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चीन के साथ संबंधों की राह: दोस्ती का हाथ बढ़ाकर धोखा देना है पुरानी फितरत

Sat, 04 Jul 2026 07:51 AM IST
Devesh Tripathi शिवदान सिंह
शिवदान सिंह Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 04 Jul 2026 07:51 AM IST
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सार
भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों में दिखी हालिया गर्मजोशी बेशक स्वागतयोग्य है, लेकिन उसके साथ विवादित अतीत के मद्देनजर इस राह में चुनौतियां बहुत हैं।
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भारत-चीन संबंध - फोटो : ANI

विस्तार

ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) के सम्मेलन में भाग लेने आए चीनी विदेश मंत्री वांग यी और भारत के एनएसए अजीत डोभाल के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने, संदेहों को दूर करने और संवेदनशील मुद्दों को संतुलित करने के लिए मिलकर काम करने पर सहमति बनी। लेकिन, दोनों देशों के बीच संबंधों पर बात करते समय ध्यान देना जरूरी है कि दोनों के बीच सीमा विवाद का लंबा इतिहास रहा है।


अप्रैल 1954 में भारत और चीन ने पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें एक-दूसरे की सीमाओं का सम्मान करना सम्मिलित था। पर, चीन ने अरुणाचल प्रदेश के आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए 1962 में भारत पर हमला कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के लिए 1996 में उच्चस्तरीय बैठक हुई, जिसमें तय किया गया कि नो मैंस लैंड पर दोनों देशों के सैनिक बगैर हथियारों के गश्त करेंगे। लेकिन, जून 2020 में गलवान में निहत्थे भारतीय जवानों पर चीनी सैनिकों ने हमला कर दिया। इससे दोनों देशों के रिश्ते में गंभीर तनाव आ गया। पिछले कुछ महीनों से दोनों पक्षों ने संवाद और संपर्क बढ़ाकर संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश तेज की है। दोनों देशों के राष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों के बीच में यह बातचीत उसी का नतीजा है। दरअसल, दोनों देशों के संबंधों में संदेह उत्पन्न करने में चीन की प्रमुख भूमिका रही है। पंचशील समझौते के बाद अपनी विस्तारवादी नीति के अनुसार, चीन ने अपने पड़ोसी देशों की भूमियों पर धीरे-धीरे कब्जा करना शुरू कर दिया। 1950 में तिब्बत पर कब्जा करने के बाद चीन ने भारत के 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अक्साई चीन पर कब्जा कर लिया। 1962 के हमले ने दोनों देशों के संबंधों पर गहरा असर डाला। 1967 में नाथुला पर नाकाम हमला किया, जबकि 2017 में दोकलाम में सड़क निर्माण शुरू किया। इस तरह चीन ने बार-बार भारत को धोखा दिया, जिससे उसके वादे और समझौतों पर संदेह होता है। चीन द्वारा भारत के साथ संबंध सुधारने की पेशकश तथा विश्वास बहाली करके संदेह दूर करने के पीछे भारत की बदलती हुई वैश्विक छवि है। अब भारत ने भारत-चीन सीमा पर आधारभूत ढांचे, सड़कें, पुलों, गुफाओं और संचार के साधनों को उच्चस्तरीय बना दिया है। भारत क्वाड में भी शामिल हो गया है। दरअसल, दक्षिण चीन महासागर में चीन के प्रभुत्व का मुकाबला करने के लिए ही क्वाड का निर्माण किया गया है। हिंद महासागर में अपनी पकड़ को और मजबूत करने के लिए भारत ने निकोबार द्वीप समूह को एक सैनिक क्षेत्र के रूप में विकसित करने की योजना भी बनाई है। चीन के साथ संबंधों पर भारतीय रणनीतिकारों को हमेशा संदेह ही रहा है। पर, अब चीन के विदेश मंत्री ने कहा है कि वैश्विक दक्षिण के प्रमुख सदस्यों के रूप में भारत और चीन को विकासशील देशों के बीच एकजुटता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए उदाहरण पेश करना चाहिए। उन्होंने कहा है कि चीन भारत के साथ सीमा विवादों के बजाय अपने आर्थिक हितों को बढ़ावा देना चाहता है, क्योंकि भारत बहुत बड़ा बाजार है।


लेकिन, चीन के साथ हमारे सीमा विवाद बने ही हुए हैं। वह अरुणाचल प्रदेश पर दावा जताता है। इसलिए, भारत को उसके साथ संभलकर दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए, क्योंकि दोस्ती का हाथ बढ़ाकर धोखा देना उसकी पुरानी फितरत है।    
edit@amarujala.com
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