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Government Schools विशेष: सरकारी स्कूलों से विद्यार्थियों का पलायन क्यों?

Wed, 22 Jul 2026 11:10 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 22 Jul 2026 11:10 AM IST
सार

वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य गठन के समय सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में 11.20 लाख विद्यार्थी थे, जो 2025-26 तक घटकर लगभग ढाई लाख रह गए।

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Why are students leaving government schools
बच्चे सरकारी स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं? - फोटो : Amar Ujala AI

विस्तार

शिक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए केवल एक कल्याणकारी सेवा नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और समतावादी समाज की आधारशिला होती है। किंतु केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी यूडीआईएसई-प्लस (2025-26) के आंकड़े देश की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर गहरे संकट की ओर संकेत करते हैं।

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बीते दो वर्षों (2023-24 से 2025-26) में सरकारी स्कूलों से लगभग 86 लाख विद्यार्थियों की संख्या घटी, जबकि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में लगभग 88 लाख नए विद्यार्थियों का प्रवेश हुआ। यह केवल सांख्यिकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था से जनता के घटते विश्वास का प्रमाण है।
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कुल नामांकन 24.8 करोड़ से मामूली घटकर 24.7 करोड़ रहा, परंतु सरकारी स्कूलों में नामांकन 12.8 करोड़ से घटकर 11.9 करोड़ रह गया, जबकि निजी स्कूलों में यह 9 करोड़ से बढ़कर 9.9 करोड़ पहुंच गया। यह बदलाव बताता है कि समस्या बच्चों की संख्या घटने की नहीं, बल्कि सरकारी और निजी शिक्षा के बीच तेजी से बदलते संतुलन की है।
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भारतीय संविधान में शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, किंतु इसका अधिकांश दायित्व राज्य सरकारों पर है। सरकारें शिक्षकों के वेतन, भवनों, निःशुल्क पुस्तकों, छात्रवृत्तियों और मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं पर भारी व्यय कर रही हैं।

इसके बावजूद यदि अभिभावक आर्थिक बोझ उठाकर भी निजी विद्यालयों का रुख कर रहे हैं, तो यह संकेत है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि गुणवत्ता, जवाबदेही, शिक्षण वातावरण और विश्वास की भी है। नीति-निर्माताओं को इस बदलती सामाजिक मानसिकता के कारणों का गंभीरता से विश्लेषण करना होगा।

उत्तराखंड: राष्ट्रीय संकट का सबसे तीखा उदाहरण

इस संकट की सबसे तीखी तस्वीर उत्तराखंड में दिखाई देती है। एक ओर देहरादून और मसूरी अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विद्यालयों के लिए प्रसिद्ध हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य की सरकारी प्राथमिक शिक्षा गंभीर गिरावट से गुजर रही है। वर्ष 2000 में राज्य गठन के समय सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में 11.20 लाख विद्यार्थी थे, जो 2025-26 तक घटकर लगभग ढाई लाख रह गए।

दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक विद्यालय एकल शिक्षक या शिक्षकविहीन हैं। आधारभूत सुविधाओं की कमी, गिरते शैक्षणिक स्तर और विद्यालयों के एकीकरण ने ग्रामीण पलायन को भी बढ़ावा दिया है, क्योंकि बच्चों की शिक्षा परिवारों की प्रमुख चिंता बन चुकी है। विडंबना यह है कि प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों की छाया में सामान्य पहाड़ी बच्चा गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी असमानता स्पष्ट है। पिछले दो वर्षों में उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड में नामांकन बढ़ा, जबकि राजस्थान, बिहार और तमिलनाडु में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज हुई।

माध्यमिक स्तर पर झारखंड और हरियाणा ने सुधार किया, जबकि बिहार, मेघालय और पश्चिम बंगाल में विद्यालय छोड़ने वाले विद्यार्थियों की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक रही। इससे स्पष्ट है कि यह समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के सामने उभरती व्यापक चुनौती है।

शिक्षा का बढ़ता बाजारीकरण

इसी बीच शिक्षा का तेजी से व्यवसायीकरण हुआ है। प्रसिद्ध शिक्षाविद् एवं एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक प्रो. कृष्ण कुमार का कथन उल्लेखनीय है कि जब राज्य शिक्षा जैसी मूलभूत जिम्मेदारी से पीछे हटता है, तब शिक्षा अधिकार न रहकर बाजार की वस्तु बन जाती है। 

आज अधिकांश निजी विद्यालयों की मासिक फीस ₹5,000 से ₹15,000 तक है, जबकि महानगरों के उच्च श्रेणी के विद्यालयों में यह ₹20,000 से ₹50,000 या उससे अधिक है। इस प्रकार वार्षिक खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है। दूसरी ओर भारत की मध्यवर्ती मासिक आय लगभग ₹9,000-10,000 है और आधे से अधिक कामकाजी लोगों की आय ₹10,000 या उससे कम है।

सबसे गरीब आधी आबादी की औसत मासिक आय तो लगभग ₹5,000-6,000 ही है। ऐसे में निजी शिक्षा का खर्च सामान्य परिवारों के लिए आर्थिक असुरक्षा का स्थायी कारण बन जाता है। सीमित आय वाले परिवार बेहतर भविष्य की आशा में अपनी आवश्यकताओं में कटौती करके भी बच्चों की शिक्षा पर खर्च करने को विवश हैं।

बढ़ती सामाजिक और शैक्षिक असमानता

इस प्रवृत्ति का सबसे गंभीर परिणाम सामाजिक विभाजन के रूप में सामने आ रहा है। एक वर्ग महंगे निजी विद्यालयों से अंग्रेजी माध्यम, आधुनिक तकनीक और बेहतर संसाधनों के साथ निकलता है, जबकि दूसरा वर्ग संसाधन-विहीन सरकारी विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त कर प्रतिस्पर्धा में स्वयं को पीछे पाता है।

यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि अवसरों की असमानता है। जब बचपन से ही दोनों वर्गों को अलग-अलग गुणवत्ता की शिक्षा मिलेगी, तब भविष्य में उनके बीच की खाई और गहरी होती जाएगी। ऐसी स्थिति लोकतांत्रिक समाज में समान अवसर की अवधारणा को भी कमजोर करती है।

शिक्षा का अधिकार : कानून और वास्तविकता

सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून बनाकर निजी विद्यालयों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित कीं, किंतु इसका प्रभाव सीमित रहा है। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा था कि केवल कानून बना देने से अधिकार प्रभावी नहीं होते; जब तक राज्य समान और गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा की गारंटी नहीं देता, तब तक सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा।

वास्तविकता यह है कि आरक्षित कोटे से प्रवेश पाने वाले अनेक बच्चों को सामाजिक अलगाव और हीनभावना का सामना करना पड़ता है। साथ ही प्रशासनिक जटिलताएं, सीमित पहुंच और पारदर्शिता के अभाव ने भी इस व्यवस्था की प्रभावशीलता को कम किया है।

विश्वास लौटाने की सबसे बड़ी चुनौती

अभिभावकों का निजी विद्यालयों की ओर झुकाव केवल प्रतिष्ठा के कारण नहीं, बल्कि अंग्रेजी माध्यम, नियमित उपस्थिति, अनुशासन और प्रतियोगी परीक्षाओं की बेहतर तैयारी जैसी धारणाओं से भी जुड़ा है।

यदि सरकारी विद्यालयों का आधारभूत ढांचा, शिक्षण गुणवत्ता और पारदर्शिता इतनी मजबूत होती कि अभिभावकों को निजी विद्यालय चुनने की आवश्यकता ही न पड़ती, तभी शिक्षा का अधिकार वास्तविक अर्थों में सफल माना जाता। केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय इस बात के उदाहरण हैं कि इच्छाशक्ति और प्रभावी प्रबंधन के साथ सरकारी संस्थान भी उत्कृष्ट परिणाम दे सकते हैं।

सुधार का समय अब

यद्यपि सरकार ने समग्र शिक्षा अभियान, विशेष अनुकरणीय विद्यालयों और डिजिटल प्रयोगशालाओं जैसी पहलों में निवेश बढ़ाया है, फिर भी स्पष्ट है कि केवल भवन और उपकरण पर्याप्त नहीं हैं। उत्तराखंड के प्राथमिक विद्यालयों से गायब हुए लाखों विद्यार्थी और यूडीआईएसई-प्लस के राष्ट्रीय आंकड़े चेतावनी देते हैं कि अब शिक्षा पर केवल बजट बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा।

पूरी व्यवस्था को गुणवत्ता, जवाबदेही, अंग्रेजी दक्षता, शिक्षक उपलब्धता और अभिभावकों के विश्वास की कसौटी पर पुनर्गठित करना होगा। जब तक सरकारी विद्यालयों की शिक्षा निजी विद्यालयों के समकक्ष या उससे बेहतर नहीं होगी, तब तक शिक्षा का अधिकार कागजों तक सीमित रहेगा। 

यदि भारत को वास्तव में समतामूलक और सशक्त राष्ट्र बनाना है, तो शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण पर अंकुश लगाते हुए प्रत्येक बच्चे को, उसकी आर्थिक या सामाजिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना, समान, गुणवत्तापूर्ण और सम्मानजनक शिक्षा सुनिश्चित करनी होगी।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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