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हिन्दी को जिंदा रखने के लिए नागरी प्रचारिणी सभा की एक जरूरी यात्रा!
सार
क्वींस कॉलेज के तीन छात्रों बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह जी की नेतृत्व में 1893 में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। पुस्तकालय बना, किताबें प्रकाशित होना शुरू हुआ, नागरी का खूब प्रचार प्रसार हुआ। वर्ष 1900 में नागरी प्रचारिणी सभा की कोशिशे रंग लाई और अदालतों में हिन्दी भाषा को स्वीकार्यता मिली।
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नागरी प्रचारिणी सभा के स्थापना दिवस समारोह (फाइल)
- फोटो : Archive
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विस्तार
चौदह जुलाई को नागरी प्रचारिणी सभा से संदेश मिला, आइए अपनी भाषा के लिए साथ-साथ चलें। संदेश में 15 जुलाई को 134 वें स्थापना दिवस के अवसर पर मैदागिन स्थित सभा के कार्यालय से क्वींस कॉलेज, लहुराबीर तक पदयात्रा की सूचना थी। इस संदेश को पढ़ते ही रोआं-रोआं कांप गया। इन चार पंक्तियों में ददरी मेला में खड़े भारतेन्दू जी नजर आ गए, मने कह रहे हों "भाई हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधारना किस चिड़िया का नाम है। किसको अच्छा समझैं? क्या लें, क्या छोडै़ं?"
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कुछ कहते-सुनते बन नहीं रहा था। बस व्योमेश शुक्ल और संतोष राय के संग हुई बहुत सारी बातें याद आ रही थी। सभा को लेकर उनके अंदर जो उत्साह था, मन-ही-मन बन रही योजनाएं थी और सवाल थे कि कैसे होगा! वैसे ही जैसे भारतेन्दू जी के साथ रहा होगा, फिर नागरी प्रचारिणी सभा का जन्म हुआ, हिन्दी का प्रसार हुआ और राष्ट्रभाषा बनी। ऐसा ही फिर होगा, फिर क्वींस कॉलेज के कुछ छात्र आएंगे और फिर हिन्दी के उत्थान के लिए यात्रा को आगे बढाएंगे। अपनी भाषा में अपने देश का उत्थान करेंगे।
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अब क्वींस कॉलेज की बात, संस्कृत भाषा सीखकर भारतीय बौद्धिक संपदा में घुसपैठ करने की नीयत से अंग्रेजों ने क्वींस संस्कृत कॉलेज की स्थापना 1791 में की थी। उससे पहले संस्कृत की शिक्षा पर औरंगजेब ने रोक लगा रखी थी। इसलिए पंडित काशीनाथ के लिए यही बहुत काफी था कि कॉलेज खुले, संस्कृत बचे और इसके सौ साल बाद क्वींस कॉलेज के तीन छात्रों बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह जी की नेतृत्व में 1893 में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। पुस्तकालय बना, किताबों का प्रकाशित होना शुरू हुआ, नागरी का खूब प्रचार प्रसार हुआ। वर्ष 1900 में नागरी प्रचारिणी सभा की कोशिशे रंग लाई और अदालतों में हिन्दी भाषा को स्वीकार्यता मिली।
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हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि के उन्नति के लिए आलसी भारतीयों के अपेक्षाओं का मंदिर। इन दोनों के स्थापना के बीच जो संघर्ष हुआ, जिन लोगों ने अपना जीवन खापा डाला वह भी सोचते होंगे कि फारसी,अंग्रेजी और संस्कृत के बीच हम ऐसा क्या करें जो भारतवर्ष की उन्नति की वजह हो?
नवंबर 1884 को बलिया के ददरी मेला में पहुंचे भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो इस पर भरे मंच से कहा कि इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाय वही बहुत कुछ है। बनारस ऐसे- ऐसे बड़े नगरों में जब कुछ नहीं होता तो यह हम क्यों न कहैंगे कि बलिया में जो कुछ हमने देखा वह बहुत ही प्रशंसा के योग्य है।
अपने पूरे भाषण में भारतेन्दु जी ने भारत के आलसी नागरिकों पर तीखा व्यंग्य किया, तिस पर वो कहते हैं- भाइयो, अब तो नींद से चौंको, अपने देश की सब प्रकार उन्नति करो। जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो, वैसे ही खेल खेलो, वैसी ही बातचीत करो। परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो।
1893 में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना
अपनी भाषा,अपनी संस्कृति और अपने समाज पर गर्व करने का उनका यह आह्वान काम कर गया। क्वींस कॉलेज के तीन छात्रों बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह जी की नेतृत्व में 1893 में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। पुस्तकालय बना, किताबें प्रकाशित होना शुरू हुआ, नागरी का खूब प्रचार प्रसार हुआ। वर्ष 1900 में नागरी प्रचारिणी सभा की कोशिशे रंग लाई और अदालतों में हिन्दी भाषा को स्वीकार्यता मिली। इसको जोड़िए कि आज भी सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट अंग्रेजी के भरोसे ही हैं।
लेकिन किसी संस्था की असली पहचान सिर्फ उसके इतिहास से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह समय के साथ कितना चलती है। यही बात आज नागरी प्रचारिणी सभा को खास बनाती है। 134 साल पहले बनारस से शुरू हुई नागरी प्रचारिणी सभा ने हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि को पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई।
जिस दौर में हिंदी को सरकारी और सामाजिक स्तर पर बराबरी का स्थान नहीं मिल रहा था, फारसी जड़ो में घुसी थी और अंग्रेजी हुकूमत की भाषा थी। उस समय सभा ने नागरी लिपि के सम्मान की लड़ाई लड़ी। हिन्दी को खड़ा करना का लिए शब्दकोश बनाए, दुर्लभ ग्रंथों का प्रकाशन किया और हिंदी साहित्य के विकास तक, सभा का योगदान ही हिन्दी की यात्रा है। और इस विरासत को, उसके मूल उद्देश्य के साथ संभालना संवारना व्योमेश शुक्ल और उनके साथी बखूबी कर रहे हैं।
व्योमेश शुक्ल से मेरा जब भी मिलना हुआ उनके भविष्य की तैयारियों में संस्कृति साहित्य की चिंता साफ दिखती थी। और सभा के प्रबंधन को लेकर उनकी सक्रियता, कानूनी कार्यवाही में उत्साह, और संस्था के भविष्य को लेकर उनकी प्रतिबद्धता उनके जीवट व्यक्तित्व की पहचान है । और वही लगन पिछले पांच वर्षों से सभा के हर कदम, हर आयोजन और प्रकाशन में दिखता है।
नए प्रबंधन के साथ पिछले कुछ वर्षों में सभा ने यह दिखाया है कि 134 साल पुरानी संस्था भी नए दौर की सोच के साथ आगे बढ़ सकती है। आज यहां पुराने साहित्य का ना सिर्फ पुनर्पाठ हो रहा है। बल्कि नई पीढ़ी को उसे जोड़ने लिए छटपटाहट भी दिख रही है। युवा छात्रों की कार्यशालाएं हो रही हों या सोशल मीडिया के जरिए एक बड़े टेक्नोसेवी वर्ग से जुड़ने की कोशिश हो। हिंदी नई पीढ़ी तक उसी के माध्यम में पहुंचे दिखता है।
नागरी प्रचारिणी सभा केवल विरासत की खंडहर होती दीवार ही नहीं, बल्कि विचार और संवाद का एक जीवंत मंच था और है। और सभा की नई टीम नए समय के साथ कदम ताल कर रही है।
जाहिर है अगर हिंदी को आने वाली पीढ़ियों तक ले जाना है, तो उसकी बात भी नए दौर की भाषा और नए माध्यमों में करनी होगी। इसके लिए अभी बहुत कुछ करना होगा, उम्मीद है सभा यह सोच रही होगी।
हालांकि सभा के 134वें स्थापना वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम में भी यही सोच दिखाई दी। मंच पर इतिहास था, लेकिन चर्चा भविष्य की थी। वरिष्ठ विद्वानों के अनुभव और ओपन माइक के साथ युवाओं की भागीदारी ने यह भरोसा दिया कि हिंदी की विरासत सुरक्षित हाथों में है और उसका भविष्य भी मजबूत होगा।
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