{"_id":"6a60544e3ccc89b54d0e0a62","slug":"it-is-essential-to-link-education-with-practical-skills-innovation-and-employment-oriented-competencies-2026-07-22","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"India Education: शिक्षा को व्यावहारिक कौशल, नवाचार और रोजगारोन्मुखी दक्षताओं से जोड़ना जरूरी","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
India Education: शिक्षा को व्यावहारिक कौशल, नवाचार और रोजगारोन्मुखी दक्षताओं से जोड़ना जरूरी
सार
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन प्रारंभ हुए। 2 फरवरी 1835 को लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने अपना प्रसिद्ध 'मिनट ऑन इंडियन एजुकेशन' प्रस्तुत किया। इसके आधार पर तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने अंग्रेजी शिक्षा को सरकारी संरक्षण प्रदान किया।
विज्ञापन
दिल्ली में संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों ने गिराए पुलिस के बैरिकेड
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा और उसकी भावी प्रगति की सबसे मजबूत आधारशिला होती है। भारत, जिसने प्राचीन काल में विश्वगुरु के रूप में ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की समृद्ध परंपरा विकसित की, उसने समय के साथ शिक्षा के अनेक स्वरूपों, सुधारों और परिवर्तनकारी चरणों को देखा है।
विज्ञापन
आज जब देश प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, तकनीकी खामियों और पारदर्शिता से जुड़े गंभीर प्रश्नों का सामना कर रहा है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी शिक्षा व्यवस्था के पूरे ऐतिहासिक विकासक्रम का निष्पक्ष मूल्यांकन करें।
विज्ञापन
यह समझना भी उतना ही आवश्यक है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से लेकर औपनिवेशिक शिक्षा मॉडल और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था तक की यात्रा में हमने क्या पाया, क्या खोया और भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
विज्ञापन
प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका अर्जित करना या उपाधियां प्राप्त करना नहीं था, बल्कि व्यक्ति के चरित्र निर्माण, नैतिक मूल्यों, बौद्धिक विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्माण करना था। गुरुकुल प्रणाली में विद्यार्थी गुरु के सान्निध्य में रहकर आश्रम जीवन व्यतीत करते थे।
वहां वेद, उपनिषद, दर्शन, गणित, ज्योतिष, खगोलशास्त्र, तर्कशास्त्र, आयुर्वेद, राजनीति, शिल्प, धनुर्विद्या, अन्य विषयों का व्यावहारिक और जीवनोपयोगी अध्ययन कराया जाता था। शिक्षा का प्रमुख आधार संवाद, चिंतन, वाद-विवाद और मौखिक परंपरा थी, जिससे विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति, तार्किक क्षमता और विश्लेषणात्मक दृष्टि का विकास होता था।
गुप्त काल और उसके बाद भारत में नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, वल्लभी जैसे विश्वप्रसिद्ध शिक्षण केंद्र विकसित हुए। इन विश्वविद्यालयों में चीन, तिब्बत, कोरिया, मध्य एशिया तथा दक्षिण-पूर्व एशिया सहित अनेक देशों से विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे। इस शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि व्यक्ति को समाज, प्रकृति और मानवता के प्रति उसके दायित्वों का बोध कराना था।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन प्रारंभ हुए। 2 फरवरी 1835 को लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने अपना प्रसिद्ध 'मिनट ऑन इंडियन एजुकेशन' प्रस्तुत किया। इसके आधार पर तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने अंग्रेजी शिक्षा को सरकारी संरक्षण प्रदान किया।
इस नीति का उद्देश्य अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी शिक्षा को बढ़ावा देना था, जबकि पारंपरिक भारतीय शिक्षा, संस्कृत, फारसी जैसी ज्ञान परंपराओं का सरकारी समर्थन धीरे-धीरे कम होता गया। मैकाले ने स्पष्ट रूप से ऐसे शिक्षित वर्ग के निर्माण की कल्पना की थी जो "रक्त और रंग से भारतीय हो, लेकिन रुचियों, विचारों, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज हो।" औपनिवेशिक शासन के लिए प्रशासनिक कर्मचारियों की आवश्यकता भी इस नीति के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण थी।
मैकाले के बाद भी अनेक आयोगों और नीतियों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया। 1854 का वुड्स डिस्पैच, जिसे भारतीय शिक्षा का मैग्ना कार्टा कहा जाता है, ने प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षा का व्यवस्थित ढांचा प्रस्तुत किया। इसके परिणामस्वरूप 1857 में कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई।
1882 के हंटर आयोग ने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में सुधारों पर बल दिया, जबकि 1944 की सार्जेंट योजना में 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की परिकल्पना की गई।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने अपनी राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था के पुनर्गठन की दिशा में कदम बढ़ाए। 1948-49 के राधाकृष्णन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1956 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की स्थापना हुई।
1952-53 के मुदालियर आयोग ने माध्यमिक शिक्षा में सुधारों का सुझाव दिया। इसके बाद 1964-66 के कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ लाते हुए 10+2+3 शिक्षा प्रणाली की सिफारिश की तथा शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6 प्रतिशत व्यय करने का सुझाव दिया।
स्वतंत्र भारत में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 1968 की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हुई, जिसमें 14 वर्ष तक निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा, 10+2+3 प्रणाली व त्रिभाषा सूत्र को अपनाया गया। प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति लाई गई, जिसका उद्देश्य शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करना था।
इसी अवधि में ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड, जवाहर नवोदय विद्यालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) जैसी महत्वपूर्ण पहलें शुरू हुईं। 1992 में प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में इस नीति में संशोधन कर व्यावसायिक शिक्षा और गुणवत्ता सुधार पर विशेष बल दिया गया।
शिक्षा के सार्वभौमीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 2001 में सर्व शिक्षा अभियान के रूप में उठाया गया। वर्ष 2002 में 86वें संविधान संशोधन द्वारा 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार का संवैधानिक आधार प्रदान किया गया।
इसके बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) लागू किया गया, जिसने प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का कानूनी अधिकार प्रदान किया।
लगभग तीन दशकों के अंतराल के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2020 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी-2020) लागू की गई। इस नीति ने पारंपरिक 10+2 प्रणाली के स्थान पर 5+3+3+4 ढांचा अपनाया। इसमें मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा, कौशल विकास, बहु-प्रवेश एवं बहु-निर्गमन, अकादमिक क्रेडिट बैंक तथा रटने की संस्कृति के स्थान पर समझ, नवाचार और आलोचनात्मक चिंतन पर विशेष बल दिया गया है।
भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था भी समय के साथ विकसित हुई। संविधान के अनुच्छेद 315 के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की स्थापना की गई। 1979 में कोठारी समिति की सिफारिशों के आधार पर सिविल सेवा परीक्षा में प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार की त्रिस्तरीय व्यवस्था अपनाई गई। वर्ष 2011 में प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट को शामिल किया गया।
मेडिकल शिक्षा में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) और इंजीनियरिंग के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) ने विभिन्न परीक्षाओं के स्थान पर एकीकृत व्यवस्था विकसित की। 2017 में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की स्थापना की गई। 2022 से केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी) लागू किया गया।
हाल के वर्षों में नीट, यूजीसी-नेट तथा विभिन्न राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और तकनीकी अनियमितताओं ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए संसद ने लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 पारित किया, जिसमें पेपर लीक और परीक्षा संबंधी धोखाधड़ी के विरुद्ध कठोर दंड का प्रावधान किया गया है।
हालांकि, केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता ऐसी पारदर्शी और तकनीक-सक्षम व्यवस्था की है, जिसमें प्रश्नपत्रों का सुरक्षित एन्क्रिप्टेड डिजिटल हस्तांतरण, बायोमेट्रिक सत्यापन, स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट और परीक्षा एजेंसियों की निजी वेंडरों पर निर्भरता में कमी सुनिश्चित की जाए।
पेपर लीक जैसी घटनाएं केवल प्रशासनिक विफलता नहीं हैं, बल्कि वे इस व्यापक समस्या का संकेत हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी भी अत्यधिक परीक्षा-केंद्रित है। जब तक मूल्यांकन प्रणाली को अधिक लचीला, बहुआयामी और सतत नहीं बनाया जाएगा।
शिक्षा को व्यावहारिक कौशल, नवाचार और रोजगारोन्मुखी दक्षताओं से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक केवल एक परीक्षा के आधार पर भविष्य तय करने की प्रवृत्ति बनी रहेगी।
शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, आधुनिक तकनीक का प्रभावी उपयोग और नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षण ही भारत को एक सुरक्षित, विश्वसनीय और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ज्ञान-आधारित राष्ट्र बनाने की दिशा में निर्णायक कदम सिद्ध होंगे।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।