रीट परीक्षा: लाखों परीक्षार्थियों से यह कैसा मजाक!
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विस्तार
यह हैरत की बात है कि गहलोत सरकार को पांच महीने बाद यह ज्ञान हुआ कि राजस्थान अध्यापक पात्रता परीक्षा (रीट) के पर्चे में धांधली हुई थी, जबकि पूरे राज्य को 27 सितंबर को ही पता चल गया था कि पर्चा लीक हो गया है। जब बारह से चौदह लाख रुपयों में रीट के पर्चे बिक रहे थे, तब मानो राज्य सरकार गहरी नींद में थी। पांच महीने बाद, जब उसके नतीजे आ चुके हैं, मेरिट काउंसलिंग के फॉर्म भरे जा चुके हैं, तब सरकार कह रही है कि यह तो विद्यार्थियों के साथ गलत हुआ! ऐसे समय जब बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, पांच महीने बाद परीक्षार्थियों को बताया जाए कि उनके साथ गलत हुआ है, तो इसका क्या मतलब है? राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोमवार को राजस्थान अध्यापक पात्रता परीक्षा (रीट) 2021 के लेवल-दो को रद्द करने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि यह परीक्षा दोबारा आयोजित की जाएगी।
दरअसल रीट पेपर लीक को लेकर गहलोत सरकार के खिलाफ विपक्ष और छात्रों का विरोध बढ़ता जा रहा था। एसओजी (विशेष अभियान समूह) की जांच में अब यह बात साफ हो चुकी है कि रीट परीक्षा में पेपर लीक की घटना हुई थी। अध्यापक पात्रता परीक्षा में पूरे राज्य में 13 लाख बच्चे सम्मिलित हुए थे, जिनका भविष्य सरकार ने दांव पर लगा दिया है। यह स्थिति राज्य में युवाओं और परीक्षार्थियों के साथ किस तरह का बर्ताव किया जा रहा है, उसका एक पीड़ादायक उदाहरण है। यह कोई मजाक की बात नहीं है, मगर लगता है कि सरकार युवाओं के साथ अपने मनमाने कदमों के जरिये मजाक कर रही है। बच्चे रीट के लिए महीनों तैयारी करते हैं। उसके बाद उन्हें पेपर देने के लिए अपने गांव-कस्बों से आठ सौ किलोमीटर दूर तक दौड़ाया जाता है। मेरा खुद का परीक्षा केंद्र बांसवाड़ा से आगे बागीदौरा में था। जरा नक्शा देखिए अलवर के बहरोठ से बांसवाड़ा के बागीदौरा की दूरी, बैठे-बैठे सांस फूल जाएगी। लाखों परीक्षार्थियों की मेहनत पर पानी फेरते हुए व्यापक धांधली की खबरें सामने आईं। परीक्षा ठीक से न करवा पाने के बाद राज्य सरकार और उनके कारिंदे
लीपापोती में व्यस्त रहे।
सरकार की जिम्मेदारी थी कि रीट की परीक्षा में व्यापक रूप से धांधली और पर्चे लीक होने की खबर आने के तुरंत बाद उसे रद्द कर देती और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करती। लेकिन आरोपी बेखौफ रहे। खामियाजा लाखों परीक्षार्थियों को भुगतना पड़ा। कल्पना कीजिए, प्राइमरी स्कूलों में अध्यापन के लिए यदि 12-13 लाख रुपये देकर शिक्षक नियुक्त होंगे, तो शिक्षा की कैसी दशा होगी और बच्चों का कैसा भविष्य बनेगा? बच्चे न जाने किस-किस तरह से संसाधन जुटाकर पढ़ाई करते हैं और अपने सपनों में रंग भरने का प्रयास करते हैं। उनका बहुत कुछ ऐसी परीक्षाओं के साथ दांव पर लगा होता है। जनता कुशल प्रशासन के लिए सत्ता सौंपती है, प्रहसन के लिए नहीं। सरकार कुछ तो संजीदगी दिखाए और विद्यार्थियों से माफी मांगे तथा जल्द से जल्द भर्ती प्रक्रिया शुरू करे।