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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: फिल्मों में आंख से जुड़ी शारीरिक अक्षमता

Tue, 21 Jul 2026 04:32 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 21 Jul 2026 04:32 PM IST
सार

भारत के दर्शकों की आस्था भावनाओं को भुनाता हुआ हिन्दी सिनेमा इसका खूब उपयोग करता है। पात्र कारण-बेकारण अंधा हो जाता है, फिर कुछ समय बाद भजन-कीर्तन करते हुए उसकी आंख की ज्योति वापस लौट आती है। बोलो सिया रामचंद्र की जय! फिल्म ‘अमर, अकबर एन्थनी’ में निरुपमा राय की दृष्टि लौटती है और नारा लगता है, ‘ज़ोर से बोलो जै बाबा की!

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history of world cinema movies on physical disability eye problems
सिनेमा की दुनिया - फोटो : Freepik.com

विस्तार

दुनिया के कई देशों में शारीरिक अक्षमता पर फिल्में बनी हैं। शारीरिक अक्षमता कई तरह की हो सकती है। यह शरीर के किसी अंग से जुड़ी हो सकती है। अंधत्व उनमें से एक है। भारत में अंधत्व पर कई फिल्म बनी हैं।

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कभी यह जन्मजात होती है, कभी बाद में विभिन्न कारणों से उत्पन्न हो जाती है। ‘फना’ फिल्म में काजल अंधे किरदार में है। ‘झील के उस पार’ में नीलू (मुमताज) एक दुर्घटना के फलस्वरूप बचपन में अपनी आंखें खो बैठती है। फिल्म है, तो हीरो समीर (धर्मेंद्र) को अंधी लड़की से प्यार होने में देर नहीं लगती है। कभी-कभी यह ओढ़ी हुई होती है, जैसे, ‘मोहरा’ फिल्म में नसीरुद्दीन शाह स्वार्थ पूर्ति केलिए झूठ-मूठ अंधे होने का नाटक करते हैं। ‘स्पर्श’ में उनका अंधा होना पात्र की वास्तविकता थी।
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फिल्म अंधे व्यक्ति की खुद्दारी को सामने लाती है। हेलेन केलर की तर्ज पर ‘ब्लैक’ में रानी मुखर्जी अंधे पात्र की भूमिका में है। भारत के दर्शकों की आस्था भावनाओं को भुनाता हुआ हिन्दी सिनेमा इसका खूब उपयोग करता है। पात्र कारण-बेकारण अंधा हो जाता है, फिर कुछ समय बाद भजन-कीर्तन करते हुए उसकी आंख की ज्योति वापस लौट आती है। बोलो सिया रामचंद्र की जय! फिल्म ‘अमर, अकबर एन्थनी’ में निरुपमा राय की दृष्टि लौटती है और नारा लगता है, ‘ज़ोर से बोलो जै बाबा की! फिर से बोलो जै बाबा की!
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कई साहित्यकार या तो जन्मांध हुए हैं, अथवा बाद में उनकी दृष्टि जाती रही है। नोबेल पुरस्कृत ओरहान पामुक अपने साहित्य में अंधों को पात्र बनाते हैं। अम्बर्टो इको ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘इन द नेम ऑफ द रोज’ में लाइब्रेरियन बूढ़े पादरी को अंधा बनाया है। पात्र उन्होंने बोर्खेज को केंद्र में रख कर रचा है। बोर्खेज जीवन के अंतिम वर्षों में अपनी दृष्टि खो बैठे थे। इस विषय पर सबसे पहले याद आती है, 1904 में एच. जी. वेल्स (21 सितम्बर 1866-13 अगस्त 1946) की लिखी कहानी ‘द कंट्री ऑफ ब्लाइंड’।

उनकी ‘द टाइम मशीन’, ‘वार ऑफ द वर्ल्ड्स’, ‘द हिस्ट्री ऑफ मिस्टर पोली’, ‘दि आउटलाइन ऑफ हिस्ट्री’ आदि कई रचनाएं पर फिल्में बनीं। 2014 में ट्रैविस मिलर ने मात्र 16 मिनट की ‘द कंट्री ऑफ द ब्लाइंड’ बनाई, जिसमें एक प्रोफेसर जंगल में एक सीक्रेट अंधे समुदाय की खोज में जाता है, वह अपने एक खोए हुए छात्र को खोज रहा है। 2023 में ‘कंट्री ऑफ ब्लाइंड’ नाम से राहत शाह काजमी ने पौने दो घंटे की फिल्म बनाई, 1,000 फीट की चोटी से पर्वातारोही गिर कर अनजान घाटी में पहुंच जाता है, जहां के सब अंधे हैं। काजमी एच. जी. वेल्स का नाम कहीं नहीं देते हैं।

‘माई नेम इज रेड’ में ‘अन्धत्व’ स्वरलहरी की भांति है। मिनिएचर बनाने वाले कलाकार सारी जिंदगी झुक कर चित्र बनाते हैं। सूक्ष्म कलाकारी करते हैं। यह काम करते हुए उनकी आंखें चली जाती हैं। आंखों का जाना कमजोरी नहीं माना जाता है। यह गर्व और सम्मान तथा प्रसिद्धि की बात होती है। ऐसे व्यक्ति को आदर की दृष्टि से देखा जाता है। अंधत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं समझा जाता है। यह  अल्लाह की नेमत होती है। क्योंकि कलाकार पूरी जिंदगी अल्लाह के काम में लगाता है।

ब्लाइंडनेस के वाबजूद वे पेंट करते रहते हैं, क्योंकि परम्परागत इस्लामिक शैली में नया कुछ नहीं रचना होता है। मात्र पुराने मास्टर्स के काम की आवृति करनी होती है। स्वयं अवलोकन करके काम नहीं किया जा सकता है। पूर्ववर्ती काम को दोहराया जाता है, उसकी नकल की जाती है। इस्लाम में माना जाता है, आदमी सिर्फ नकल कर सकता है, रचने का काम अल्लाह करता है। ब्लाइंडनेस उन्हें दूसरे कलाकारों के काम से प्रभावित होने से भी बचाता है। वे ध्यान बंटने से भी बचे रहते हैं, उनका ध्यान अनावश्यक रूप से भटकता नहीं है। उपन्यास पर पामुक ने अभी तक फिल्म बनाने की अनुमति नहीं दी है।

साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त

साहित्य और उस पर बनी एक फिल्म है, ‘ब्लाइंडनेस’, जहां अंधापन एक रूपक है। पुर्तगाल में 1922 में जन्मे होसे सारामागो ने 1995 में ‘ब्लाइंडनेस’ नाम से एक अनोखा उपन्यास लिखा। स्वशिक्षित रचनाकार को 1998 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। ‘द विडो’, ‘रेज्ड फ्रॉम द ग्राउंड’, ‘कैन’, ‘द स्टोन राफ्ट’, ‘सीइंग’, ‘डैथ ऐट इंटरवल्ज’, ‘हिस्ट्री ऑफ द सीज ऑफ लिस्बन’, ‘द गॉस्पल अकॉर्डिंग टू जीसेस क्राइस्ट’ उनके कुछ अन्य कार्य हैं। बेचैन करने वाली कृति ‘ब्लाइंडनेस’ जैसा कोई उपन्यास समस्त विश्व साहित्य में विरले मिलेगा। अंधत्व लोगों को सीमित करता है। होसे देखने एवं अवलोकन और निरीक्षण के अंतर की ओर हमारा ध्यानाकर्षण करते हैं।

होसे सारामागो के इस उपन्यास पर 2008 में निर्देशक फेर्नांडो मेइरेलेस ने इसी नाम से फिल्म बनाई। इसका स्क्रीनप्ले डॉन मैकेलर ने लिखा है। फिल्म में जुलियन मूर, मार्क रुफैलो, गैल गार्षा बेर्नैल आदि ने भूमिका की हैं। अंधत्व का मतलब है सब कुछ का अंधकार होना। 16 पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में अंधापन विचित्र है, यह काला-अंधेरा न होकर दूधिया सफेद है। अंधे हुए लोगों को सब कुछ सफेद नजर आता है। अचानक अंधे हुए लोगों का जीवन तरह-तरह की कठिनाई से गुजरता है।

फिल्म दिखाती है, आदमी कितना कुरूप हो सकता है, रंग-रूप में कुरूप नहीं, अपने करनी में, अपने काम में। यहां अंधे लोग कोई निकृष्ट कार्य करने से हिचकते नहीं हैं। एकमात्र डॉक्टर की पत्नी जुलियन मूर की दृष्टि सही-सलामत रहती है, वही सबकी अगुआई करती है। एक अनजान स्थान में चल रही इस कहानी में शहर का सारा सिस्टम ठप्प हो जाता है। इस फिल्म को देखना कठिन है। फिर भी एक बार देखना चाहिए। देखना चाहिए ताकि पता चले आदमी कितना नीचे गिर सकता है।

‘शिप ऑफ थीसियस’ पर कई फिल्में बनी हैं। आनंद गांधी ने भी बनाई। यह तीन भागों में है। पहले भाग में आलिया एक अंधी फोटोग्राफर जो अपनी आंखों के ऑपरेशन के बाद नई दृष्टि हासिल करती है, लेकिन उसे अनुभव होता है, उसकी कला दृष्टि के साथ नहीं बल्कि उसकी आंतरिक भावनाओं से जुड़ी है।


अंधत्व पर कई अन्य फिल्में हैं।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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