र आंदोलन को मोदी सरकार के खिलाफ एक और ‘टूलकिट’ मान रहे हैं। यहां तक कि इसके मीडिया कवरेज में यह सोच हावी दिखी। लेकिन सरकार के हित में यही है कि वह शांति और विवेक कायम रखकर इसे निपटाए। कहा तो यह भी जा रहा है कि जंतर मंतर और संसद के सामने हंगामा और हिंसा करने वाले छात्र थे ही नहीं।
संभव है कि पुलिस द्वारा पकड़े गए लोगों में छात्र न हों, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि आंदोलन में बड़ी संख्या में छात्र शामिल थे और यही सरकार के लिए आगे चलकर खतरे की घंटी हो सकती है।
इस आंदोलन का एक और अहम पक्ष सोशल मीडिया के वर्च्युअल वर्ल्ड में जीने युवाओं का स्वप्रेरणा से सड़कों पर वास्तविक दुनिया में उतरना है। जबकि सरकार और राजनीतिक प्रेक्षक यह मानकर चल रहे थे कि सोशल मीडिया और सड़क मूवमेंट का आपस में सीधा रिश्ता नहीं है। भारत में जेन जी ऐसा नहीं कर सकती।
सोशल मीडिया से सड़क तक
इस अर्थ में सीजेपी की यह सफलता है कि महज कटाक्ष के तौर पर सोशल मीडिया में बनी एक पार्टी नाराज युवाओंको सड़क पर उतारने में कामयाब हो गई। यह सोच अगर राज्यों और जिलों तक फैल गई तो एक बड़ा आंदोलन भविष्य में खड़ा हो सकता है। इस बीच सोनम वांगचुक ने अस्पताल में भी अनशन जारी रखने का ऐलान कर दिया है तो दूसरी तरफ सीजेपी के संस्थापन अभिजीत दिपके और सोनम की पत्नी गीतांजलि ने जंतर मंतर पर धरना जारी रखने का ऐलान किया है।
यह बात अलग है कि खुद गांधीवादी में सोनम के अनशन को गांधीवादी आंदोलन नहीं मान रहे। लेकिन ये सिलसिला जारी रहे, यह विपक्षी पार्टियों के लिए भी मुफीद है, क्योंकि उसे यह आरोप लगाने का मौका मिलता रहेगा कि यह सरकार युवा विरोधी है।
विपक्ष की नजर 2029 के लोकसभा चुनावों पर है। उसका मानना है कि देश में मोदी की लोकप्रियता लहर अब मंद पड़ने लगी है। लोकसभा चुनाव तक इसे किसी तरह चरम पर पहुंचाया जाए। सीजेपी जैसे संगठन इसमें मददगार हो सकते हैं। हालांकि विपक्ष की सोच को 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों ने गलत ही साबित किया है। फिर भी राजनीति संभावनाओं का खेल है।
कौन जानता था कि ‘अन्ना’ शब्द का राजनीतिक अनुवाद ‘मोदी’ में होगा। अभिजीत दिपके का जलाया दीप बुझ जाएगा अथवा परिवर्तन की लौ में तब्दील होगा, यह देखने की बात है।
-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।